रविवार, 12 अक्टूबर 2014

चीनी बाज़ार में घुसने की मारामारी

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
कुछ समय पहले चीनी राष्ट्रपति के साथ आए महत्वाकांक्षी चीनी व्यापारियों और महत्वाकांक्षा में उनके भी बाप भारतीय व्यवसायियों के बीच व्यापार संतुलन कायम करने की दृष्टि से अहमदाबाद में एक व्यापार बैठक का आयोजन हुआ, जिसमें एक-दूसरे के बाज़ारों में घुसने के उपायों पर गहन चर्चा की जाना थी।
बैठक के पूर्व खान-पान सेशन में खमण-ढोकला, खाखरे, फाफडे, और तमाम गुजराती खानों और पकवानों की बारिश सी चीनियों पर करते हुए हलवा‍इयों, मावा-मिठाई और फरसाण विक्रेताओं ने प्रश्‍नवाचक दृष्टि से चीनियों की ओर ताका ही था कि चीनी उद्यमियों ने उनका इरादा भाँपकर सभी को झटका सा देते हुए कहा -‘‘देखिए, यदि आप लोग सोच रहे हैं कि हम आपको चीन के चौक-चौराहों पर इसी खमण-ढोकला, खाखरे, फाफडे, और तमाम गुजराती खानों के ठेले लगाने की इजाज़त दे देंगे तो आप गलतफहमी में हैं। हम चीनी जनता के नाजुक पेट की कीमत पर धंधा करने की इजाज़त क़तई नहीं दे सकते।’’
मामला बिगड़ते देख हलवाइयों के प्रतिनिधियों ने चीनियों का पटाते हुए कहा-‘‘देखो भाईसाहब, हमारा शोध एवं अनुसंधान काफी विकसित है। हमने चीनी खाद्य पदार्थों को भारतीय स्टाइल में बनाने की विधियाँ खोज निकाली हैं, हम वही सब बेच कर गुज़ारा कर लेंगे। आप तो बस इजाज़त भर दे दीजिए। आप कहेंगे तो हम अपने अनुसंधानकर्ताओं को भारतीय आयटम चीनी स्टाइल में बनाने की विधियाँ खोजने में भी लगा देंगे। हाजमोला और पचनोल जैसे प्रोडक्ट्स भी थोक में निर्यात करेंगे जिससे खाखरे-फाफड़े पचाने में सुविधा होगी।
इधर खेल-खिलौने, प्लास्टिक आयटम्स और इलेक्ट्रॉनिक गजेट्स बनाने वाले उद्यमी सुबह से ताक में बैठे थे कि मौका मिले तो वे अपनी बात चीनियों के सामने खुल कर रख सकें। जैसे ही उन्हें मौका मिला उन्होंने अपनी अटैची खोलकर एक-एक कर सारा सामान वार्ता टेबल पर बिखरा दिया-‘‘ये देखिए, ये देखिए! हमारा सामान क्या आपसे कमज़ोर है ? आपके खेल-खिलौनों और इलेक्ट्रॉनिक आयटमों से हमारा बाज़ार पटा हुआ है, हमें पाँव तक रखने की जगह नहीं है। आपके चक्कर में हमारी लुटिया डूबी पड़ी है। हमें भी चीनी बाज़ार में अपने आयटम लेकर कूँदने की इजाज़त मिलनी चाहिए।’’
एक चीनी बिजनेस ट्रायकून बोला- देखिए, यही तो समस्या है कि आपके आयटम हमारे आयटमों से कमज़ोर नहीं हैं। आप भी घर ले जाते ही खराब हो जाने वाले खिलौनों और इलेक्ट्रॉनिक आयटम्स का प्रचूर उत्पादन करने की क्षमता विकसित कीजिए तभी हमारे बाज़ार में खप पाएँगे। और ये गारन्टी-वारन्टी का लफड़ा भूलना होगा! यूँ साल-साल, छः-छः महीने की गारन्टी देते फिरोगे तो कर लिया धंधा। हमारी तरह घटिया सामान बनाइये, मिट्टी के मोल बेचना सीखिए, हम आपको निर्यात की सुविधा दे देंगे।’’
