शनिवार, 28 जनवरी 2012

न राजनीति न बाजनीति

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
आजा़दी के बाद कुछ सालों तक देश को गुरबत से बाहर निकालने के लिए बड़े-बड़े राजनैतिक विचारों की पोटलियाँ पटक-पटक कर लोग चुनाव जीत जाते थे। उसके बाद कुछ सालों तक कभी पंचवर्षीय योजनाओं से देश की तस्वीर पलटने, कभी गरीबी हटाने के नाम पर, कभी समाजवाद के सब्ज़बाग दिखाकर चुनाव जीते जाने लगे। फिर कुछ समय हुआ फीलगुड और ‘चौतरफा’ विकास की ‘एकतरफा’ बातें झिला-झिला कर चुनाव जीतने की कोशिशें चलीं। अब इस सब प्रपंच की कोई ज़रूरत नहीं रह गई है। आजकल जो सबसे ज़्यादा जरूरी बात है वह यह कि आपकी पार्टी में कुछेक मुँहफट, बड़बोले, बदतमीज किस्म के लोगों का जमावड़ा हो जो चुनावी मंचों पर, प्रेस कांफ्रेंसों में विरोधी पार्टियों के धाकड़ नेताओं की लू उतार सके, मीडिया और प्रेस को आकर्षित कर बडे़-बड़ों की चुन-चुन कर छीछालेदर कर सके।
मौजूदा नेताओं के सौजन्य से जल्दी ही ऐसा समय आने वाला है जब छुटभैये नेता चुनावी मंचों पर खड़े होकर एक-दूसरे की माँ-बहन से निकट रिश्ते का ऐलान किया करेंगे। सार्वजनिक मंचों से गाली-गलौच और अपशब्दों की ऐसी झड़ी लगेगी मानों चुनाव में हार-जीत इसी बात पर निर्भर हो कि कौन भरपूर निर्लज्जता से खड़ी-खड़ी अश्लील गालियों की बौछार कर सकता है, योग्य उम्मीदवार उसी को माना जाकर चुन लिया जाएगा।
ग्रास रूट लेवल पर भी अब भोले-भाले समाजसेवी किस्म के राजनैतिक कार्यकर्ताओं का कोई काम नहीं रह गया है जो साफ-सुथरा कुर्ता-पजामा पहनकर, गाँधी टोपी धारण कर वोटरों से माताजी, बहनजी, भाईसाहब और काका, चाचा, मामा का रिश्ता बनाकर ‘‘वोट हमी को देना’’ की विनम्र अपील करते घूमते थे। अब चुनाव जीतने के लिए पार्टी में टपोरी किस्म के कार्यकर्ताओं का रिक्रूटमेंट ज़्यादा ज़रूरी है जो धौंस-दपट से वोटों की झड़ी लगा दें।
देश के वोटर भी आनंद ले रहे हैं। नौंटकी में जिस तरह भाँड दर्शकों को हँसाता है, फिल्मों, टी.व्ही. सीरियलों में जिस तरह फूहड हास्य कलाकार कमर मटकाकर लोगों का मनोरंजन करता है और जिस तरह सर्कस का जोकर तमाशबीनों को हँसा-हँसा कर लोट-पोट कर देता है, उसी तरह आजकल वोटर नेताओं की तू-तू मैं-मैं से, खुश हो-हो कर ताली पीटता है। किसी को न राजनीति से मतलब है न बाजनीति से।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

ढँकना ज़रूरी है!


