गुरुवार, 12 जुलाई 2012

आखिर गॉड पार्टिकल मिलेगा तो मिलेगा कैसे


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
जब से ‘‘कण-कण में भगवान’’ का नितांत मौलिक, भारतीय चिन्तन कानों में पड़ा तब से यह मूरख उन कणों की तलाश में दर-दर भटक रहा था जिनमें भगवान निवासरत हों। हालाँकि मेरे सम्मुख यह एक विराट प्रश्न हमेशा मौजूद था कि जब मुझे रहने के लिए कम से कम दस बाई दस का एक सर्वसुविधा युक्त कमरा ज़रूरी है तो भगवान महाशय कणजैसी छोटी सी जगह में कैसे रहते होंगे। और, चलो मान लिया किसी जादू-टोने के बल पर या हाथ की सफाई, अथवा भ्रम का सृजन कर किसी तरह वे उस कण में पहुँच भी गए तो फिर यह कैसे संभव है कि वे एक ही समय में, एक साथ करोड़ों, अरबों, खरबों कणों में जा विराजें, वहीं से एक साथ अपने दैनिक क्रियाकर्म एवं ब्रम्हांडीय ज़िम्मेदारियाँ निभाएँ। ऐसे ही हज़ारों सवाल अपने मन-मस्तिष्क में लिए बंदा अक्ल आने के बाद से ही अपना सिर धुनता रहा है और ज़माने भर के ज़िम्मेदार लोग पागल हैकह का अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ते रहे।
अब ज़बरदस्त शोर उठ खड़ा हुआ है- गॉड पार्टिकल मिल गया, गॉड पार्टिकल मिल गया। फिर मेरे समक्ष प्रश्नों की झड़ी लग गई है! क्या वह कण मिल गया जिसमें गॉडयानी भगवानरहता है या बात ईसाइयोंके गॉडके मिलने की की जा रही है, भगवान का उससे कोई लेना-देना नहीं है। अथवा वह आदि कणमिल गया जिसे सर्वप्रथम गॉड या भगवान ने बनाकर खुला छोड़ दिया था कि जा बेटा चक्रवर्ती ब्याज की तरह अपनी संख्या बढ़ाता जा और ब्रम्हांड रच दे। ऐसे में तो विश्व ब्रम्हांड और मानव समाज की उत्पत्ति के सभी धार्मिक फार्मूले ध्वस्त हो जाएँगे।
इधर वे वैज्ञानिकगण भी मेरे शक के दायरे में आ गये हैं जो कोई एक नया कणदेखकर बावले हुए जा रहे हैं। हमें तो छँटवी कक्षा में साइंस टीचर ने बताया था कि दुनिया में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो दो भागों से मिल़कर न बनी हो, अर्थात अणु-परमाणु, अथवा महीन से महीन संरचना के दो टुकड़े किये जा सकते हैं, हर एक भाग को फिर-फिर तोड़ा जा सकता है। बात मानने लायक भी है। ऐसे में उस मिल गये रहे तथाकथित गॉड पार्टिकल के मिलने की खुशी की जगह फिर से उसे तोड़ने का टेन्शन वैज्ञानिकों को ज़्यादा होना चाहिए। आखिर यह भी तो एक काफी बड़ा चुनौती भरा काम है। पहले उस कण को पकड़ो फिर फिक्स करो, जैसे बॉक पर लकड़ी फिक्स करते हैं, फिर उसे तोड़ो। तोड़ते जाओ, तोड़ते जाओ। हरेक टूट के बाद क्या तमाशा होगा कोई नहीं जानता। अमरीकियों ने कम्बख्त परमाणु को तोड़कर हिरोशिमा और नागासाकी पर पटक दिया था तो वहाँ आज तक घास नहीं उग रही है और बच्चे विकलांग पैदा हो रहे हैं। इस हींग-बोर पार्टिकल को तोड़ने का पराक्रम पता नहीं क्या हंगामा बरपाएगा। ऐसी स्थिति में आखिर गॉड पार्टिकल मिलेगा तो मिलेगा कैसे!