भारतीय उद्यमी बोल उठे-‘‘श्रीमान जी, फिर तो आपके देश में हमें कोई खरीदार नहीं मिलने वाला। हमारे देश में मिट्टी काफी महँगी होती है।’’
दवा लॉबी के लोग उठ खड़े हुए और कहने लग-‘‘हमें भी कुछ मौका दीजिए हुज़ूर, हमें अमरीकी मल्टीनेशनल वालों ने तबाह कर रखा है।’’ इस पर एक चीनी प्रतिनिधि बोला-‘‘तुम तो बैठ ही जाओ। एक तो नकली दवाइयाँ बेचते हो वो भी इतनी महँगी कि चीनी आदमी तो रेट सुनते ही बेहोश होकर गिर पड़े। क्या दवा की जगह सोना-चांदी भरते हो रैपर में, या हीरे-जवाहरातों से केप्सूल भरवाते हो ?’’
दवा लॉबी के प्रतिनिधि का देश प्रेम जाग गया। वह चीखता हुआ बोला-‘‘ऐ चीनी, फालतू बकवास करने का नई! कौन बे कहता है हम नकली दवाएँ बेचते हैं ? तुम्हारे बाप ने भी कभी खाईं हो दवाई तो जानो! एकूपंचर, एकूप्रेशर की सूईयाँ घुसेड़ने के अलावा तुम्हें आता क्या है। बड़े आए व्यापार समझौता करने वाले, तुम्हारे पिताजी ने भी कभी किया है समझौता?’’
चीनी व्यापारी भी हक्‍का-बक्‍का रह गए। हो-हल्ला मचना शुरू हो गया। भारतीयों को तो मेज-कुर्सी उठा-उठाकर फेंकने, माइक उखाड़ने का काफी ज्ञान था सो उन्‍होंने अपने इस हुनर का इस्‍तेमाल भी किया। चीनियों ने टेबल के नीचे छुप-छुप कर अपनी जान बचाई। हुड़दंगलीला के बावजूद भारतीय पान-गुटखा-सिगरेट बनाने वाले अपने-अपने आयटम चीन में खपाने की जुगाड़ में आशान्वित से बैठे थे। गांजा, भाँग चरस, देसी ठर्रा आदि-आदि बनाने वालों को भी चीनियों के सामने प्रस्ताव रखने का मौका मिलने की पूरी संभावना लग रही थी, वे भी डटे हुए थे। उधर अपना एक मूँफली वाला भी बालू रेत की भुनी मूँफलियों का थैला लटकाए उत्‍साह भरी निगाहों से चीनियों को ताकता हुआ सोच रहा था-‘‘ बस एक बार उसे चीन में घुसने का मौका मिल जाए, सारे चीन को मुँफलियाँ खिला-खिलाकर बरबाद न कर दूँ तो मेरा नाम नहीं।
मूँफली व़ाले का नम्‍बर आया या नहीं, पता नहीं। फुटपाथ छाप रेडीमेड कपड़े वालों, जूते-चप्पल के साथ-साथ झाड़ू, हाथ के पंखे, दीया-बाती, मटके व़ाले भी अपनी बारी के इंतज़ार में लाइन लगाए बाहर बैठे हुए थे, जाने कब तक बैठे रहे। इस कदर मारा-मारी थी कि पूछिए मत।
पता नहीं बेचारे चीनियों को टेबलों के नीचे से निकलकर चीनी माल भारतीय बाज़ार में उतारने के अपने महत्‍वाकांक्षी प्रस्‍ताव पेश करने का मौका मिला या नहीं, या वे जान बचाने के लिए वैसे ही भारतीय टेबलों के नीचे छुपे रहे।
-0-
आज जनसंदेश टाइम्‍स लखनऊ में प्रकाशित 