//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//
उत्तरप्रदेश में हाथी की मूर्तियों को ढॉंकने के लिये कहा गया है। वजह यह है कि हाथी की मूर्ती दिखाकर कोई वोटर को प्रभावित न कर सके। ठीक भी है, हाथी की मूर्तियों को ही क्यों, साक्षात हाथियों को भी कपड़े से ढँकने की ज़रुरत है जो उत्तरप्रदेश के जंगलों, चिड़ियाघरों मैं हैं अथवा साधु-संतो के पास पल रहे हैं। उन्हें देखकर भी तो वोटर हाथी से प्रभावित होकर वोट डाल आ सकता है। सिर्फ हाथी ही क्यों जगह-जगह मौजूद गणेशजी की मूर्तियों को भी चुनाव तक ढँक दिया जाना चाहिये ताकि उन्हें देखकर कोई हाथी को वोट देने के लिए न निकल पड़े।
समाजवादियों ने अपना चुनाव चिन्ह ‘साइकिल’ ही आखिर क्यों रखा! इसलिए क्योंकि ‘साइकिल’ आम जनता के घर-घर में दो-दो, चार-चार होती हैं और हर वक्त उसकी आँखों के सामने होती है। अब चुनाव के समय समाजवादी साइकिल को सिर पर रख कर घूमेंगे इसलिए इसे भी ढँकना चाहिए। जहाँ कहीं भी साइकिल खड़ी दिखाई दे उसे ढँक दिया जाए तो जनता समाजवादियों के बरगलाने में क़तई नहीं आएगी।
सबसे ज्यादा लाभ तो कांग्रेस को मिलना चाहिये, क्योंकि हर एक व्यक्ति के पास दो-दो पंजे हैं। आदमी न केवल अपने पंजों से प्रेरणा का शिकार हो सकता है बल्कि दूसरों के पंजे भी उसे कांग्रेस को वोट देने के लिए फुसला सकते हैं। इसलिए चुनाव आयोग को चाहिए कि छोटी-छोटी कपड़े की थैलियाँ हर व्यक्ति के दोनों पंजों पर चढ़वा दी जाए, तो कांग्रेस कभी भी चुनाव में दूसरों के पंजों का बेजा फायदा नहीं उठा पाएगी।
इधर कीचड़ में जगह-जगह ‘कमल’ का फूल पाया जाता है, कोई भी इंसान इस कमल को देखकर भाजपाइयों के झाँसे में आ सकता है, इसलिए यू.पी. भर में कमल के फूलों पर एक-एक पॉलीथिन की पन्नी उल्टी डाल दी जाए। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।
कई तरह के चुनाव चिन्ह सार्वजनिक जगहों पर पाए जाते हैं। वे सारे ढँक दिए जाएँ तो चुनाव में उन्हें दिखाकर भोले-भाले मतदाताओं को वोट डालने के लिए रिझाया नहीं जा सकेगा। कुछ चीजों को ढँकने में नानी याद आ सकती हैं, मगर चुनाव निष्पक्ष होना बेहद ज़रूरी है, नानी याद आए या नाना।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

चुनाव उद्यमियों के स्वागत में


व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
उत्तरप्रदेश में चुनाव होने वाले हैं, महत्वाकांक्षी बंदे कमर कस कर तैयार हैं। माल बनाने का इससे अच्छा मौका दूसरा नहीं। देश भर में फैले ‘भाई’ किस्म के यूपीआइड भी अपने छोटे-मोटे काम धंधे बंद कर, मोटी कमाई की आशा में अपनी जन्मभूमि की ओर चल दिए होंगे। मौत-मयैत में भले न जाएँ, मगर चुनाव के समय वे ज़रूर पहुँचेंगे। हर कोई कालेधन की बहती गंगा में हाथ धो लेना चाहता है।
यहाँ भले ही इन्डस्ट्री के भट्टे बैठे हुए हों मगर चुनाव उद्योग ज़ोरों पर चलता है। इस समय पूरा यू.पी. एक विशाल इंडस्ट्रीयल हब में तब्दील हो जाता है और आनन-फानन में यहाँ अरबों-खरबों का कारोबार सम्पन्न हो जाता है। राजनैतिक दलालों की पौ-बारह हो जाती है, गुंडे-बदमाशों के वारे-न्यारे हो जाते हैं, छुटभैयों का भाग्य चमक जाता है। छोटे-मोटे धंधे कर लोग जितना नहीं कमा पाते, ज़रा सा साहस करने से दस-पन्द्रह दिनों में उससे कई गुना ज़्यादा माल कमाया जा सकता है, बशर्ते बंदा चुनाव पूर्व के साहसिक उद्यमों में पर्याप्त पारंगत हों।
चुनाव के दौर में कई महत्वपूर्ण कामकाज होते हैं जो पार्टियों को कुर्सी तक पहुँचाने के लिए आवश्यक होते हैं, ताकि वे दबाकर देश सेवा कर सकें। इन कामों को सुचारु रूप से सम्पन्न करवाने के लिए प्रोफेशनल चुनाव उद्यमियों की जरुरत होती है जो हर चुनाव में अपना काम कर वापस दूसरे प्रदेशों की शोभा बढाने लगते हैं। भाषण तो खैर नामी लेखकों से लिखवाकर नेता लोग खुद ही झाड़ देते हैं, प्रचार-प्रसार, पोस्टर चिपकाना, दीवारें रंगना, पर्चे-पम्पलेट बाँटना इत्यादि काम कमिटेड कार्यकर्ता करते हैं। गाड़ियों पर सवार होकर हुल्लड़बाजी करना, दारू-कंबल, नोट बाँटना, फर्जी वोट डालना-डलवाना, बूथ लूटना, मत पेटियाँ-मशीनें उठाकर भागना, मतदाताओं को डराना-धमकाना, गोली चालन, बमवर्षा, हत्या-अपहरण आदि-आदि विशिष्ट कामों के लिए विशिष्ट उद्यमियों की ज़रूरत होती है।
         चोर-डाकू, लुटेरे, जिलाबदर अपराधियों के लिए चाँदी काटने का यही मौका है, वे अपनी गरिमामय उपस्थिति से एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया पूरी करने में अपना सर्वस्व झौंक देते हैं। जैसे ठंडों में झुंड के झुंुड प्रवासी पक्षी आगमन करते हैं, वैसे ही इन दिनों देशभर से अनुभवी चुनावी लड़ाके यू.पी. की ओर दौड़े चले आ रहे होंगे, आइये उनका स्वागत करें।