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

उपासना देवी


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
          उपासना देवी को जब से देखा है, मन ही मन आश्वस्त हो गया हूँ कि देश पर खाद्यान्न संकट कभी आ ही नहीं सकता, क्योंकि वे हफ्ते में पाँच दिन निराहारी उपवास करके देश के लिए काफी अनाज बचाती हैं। रोज़ाना कोई ना कोई व्रत-उपवास करना उनका प्रिय शगल है। हफ्ते के पाँच श्येडूल्ड उपवासों के अलावा बचे हुए दो दिनों में भी वे इस फिराक में रहतीं हैं कि कोई तीज-त्योहार आ पड़े तो चट उपवास कर किराना बचा लिया जाए। जैसे, इतवार को किसी देवी-देवता का दरबार खुला नहीं रहता, वीकली ऑफ रहता है, कोई उपवास करने की ज़रूरत नहीं होती, मगर वे तमाम पंचांगों-पोथियों को खंगालकर कोई ना कोई अवसर ढूँढ़ ही निकालतीं हैं, जिसके उपलक्ष्य में उपवास ठोककर घ्येय पूरा कर लिया जाए। बुधवार को आमतौर पर किसी उपवास का प्रचलन नहीं है, सो उनका दिन भारी बेचैनी में गुज़रता है। कलेजे पर भारी बोझ सा लादे वे सारा दिन मातम सा मनाती रहतीं हैं-कि हाय दिन भर से कितना अन्न बरबाद हो रहा है, उपवास होता तो बच सकता था।
          कभी-कभी एक ही दिन में दो-दो, तीन-तीन उपवासों के सुअवसर आ धमकते हैं। कोई और हो तो टेंशन उठ खड़ा हो कि अब किसके लिए उपवास करें! इस भगवान के लिए उपासे रहो तो वे देवी नाराज़ हो जाएँ, उन देवी के लिए उपवास कर लो तो वे ईश्वर खफा हो जाएँ। मगर उपासना देवी को कोई फर्क नहीं पड़ता, वे निरपेक्ष भाव से तीनों आदि शक्तियों के आव्हान में जुटकर, एकसाथ तीनों के लिए उपवास कर लेतीं हैं। उनकी इस समर्पण भावना से जहाँ देवी-देवता प्रसन्न होते होंगे वहीं उनमें निश्चित रूप से आपस में ठन भी जाती होगी। जहाँ एक देव मुदित होकर कहते होंगे-उपासना देवी ने आज हमारे लिए अन्न त्यागा है, दूसरे देव उन्हें हड़काकर कहते होंगे- गलतफहमी में मत रहियो, आज मेरा ‘डे’ है, बचपन से इस ‘डे’ को बच्ची मेरे लिए ही भूखी रहती है। तीसरी देवी जी बीच में कूदकर दोनों से भिड़ जातीं होंगी-चुप रहो तुम दोनों! चूँकि स्त्रियों की समस्या निवारण का विभाग मेरे पास है, इसलिए उपासना मेरे लिए ही की जा रही है। वास्तव में उपासना देवी को इन तीनों से कोई खास मतलब नहीं होता उन्हें तो बस अन्न बचाने का खब्त सवार रहता है जो कि उन्हें संस्कार के रूप में घुट्टी में पिलाया गया है।
          व्रत-उपवासों के प्रति यह अनोखा समर्पण भाव देखकर ही उपासना देवी को इस घर की बहु बनाया गया था। माँ-बाप ने बचपन से उपवास कर-करके जो बचत की थी उसे दहेज में देकर ससुराल वालों को आश्वस्त किया गया था कि आपके घर में पहुँचकर जो अन्न यह प्रतिभाशाली कन्या बचाएगी उससे आपकी तमाम कुँवारी लड़कियों का शादी-ब्याह, जचकी-वचकी सब निबट जाएगी। ससुराल वाले भी दूरदृष्टि से ताड़ गए थे कि लड़के के खानदानी निकम्मेपन से भविष्य में परिवार पर जो संकट आएगा, जब सरकारें एक्सक्लूसिवली महँगाई बढ़ाने के लिए ही गठित की जाएँगी और दालें सौ रुपए किलो, शकर पचास रुपये किलो होकर सबको नानी याद दिलाएगी, तब यह पुण्यात्मा खुद भूखी रहकर हमारा ख्याल रखेगी। पारम्परिक ससुराल धर्म निबाहते हुए इस पर लात-घूसे चलाना भी सुविधाजनक रहेगा, क्योंकि रात-दिन उपासी रहेगी तो मुकाबले के लिए ताकत कहाँ से लाएगी! फिर सबसे बड़ी बात, यूँ रोज़ कोई ना कोई उपवास रहेगा तो इस बात की संभावना तो बिल्कुल सिरे से ही खत्म हो जाएगी कि बहु खुद तो खा-खाकर मुटाए और सास-ससुर को भूखा मारे! बाज़ घरों की बहुएँ इस गुण में जन्मजात पारंगत होतीं हैं।
          उपासना देवी के उपासे रहकर अन्न बचाने की इस निपुणता और लम्बे अनुभव को देखते हुए जबकि वे स्वयं सूखकर काँटे की प्रतिकृति हो चुँकि हैं, चटोरी, खबोर बहु-बेटियों के परिवारों से उन्हें कल्सल्टेंसी के प्रस्ताव भी मिलने लगे हैं। महँगाई के मारे लोग बड़ी आशा से उपासना देवी से टिप्स ले-लेकर अपनी बहु-बेटियों को उपवास करने के लिए प्रेरित करने का प्रयास कर रहे हैं। बहन बेटियाँ खुद भी स्वप्रेरणा से उपासना देवी से दीक्षा लेकर अन्न बचाने की मुहीम में तन-मन से जुटती जा रही हैं।
     उपासना देवी के अनुयाइयों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है। मुझे पूरी आशा है कि उपासे रह-रहकर बचाए गए दाने-दाने से अंततः देश का खाद्यान्न भंडार समृद्ध हो रहा है। देखा जाए तो देश में मात्र दो शक्तियों की समर्पण भावना की वजह से हमारा यह खाद्यान्न का भंडार कभी खाली नहीं होता और रात दिन खाने वालों के लिए भी हर वक्त अन्न उपलब्ध रहता है। एक तो देश की अधिकांश गरीब-गुरबा आम जनता जिसके नसीब में माता अन्नपूर्णा का आशीर्वाद है ही नही, दूसरी "उपासना देवी" और उनकी अनुयाइनें जो भूखी रहकर इस भंडार को कभी खाली ही नही होने देती हैं। अच्छा है, यह भी आखिरकार एक तरह की देश सेवा ही है जो कि महँगाई के इस विकट दौर में बेहद ज़रूरी है।
-0-
मासिक पञिका कादम्बिनी के अक्‍टूबर-2014 अंक में प्रकाशित 