शनिवार, 7 जनवरी 2012

हास्‍य कवियों के मुगालते


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//          
एक हास्य-व्यंग्य कवि सम्मेलन में घोषणा की जा रही थी, कि ‘हँसाना’ दुनिया का सबसे कठिन काम है। हास्य-व्यंग्यकार फूल कर कुप्पा हुए जा रहे थे-वाह, हम दुनिया का सबसे कठिन काम कर रहे हैं, लोगों को हँसा रहे हैं। मैं दर्शकों को घूर रहा था, और तलाश रहा था एक अदद ऐसे इंसान को जो इस हँसने-हँसाने की महफिल में रोता हुआ आया हो, मगर दूर-दूर तक ऐसा कोई नज़र नहीं आया जो बैठा फफक फफक कर रो रहा हो और इंतज़ार कर रहा हो कि कोई उसे हँसाए। सभी ऑलरेडी हँस रहे थे और मंच की और लालच भरी निगाहों से ताक रहे थे कि कब वहाँ से हास्य रस की सप्लाई हो और वे रसपान करें।
हास्य-व्यंग्यकारों को फालतू की एक गलत-फहमी है कि देश में ‘हँसी’ की भारी कमी है। माना कि देश में परिस्थितियाँ बुक्का फाड़कर रोने भर के लिए अनुकूल हैं, परन्तु ऐसा नहीं है कि हँसने-हँसाने का कोई टोटा हो। लोग खूब हँस रहे हैं और ठठाकर हँस रहे हैं। सड़क से लेकर संसद तक जब मज़ाक ही मज़ाक बिखरा हुआ हो तो आदमी हँसेगा नहीं तो क्या मातम करेगा! देश की जनता के कांधे पर क्रांति-व्रांति का कोई फालतू भार तो है नहीं जो उन्हें मुँह लटकाकर फिरना पड़े, तो फिर क्यों नहीं लोग खुलकर खी-खी खूँ-खूँ करेंगे! कवि-व्यंग्यकार लोग जबरन चिन्ता में दुबले हुए जा रहे हैं कि दुनिया में हँसना बड़ा मुश्किल हो रहा है, और जैसे वे लोगों को हँसा-हँसाकर महान ऐतिहासिक कर्त्‍तव्य पूरा कर रहे हों।
दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र के अपने चुटकुले हैं और अपने मज़ाक हैं। देश में चुनाव हों तो लोगों को हँसी आती है। भ्रष्ट सरकार बने तो लोग खूब हँसते हैं। सरकारें लोग घोटाले करें तो लोग खिखिखिखि करते हैं, मंत्री-अफसर जेल में बंद हों तो ठहाकों से आसमान गूँज उठता है।
      भाई साहब, यहाँ हास्य-व्यंग्य की कोई कमी नहीं, बात-बात पर हँसना लोगों की फितरत है। कमी है तो बस एक चीज़ की, लोगों को शर्म आना बंद हो गई है। किसी को शर्म पैदा करने का हुनर आता हो तो आजमाए, जबरन हँसने वालों को शर्म आए तो शायद बात बने।

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

हैप्‍पी न्‍यू ईयर-नववर्ष मंगलमय हो !!


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
          सबको पता है, चाहे कितना भी धूम-धड़ाका करो, कितनी भी बाँछें खोलो, बत्तीसी बिखेरो, एक-दूसरे को भींच-भींचकर प्राण ले लो, लाउड-स्पीकर, माइक लगाकर एक-दूजे का मंगलगान गाओ, नशा-पत्ता करके कुदक्कड़े लगाओ, मगर कम से कम इस देश में तो ‘पब्लिक’ का नववर्ष ‘मंगलमय’ होने से रहा।
नववर्ष की प्रथम सूर्य-किरण के साथ ही फिर वही राग दरबारी छिड़ जाएगा। फिर वही महँगाई दिन-दूनी, रात-चौगुनी रफ्तार से फार्मूला वन रेस सी दौड़ने लगेगी, फिर वही भ्रष्टाचार का रावण सरकार की अन्तिम इकाई से प्रथम इकाई और प्रथम इकाई से अंतिम इकाई की ओर हुँकारता दौड़ना शुरू कर देगा। फिर वही लूट-खसोट का प्रायोजित राष्ट्रीय कार्यक्रम प्रारंभ हो जाएगा, फिर ज़नता के साथ वही धोकाधड़ी-चार सौ बीसी की चौपड़ शुरू हो जाएगी।
नन्हें-नन्हें बच्चों के लिए वही अंधकारमय भविष्य की उज्ज्वल योजनाएँ होंगी, पढ़े-लिखे युवाओं की वही बेकारी और दिशाहीनता होगी, बुद्धिजीवियों की वही कुंठाग्रस्त सृजनशीलता होगी। महिलाओं पर अत्याचार, दमन, उत्पीड़न का वही साया होगा, माँ-बहनों की इज्ज़त सरेआम बाज़ार में नीलाम की जाएगी। चारों ओर घोर अमंगल ही अमंगल होगा, फिर भी हम एक-दूसरे को ढूँढ़-ढूँढ़ कर, रोक-रोककर, पकड़-पकड़ कर, नववर्ष की मंगलकामना की पोटली पकड़ाते चलेंगे।
दरअसल मंगलकामनाओं के अर्थ कुछ निराले ही होते हैं। चोरगण जब एक-दूसरे की मंगलकामना करें तो उसका मतलब होता है कि हर घर का ताला आपको टूटा हुआ मिले, तुझे भी खूब माल मिले, मुझे भी खूब माल मिले। कोई मुनाफाखोर कालाबाज़ारिया जब दूसरे मुनाफाखोर कालेबाज़रिये के लिए मंगलकामना करे तो उसका अर्थ होता है महँगाई दिन-दूनी, रात-चौगुनी गति से बढ़े, हमारा मुनाफा चौगुना-छौगुना हो जाए। भ्रष्टगण जब एक-दूसरे की ओर मंगलकामना पटकें तो उसका मतलब होता है, इस साल महकमें में खूब बजट-आवंटन आवे, खूब खर्चा बुक होवे, खूब कमीशन हाथ लगे, अपनी जेबे खूब गर्म रहें। नेता लोग जब एक-दूसरे की मंगलकामना करें तो इसका एक ही अर्थ होगा कि तुम्हारे यहाँ भी बड़े-बड़े ब्रीफकेस आवे, हमारे यहाँ भी बड़े ही बड़े ब्रीफकेस आवे।
      ऐसी असंख्य मंगलकामनाएँ लेकर नववर्ष हर वर्ष की तरह आएगा और गरीब की झोपड़ी से ना नापी जा सकने वाली दूरी बनाए, धूम-धड़ाका हल्लागुल्ला मचा कर चला जाएगा। मंगल हो न हो, हरेक का नववर्ष मंगलमय हो जाएगा।    