सोमवार, 22 सितंबर 2014

भावनाओं में बहता पति


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
पतिगण इन दिनों ज़बरदस्त रूप से भावुक चल रहे हैं। पत्नियाँ उन्हें ईश्वरीय मान-सम्मान जो दे रही हैं। कितनी भी खूँखार पत्नी हो इस सीज़न में पतियों के लिए भूखे रहने का पारम्परिक विधान अवश्य निपटाती है, ताकि पति परमेश्वर की सत्ता हमेशा सुरक्षित रहे।
हाल ही में सावन समाप्त हुआ है। पाँच हफ्तों तक प्रत्येक सोमवार पत्नियों ने निर्जला व्रत रखा है ताकि अगले सात जन्मों तक जस के तस वे ही जनाब उन्हें साक्षात पति के रूप में मिलें, जो पिछले सात जन्मों से उनके नाम का पट्टा लिखाए घूम रहें हैं। अब, इतनी लम्बी अवधि तक इन्हीं से अपना नसीब फुड़वाने की योजना है, या दूसरे किसी बेहतर विकल्प की डिमांड रखी गई है, यह तो पत्नियाँ ही जाने, या जाने वे भोले भंडारी जिनके कान में यह रहस्यमय माँग रखी गई है। बहरहाल, पतिदेवगण तो सावन के पूरे महीने भावुक-भावुक से रहे। यूँ कभी धनिया-मिर्च लाकर न देते हों, मगर सावन के महीने में प्रत्येक सोमवार को बेल-पत्री, धतूरा जरूर ढूँढ़-ढूँढ़ कर ले आते रहे।
अभी तीजा गई है, पति देव की सुख-शान्ति और समृद्धि के निमित्त पत्नियों ने दिनभर उपवास किया, रात को जागकर आँखें फोड़ी। कुछ ही दिनों में करवा चौथ आने वाली है, उनकी लम्बी उम्र के लिए पत्नियाँ भूखी रहने वाली हैं। और भी कुछेक छुटपुट तीज-त्योहार इस बीच डाले गए हो सकते हैं, जो पतियों को भावनाओं में बहा ले जाते हों।
पति यदि दारू-खुट्टा हो, मुँह से कम, ज़्यादातर हाथों और लातों से संवाद बनाए रखने में विश्वास रखता हो, या, घर के बाहर रोज़ पिटने वाली ‘गरीब प्रजा’ और घर में ‘नादिरशाह’ बना फिरता हो, या फिर एकदम उस क्वालिटी का हो जो न लीपने के काम आए न पोतने के, तब भी ऐसे सभी नरपुंगवों की धर्मपत्नियाँ अवश्य ही इस पूरे सीज़न में उसके नाम पर भूखी रहकर अन्न बचाएंगी और भगवान से अपने अखंड सौभाग्यवती बने रहने का वरदान माँगकर पतिदेव को भावुक कर जाएंगी।
यही सीज़न है जब दुष्ट पतियों को पता चलता है कि उनकी पत्नियाँ उन्हें कितना प्यार करती हैं, भले ही वे साल भर उन्हें ठोकने-पीटने और बात-बात में उनकी लू उतारने में अपनी मर्दानगी की आजमाइश करते रहते हों। रात-दिन गालियों की झड़ी लगाने के बावजूद भी यदि वह उस ‘कमीने’ पति की लम्बी उम्र की कामना करती है, सात जन्मों तक उसी से पिटते रहने की आकांक्षा रखती है, तो ‘अमर प्रेम’ की इससे बेहतरीन अभिव्यक्ति और क्या हो सकती है। ऐसे में थोड़ा बहुत भावुक होना तो बनता है दोस्तों। इसी भावुकता में पति भी ऐसी टंकार लगा कर कभी-कभी पत्नी का ध्यान रखने का सात फेरों के समय लिया गया अपना प्रण पूरा करने का प्रयास करता है -‘‘ऐ हरामज़ादी, होमोगूलबिन कम है तेरा, फालतू निर्जला-उर्जला रहने की ज़रूरत नहीं है, वर्ना लगाऊँगा चार डंडे।’’ अर्थात, ‘‘भूखी तो रह ले, चलेगा! मगर पानी पीती रहियो। अस्पताल ले जाने की नौबत नइ आना चइये। बिल भरने के लिए तेरा बाप नहीं आने वाला।’’
पतियों के यूँ भावनाओं में बह जाने का दौर किसी न किसी बहाने वैसे तो साल भर चलता रहता है, मगर यह सीज़न खास कुछ इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि हर दूसरे दिन पत्नियाँ पतियों को भावुक हो जाने को मजबूर कर देती हैं। भावनाओं में बहता पति बार-बार उपासी रहने से एनिमिक हो गई अपनी पतिव्रता पत्नी को अस्पताल भले न ले जाए, मगर गाड़ी पर बिठाकर ‘मंदिर’ जरूर ले जाता है, ताकि उस अबला की बढ़े न बढ़े, फोकट में उसकी अपनी उम्र ज़रूर बढ़ जाए।
-0-

सोमवार, 8 सितंबर 2014

मुगलेआज़म पतिदेव


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
दुनिया के सारे पतियों में भारतीय पति सबसे विशिष्ट होता है, क्योंकि वह राजाओं-महाराजाओं की तरह घोड़ी पर सवारी गाँठकर, बैंड-बाजों के साथ पति बना करता है। इस प्रक्रिया में किसी खुर्राट राजा-महाराजा की आत्मा उसमें घुस बैठती है और वह आजीवन ‘महाराजाधिराज’ बना पत्‍नी पर रौब गाँठता रहता है। रौब गाँठने का यह सिलसिला पति की निजी औकात से निरपेक्ष चलता रहता है। अर्थात पति भले ही परचूनी की दुकान पर कारिन्दा हो या पत्‍नी की कमाई पर ही गुलछर्रे उड़ाने वाला खाली-फोकटिया तीसमारचंद हो, घर में घुसते ही वह अपने आप को मुगलेआजम समझने लगता है। चार गुना पढ़ी लिखी, डॉक्टर-इन्जीनियर पति की प्रोफेशनल पत्‍नी हो तब भी उसे घर में ‘बांदी’ बन कर ही रहना पड़ता है, क्योंकि मुगलेआज़म को गुस्से में आकर कोड़े बरसाने का ईश्वरीय अधिकार प्राप्त है।
भारतीय पति दुनिया के दूसरे पतियों से इसलिए भी अलग है क्योंकि उसमें पत्‍नी को ‘पीटने’ का कौशल जन्मजात रूप से विद्यमान रहता है। पैदा होते ही यदि उसे पत्‍नी उपलब्ध करा दी जाए तो वह पहले उसे पीटेगा, फिर रोने की क्रिया की ओर ध्यान देगा। अपनी ब्याहता को पीटने, गरियाने, दबाने, कुचलने, पंखे पर लटका देने का कौशल वह वहाँ ऊपर ही से सीख कर आता है जहाँ पति-पत्नी के जोड़े फायनल होते हैं। वहीं वह एक कमज़ोर नाजुक सी पत्‍नी अपने लिए छाँट लेता है ताकि बाद में खुद अपनी पिटाई की नौबत न आ जाए।
मंडप में अग्नि के समक्ष जब पति सात फेरे लेता है तो प्रत्येक संकल्प के साथ वह पति का विराट रूप धारण करता जाता है, जैसे पुराने ज़माने में राक्षसगण अपना विराट रूप दिखाकर डराया करते थे। फेरे समाप्त होते ही वह ‘विदा’ की ज़िद करने लगता है। बड़े-बूढ़ों को लगता है कि बच्चे को सुहागरात की जल्दी मच रही है, मगर दरअसल उसे पत्‍नी को थप्पड़ मारने की जल्दी मच रही होती है। उसका बस चलता तो वह, वहीं मंडप में नई नवेली दुल्हन को एक ज़बरदस्त ‘कंटाप’ मारकर गृहस्थ जीवन का शुभारंभ करें, मगर अनुभवी पतियों ने उसे पहले ही समझा रखा होता है कि-‘‘मुन्ना पहले ही दिन थाना-कचहरी मत कर लीजो।’’
ईश्वर के बारे में कहा जाता है कि वह सर्वशक्तिमान है, अधिपति है, भाग्यविधाता है, सबका मालिक है। दरअसल यह सब पति के बारे में कहा गया है। तभी तो पति को परमेश्वर कहा जाता है। पति परमेश्वर ! पत्‍नी को पति परमेश्वर की लातें खा-खाकर सृष्टी का संतुलन बनाए रखना होता है।
जो पति, पत्नी को नहीं पीटता वह दुनिया का सबसे घटिया पति होता है और उसे जोरू का गुलाम कहा जाता है। विडंबना है कि गृहस्थ जीवन में सुख-शांति के लिए स्वतंत्रता, समानता, लोकतांत्रिक अधिकारों से बेहद दूर, पति-पत्नी दोनों में से किसी न किसी को किसी न किसी के गुलाम के रूप में देखने की परम्परा सी बन गई है, जबकि गुलामी का युग कब का समाप्त हो चुका है। 
-0-