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

बंद मुँह और खुले मुँह की लीला


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
             
थोबड़े पर ‘मुँह’ नामक खोह कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है, हालिया चेतावनीपूर्ण बयानबाज़ी से यह समझा जा सकता है। ‘अमर’ राजनेता अमरसिंह के मुँह के बारे में यही चेताया जा रहा है, कि अगर वह खुल गया तो कई ‘फँसेंगे’। इस चेतावनी से यह भी ज़ाहिर होता है कि देश में ऐसे कई मुँह हैं जिनके खुलने से ‘फँसने’ वालों की लाइन लग जाएगी और ‘फँसने’ वाले वही सब होंगे जिन्होंने देश की मट्टी-पलीत कर रखी है। इस लिहाज़ से बंद मुँह वाले सभी बंदे खुफियातंत्र के लिए बड़े काम के हैं, उनकी ज़रा अच्छे से खातिर-तवज्जों की जानी चाहिए।
यह ठीक है कि ‘मुँह’ व्यक्ति की निजी संपत्ति होता है, वह उसे खोले या बंद रखे यह उसकी मर्ज़ी, मगर ऐसे ‘मुँहों’ को खुलवाने के लिए ‘बातों’ और ‘लातों’ दोनों की पुख्ता व्यवस्था अवश्य कर रखी जानी चाहिए, जो कानून को ठेंगा दिखाने वालों के बारे में देश के उत्कृष्ठ जासूसीकर्मियों से ज़्यादा जानकारियाँ रखते हैं। मुँह भले ही निजी हो मगर उसका खोलना-बंद रखना सरकार के कंट्रोल में होना चाहिए, ताकि राष्ट्रहित में इसे जब, जहाँ, जितना ज़रूरी हो, खुलवाने का सुभीता रहे।
‘मुँह’ कुल्हड़नुमा वह शारीरिक संरचना है जिसमें लोग अक्सर स्वार्थ का दही जमा कर रखते हैं। जब तक स्वार्थ सधता रहे इसमें दही जमा रहता है, और लोग फँसने से बचे रहते हैं। जहाँ स्वार्थसंधान में बाधा आई कि लोग दही उलटकर अपने ‘मुँह’ को खोलने की धमकी देने लगते हैं और किसी की भी लुटिया डूबाने पर उतारू हो जाते हैं। अपने अमर बाबू के मुँह को दुनिया आजकल बड़े उत्साह और विश्वास से देख रही है कि कब यह चरमराकर खुले और हमें खुश होकर तालियाँ पीटने का अवसर मिले।
किसी की आत्मा जागृत हो जाए तो बरसों-बरस ‘मुँह’ के बंद रहने से भीतर दबी पड़ी नापाक ‘कर’तूतों की फाइलें, फ्लापियाँ, सी.डी.याँ, खदबदाने लगती हैं, और क्षणिक आवेश के कारण जब उसका मुँह खुल जाता है तो भूकम्प आ जाता है और फिर कई गगनचुंबी स्तंभों को धराशायी होना पड़ता है। वह ‘धरा’ आमतौर पर तिहाड़ जेल की होती है। कुछ लोगों को जहाँ किन्ही ‘मुहों’ के खुलने से तिहाड़वास हो जाता है तो वहीं किसी-किसी को ‘उसका’ मुँह खुल न जाए इस डर से तिहाड़वासी बना दिया जाता है। बैठो बेटा अंधेरी कोठरी में, और खोलो अपना ‘मुँह’ कितना खोलना है।
देखा जाए तो शरीर में ‘मुँह’ की भूमिका बड़ी ही चुनौतीपूर्ण है। आँखों से देखी, कानों से सुनी असामाजिक-असांस्कृतिक ‘कर’तूतों की रामकहानी को कंठ से फूटकर बाहर निकलने से इसे बलपूर्वक रोकना पड़ता है। फिर चाहे वह दही जमा कर रोके, मुखाग्र को मोची से सिलवाकर, या उस पर चौड़ा टेप चिपकाकर रोके, वह रोकता है, और यही मुँह का वह कुकृत्य है जिसकी वजह से देश में ‘आचार’ की इतनी समस्या व्याप्त है। स्वेच्छाचार हो, भ्रष्टाचार हो, दुराचार हो, व्यभिचार हो, सब कुछ उन मुँहों के चुप रहने के कारण ही फूलता-फलता है। जबकि आज ज़रूरत यह है कि मुँह खुले और तबियत से खुले। भले ही डाँटने-डपटने, गाली देने, कोसने, निंदा करने  के लिए खुले, यहाँ तक कि पात्र बदमाशों के मुँह पर थूकने के लिए ही सही, मगर खुले, तब देखिए देश में ‘आचार’ का इतना संकट न रहे। लोग राम-राज्य का अनुभव करने लगें।
मगर, कभी-कभी ऐसा भी होता है कि देश में कुछ लोगों का ‘मुँह’ जब खुलता है तो भीषण बदबू का असहनीय भभका छूटकर बाहर निकल पड़ता है और पूरे समाज को सड़ाने लगता है। लोग इस बदबू और सड़ांध को ईत्र की ‘खुशबू’ समझकर सुख की फर्जी अनुभूतियों में डूब-उतरा ही रहे होते है कि घात में बैठे लोग पलक झपकते ही उनका सब कुछ लूट ले जाते हैं।
इसलिए बंद मुहों को खुलवाने और खुले मुँहों को बंद करवाने के लिए कोई कठोर वैधानिक प्रावधान कर इन्हें कानून के दायरे में लाना चाहिए। मेरी राय में तो देश के सारे मुहों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाना बहुत ही बढ़िया रहेगा। सरकार को इस काम के लिए एक अलग विभाग खोलकर तमाम मुहों की निगरानी का चाक-चैबंद प्रबंध करना चाहिए। जब सारे बंद मुँह खुलेंगे और खुले संडांध मार रहे मुँह बंद हो जाएँगे तब देश का सचमुच भला हो जाएगा। 
शुक्रवार 23-29 दिसम्‍बर में प्रकाशित       