शनिवार, 30 अगस्त 2014

बदनाम हैं तो क्या, नाम तो है

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//
पुराने ज़माने में लोग ऊँचे चरित्र वालों से अपने निकट रिश्तों का बखान कर-कर के अपना ‘सिक्का’ जमाते थे। अवश्य ही राजा हरीशचन्द्र के वंशजों ने कई पीढ़ियों तक यही किया होगा। अब माहौल बदल गया है। अब कुख्यात लोगों से निकटता होना ‘महानता’ की बात हो गई है और हरीशचन्द्राई ‘बदनामी’ का सबब बन गई है।
शहर के कुछ बिल्डरों पर इन्कमटैक्स का छापा पडा। मार्निंग वॉक पर लोग अपना कद बढ़ा रहे हैं। कोई बोला-‘‘ इन्कमटैक्स व़ालों को तो अभी पता चला, हमें पहले से ही पता था कि इनके पास बहुत माल है! हमारे तो बड़े करीबी हैं! हमारी मौसी की सास की ननद के सगे देवर के लड़के होते हैं। बिल्कुल घर जैसी बात है।’’ दूसरा कह रहा है-‘‘ अब क्या बताएँ! जब कुछ नहीं थे तब से जानते हैं। फटी चप्पल पहनकर आते थे हमारे पास। आज भी बहुत मानते हैं।’’ तीसरा कह रहा है-‘‘बड़े सज्जन हैं। हमने तो उन्हीं से फ्लेट लिया है। लिया क्या ज़बरदस्ती थमा दिया उन्होंने। कहने लगे करोड़ों की प्रापर्टी दे रहा हूँ, याद करोगे। भाई साहब से नीचे बात नहीं करते। जब भी मिलते हैं ज़रूर पूछते हैं-कैसे हैं भाई साहब?’’ सज्जन बेचारा, इन्कमटैक्स की चोरी कर मुँह छुपाता घूम रहा है।
साहब व्यापम घोटाले में धरे गए हैं। जानने वाले उनके प्रभाव से अपना प्रभामंडल विस्तृत करने की कोशिश कर रहे हैं। ‘‘दम है उस आदमी में। कुछ नहीं बिगड़ने वाला। हमारी तो दाँत काटी रोटी रही है। हमसे भी बोले थे कोई हो तो बताओ। डाक्टर-इन्जीनियर जो कहोगे बनवा देंगे। लाख-दो-लाख कम में काम करवा देंगे। बल्कि वे तो बोल रहे थे तुम्हें भी कमवा देंगे। हमने कहा-आपका आशीर्वाद बना रहे बस और क्या।’’ दूसरा शेखी मार रहा है-‘‘ बदमाश तो वो पहले से था! साथ गुल्ली-डंडा खेलते थे। अपने काम को कभी मना नहीं किया। आज भी अगर जेल में जाकर मिलूँ तो ज़रूर कहेगा-पहले ही कही थी बिल्लू, काम करवा ले, पर चिन्ता मति करियों चुटकी बजाते ही बाहर आ जाएंगे। साहब बेचारे चुटकी बजा बजा कर थक गए हैं, बज ही नहीं पा रही है। जमानत तक नहीं हो रही।
बलात्कारी हैं, मगर शहर के बड़े आदमी हैं। लोगों का अंदाज़ देखिए-‘‘जब चाहे फाइव स्टार होटल में बड़ी से बड़ी मॉडल को हायर कर सकता है कम्बख्त। पता नहीं क्या सूझी बंदे को, नौकरानी की लड़की से ही जा चिपटा। हम तो बहुत साथ रहे हैं उसके। अच्छे से जानते हैं। बहुत रंगरेलियाँ कि पट्ठे ने, मगर मजाल है जो कभी कोई लोचा हुआ हो। दूसरा कैसे चुप रह सकता था, बोला- अरे एम.कॉम. में बंदा मेरी नकल मार कर पास हुआ है। बड़ा आदमी बन गया, चरित्र में मगर है वैसा ही संत का संत। यह केस पता नहीं कैसे गले पड़ गया। सेटिंग नहीं कर पाया बेचारा।‘‘ संत, जेल में बंद, अदालत में अपनी पेशी का इंतज़ार कर रहा है।
ईमानदारी पर अडिग रहने के कारण बार-बार ट्रांसफर, सस्पेंशन झेलने वालों के हाल देखें, सगे रिश्तेदार बातें करते हुए मिल जाएंगे-‘‘बेवकूफ हैं साले! अरे ज़माने के हिसाब से चलना चाहिए। हमने तो कोई रिश्ता ही नहीं रखा जबसे उन्होंने दहेज लेने से मना कर दिया था। कभी कोई काम लेकर जाओ तो टका सा जवाब दे देते है। न खाते हैं न खाने देते हैं। हमने भी कह दिया एक दिन, भाड़ में जाओ, थूकने भी नहीं आएंगे कभी चौखट पर।
           कहावत है, बदनाम हैं तो क्या, नाम तो है। उनके नाम से हम भी महान हो लें तो क्या हर्ज़ है! ईमानदारों को तो मेडल मिलने से रहे, हमें क्या मिलेगा।

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

पुलिस वालों की पप्पी झप्पी


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट// 
लो, यूँ तो भारतीय पुलिस दुर्व्‍यवहार, गाली-गलौच, मारपीट-ठुकाई, डंडोपचार के लिए भारी बदनामी झेलती आई है, मगर अब जब वह अपने-आप में क्रांतिकारी सुधार के साथ अपराधियों का माथा चूम रही है, प्यार-मोहब्बत, पप्पी-झप्पी का लड़ियल आचरण अपना रही है, तब भी लोगों के पेट में दर्द हो रहा है। लगे हैं आलोचना पर आलोचना ठेलने, बेचारे प्रेमी जीव को सस्पेंड करवा दिया। अरे क्या हुआ जो शुरुआत अपराधियों से हो रही है, धीरे-धीरे शरीफ, सीधे-साधे लोगों को भी पुलिस वालों की पप्पियों और आलिंगन का लाभ मिलेगा। आप देखेंगे इस बदलाव के आश्चर्यजनक परिणाम निकलेंगे।
अभी कुछ ही दिन हुए है दिल्ली में पुलिस वालों ने छात्रों को खूब दौड़ा-दौड़ाकर पीटा है। भले ही बेचारों ने अपनी ‘माता’ से कभी चपत तक न खाई हो, मगर ‘मातृभाषा’ के लिए उन्हें खोपड़ियाँ तुड़वाना पड़ी। पुलिस ज़रा पहले सुधर गई होती तो उन्हें सिपाहियों का वात्सल्यमय आलिंगन और चुंबनों की बौछार मिल सकती थी। पुलिस वाले वाटर कैनन में भरकर प्रदर्शनकारियों पर ‘पप्पियों’ की बौछार कर सकते थे। कानून तोड़ने वालों के आँख-कान-नाक में प्रदूषित पानी की जगह ‘पप्पियाँ’ घुसतीं, तो वे निहाल होकर फिर अँग्रेजी से माथाफोड़ी करने जा बैठते।
पुलिस के चरित्र में यह युगान्तरकारी परिवर्तन मुझे तो बेहद सुखद लग रहा है। आप आजकल दादागिरी से किसी से कुछ नहीं निकलवा सकते। डंडे मारकर ना सत्य बाहर आता है और न नोटों के बंडल। प्यार से आप पिछले जन्म तक की वारदात कबूलवा सकते हैं। और तो और उस पिछले जन्म की वारदात को रफादफा करने के लिए इस जन्म की मुद्रा में धनलाभ भी पा सकते हैं। ‘प्यार’ के बदले कोई भी सब कुछ ‘प्यार’ से देगा। दादागिरी आदमी को उदंड बना देती है। इसी घटना को लें, थानेदार अगर पुलिसिया अंदाज़ में कातिल को तमाचा मार देता तो संभव है कातिल भी पलटकर तमाचा जड़ देता। क्या भरोसा, आजकल बेटे भी बाप को पलट कर चाटा मार देते हैं, बाप कुछ नहीं कर पाता। इसलिए पुलिसवालों को अपने कमीनेपन की वजह से पिटने की नौबत आ जाए इससे पहले ही उसे अखिल भारतीय स्तर पर अपने आचरण में आमूल-चूल परिवर्तन ले आना चाहिए और सभी अपराधियों-निरपराध बंदों को चुंबन सुख बाँटना शुरू कर देना चाहिए। मुँह से ठर्रे का भभका छोड़े बिना पुलिस उन्हें बाहों में जकड़-जकड़कर आलिंगन सुख लुटाएँ फिर देखिए, न घर-घर में पुलिस फोटो लगें तो फिर कहना।
पुलिस में इस अद्भुत किस्म के परिवर्तन से लोग भले अपराध करना न छोड़े लेकिन उसे कबूल करने के लिए वे अवश्य ही दौड़े-दौड़े थाने चले आएंगे। ऐसा होने लगा तो फिर न थानों में इतना पुलिस बल पाल कर रखने की ज़रूरत होगी न कोर्ट-कचहरी, लॉकअप, जेल पर करोड़ों रुपयों का बजट प्रावधान रखना पड़ेगा। बस चंद पप्पियों-झप्पियों से ही काम हो जाएगा। देश अपराध मुक्त हो जाएगा।
-0-