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

सोने की चिड़िया


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
हमारे प्यारे भारत देश को कभी किसी ज़माने में ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था। इसी सोने की चिड़िया के लोभ में अँग्रेज़ लोग भारत आए थे और दो सौ वर्षों तक लगातार इस सोने की चिड़िया के ‘पर’ नोच-नोच कर इंग्लैंड की महारानी का खज़ाना भरते रहे। पूरी चिड़िया को बांडा-बुच्चा करने के बाद कम्बख्त उसे मरने को छोड़कर भाग गए। उस ज़माने में कई भारतीय लोग भी सोने की चिड़िया के ‘पर’ नोचने के लिए लालाइत रहते थे परंतु अँग्रेज साहब बहादुर के सामने उनकी एक नहीं चलती थी लिहाज़ा उन्हें मात्र सोने की चिड़िया की ‘बीट’ भर से ही काम चलाना पड़ता था। ज़्यादा से ज्यादा ‘पर’ उखाड़ने की प्रक्रिया के दौरान एखाद ‘रोम-रूआ’ इधर-उधर छिटककर गिर पड़े तो भारतीयों को उसी से खुश रहना पड़ता था।
कालान्तर में इस नुची-बुची चिड़िया को विराट स्वतंत्रता आन्दोलन चला कर मुक्त कर लिया गया। धीरे-धीरे चिड़िया स्वस्थ होती चली गई और आज इस का रूप-यौवन देखते ही बनता है।
अँग्रेज चले जरूर गये मगर कुछ खास किस्म के भारतीयों को ‘पर’ नोचने की कला सीखा गए। पिछले बीस-पच्चीस सालों में इन खास भारतीयों ने अपनी उस सोने की चिड़िया को इस कदर नोचा-खसोटा है कि मत पूछिये। ‘पर-पंख’, यहाँ तक कि उसके ‘रोम-रोए’ तक नोच-नोच कर लोग अपनी तिजोरियाँ भरते जा रहे हैं। कईएक सोने के ‘परों’ को स्विस बैंक में छुपाकर रख रहे हैं तो कोई अपने घरों के संडासों, तहखानों, फर्श, रजाई-गद्दों में उन्हें छुपाए बैठा है। कुल जमा चार-पाँच इंसानों के छोटे से परिवार गगनचुंबी इमारतें तान रहे हैं तो कोई सोने-चाँदी की थालियों में खान-पान और हस्थ प्रच्छालन कर रहा है, कोई खालिस सोने के सिंहासनों पर बैठकर हुकूमत चला रहा है। चपरासियों-बाबुओं के घरों में तक इफरात सोने के ‘पख’ भरे पड़े हैं फिर खानदानी अफसरान, नेता, मंत्रियों की कोई क्या कहे! गरीब आदमी जब कभी आशा की नज़र से देखे, तो उसे चिड़िया के वे खून रिसते घाव दिखा दिए जाते हैं जो पंखों को बेदर्दी से नोचने, खसोटने से बन गए है।
           मैं किंकर्तव्यविमूड़ सा देख रहा हूँ कि अगर ऐसी ही नुचाई चलती रही तो बेचारी चिड़िया कब तक जिंदा रहेगी?