मंगलवार, 15 मई 2012

अगले आम चुनाव का मुद़दा - बोरियॉं

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट// 
देश में आए दिन किसी न किसी चीज़ का अभाव हो जाता है, आजकल बोरियों का अभाव चल रहा है। किसानों को बोरियाँ नहीं मिल पा रही है नतीजतन गेहूँ का बफर स्टॉक अपनी जन्मभूमि पर पड़ा पानी से सड़ने की कगार में है। बोरी इस समय किसान के मौलिक अधिकार के रूप में उभर कर सामने आई है जिसे पाने के लिए किसान जान हथेली पर लेकर संघर्षरत है सोच रहा है, शायद इस रास्ते से उसे सचमुच बोरी मिल ही जाएगी! हम देख रहे है कि उसे बोरियों की जगह गोलियाँमिल रही हैं।
बोरियों का यह अभाव फिलहाल सिर्फ मध्यप्रदेश में ही देखा जा रहा है सम्भव है कुछ दिनों में यह पसर कर देश व्यापी हो जाए। केन्द्रहमारी बोरियों की तरह देश भर की बोरियों पर कुंडली मारकर बैठ जाए। एक बात समझ में नहीं आ रही है कि डनलप के मोटे-मोटे गद्दे उपलब्ध होने के बावजूद केन्द्रआखिर राज्यों की बोरियों पर कुंडली मारे क्यों बैठा है! देश को पहली बार पता चला कि राज्यों को खाली बोरियों की सप्लाई केन्द्र करता है। ताज्जुब की बात है, देश में कितनी सारी महत्वपूर्ण चीज़ों का उत्पादन और सप्लाई केन्द्र ने प्रायवेट सेक्टर को दे दी है, मगर बोरी जैसी टुच्ची चीज़ की सप्लाई की जिम्मेदारी वह अपने मथ्थे धारण किये हुए है।
प्रश्न है कि आखिर केन्द्र हमें बोरियाँ दे क्यों नहीं देता। इतनी सारी बोरियों का क्या वह अचार डालेगा। केन्द्र ने कभी सोचा है कि इतनी सारी बोरियों का अचार डालने के लिए कितनी बरनियों की ज़रुरत पड़ेगी। इतनी बरनियों की व्यवस्था आखिर केन्द्र कहाँ से करेगा। यदि बरनियों की व्यवस्था न हुई तो डला-डलाया अचार बरबाद हो जाएगा। केन्द्र को यह नहीं भूलना चाहिये कि बारिश तो आखिर दिल्ली में भी आएगी। अगर उसने बोरियाँ नहीं दी तो जिस तरह हमारा गेहूँ सड़ेगा उसी तरह उनका बोरियों का अचार भी सड़ेगा। भीगा गेहूँ खरीदने की घोषणा तो हमारे यहाँ हो ही चुकी है, ईश्वर ने चाहा तो सड़ा गेहूँ खरीदने की घोषणा भी शीघ्रातिशीघ्र हो जाएगी। हमारा माल तो इस तरह ठिकाने लग ही जाएगा मगर तुम्हारा भीगी बोरियों के अचार का क्या  होगा सोचा है कभी! शराफत इसी में है कि केन्द्र हमें बोरियाँ दे दे, हम भी नहीं चाहते कि हमारा गेहूँ खुले आसमान के नीचे सड़े, बोरियों में सड़ेगा तो सुविधाजनक रहेगा।
            देखा जाए तो यह तो दलालों के किस्म की हरकतें हैं। दलालगण किसी चीज़ को दबाकर फिर दनादन मुनाफा कूटते हैं। बोरिया अगर खुले बाज़ार में मिल रही होती तो संभव था दलाल बोरियों का कृतिम अभाव पैदा कर, गेहूँ के भीगने-सड़ने का डर पैदाकर औने-पौने दामों में माल खरीद लेते। यही हरकतें केन्द्रकर रहा है। ऐसी ओछी हरकते किसी भी देश के केन्द्र का शोभा नहीं देती। जल्दी से जल्दी हमें बोरियाँ पहुँचा दो, वर्ना अगले आम चुनाव का मुद्दा और कुछ नहीं बोरियाँ होंगी। 

रविवार, 15 अप्रैल 2012

बाबागिरी का चोखा धंधा


//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट// 

बाबा बनकर सलाह बेचने का धंधा आजकल चोखा धंधा है, हींग लगे न फि‍टकरी फि‍ऱ भी रंग चोखा कहावत इसी धंधे से निकली है। सलाहें मूर्खता पूर्ण हो तो धंधा इतनी ज़ोर-शोर से चलता है कि पूछो मत। हाल ही में मैंने एक बाबा के समागम में शिरकत की और जो डायलॉग सुने उन्‍हें प्रस्‍तुत कर रहा हूँ :-
भक्‍त- बाबा बहुत दिनों से बेरोज़गार हूँ, नौकरी नहीं मिलती, क्‍या करूँ ?
बाबा- पिछली बार चिकन तंदूरी कब खाया था ?
भक्‍त- आज तक नहीं चखा बाबा!
बाबा- तभी तो कृपा कम हो रही है, पहले कहीं फाइव स्‍टार होटल में बैठकर चिकन तंदूरी खा, कृपा दौड़ी चली आएगी, नौकरी भी लग जाएगी।
भक्‍त- बाबा बिल क्‍या कृपा भरेगी ?
बाबा- बिल भरने को भी पैसा नहीं है तो फि‍र आया क्‍यों यहॉं ?
भक्‍त- बाबा जो कुछ था उससे समागम की एन्‍ट्री फीस भर दी, अब कहॉं से लाऊँ पैसा ?
बाबा- अच्‍छा यहॉं भी कृपा कम हो रही है, चना कब से नहीं खाया ?
भक्‍त- बाबा रोज़ चना खाकर ही गुज़ारा करता हूँ !
बाबा- आज से चना खाना बंद कर दो, कृपा आना शुरू हो जाएगी। चने के पैसे बचेंगे तो तंदूरी चिकन खा लेना, सब ठीक हो जाएगा।
भक्‍त- चना नहीं खाउँगा तो जिंदा कैसे रहूँगा।
बाबा- यह मेरी समस्‍या नहीं है।
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भक्‍त- बाबा मेरी दोनी किडनियॉं खराब हो गईं हैं और लीवर सड़ गया है,  डाक्‍टरों ने जवाब दे दिया है, कुछ करो बाबा !
बाबा- ठर्रा कब से नहीं पीया ?
भक्‍त- क्‍या बात करते हो बाबा, मैं तो चाय-काफी भी नहीं पीता !
बाबा- यहीं तो कृपा कम हो रही है, जीवन में कभी भी ठर्रा नहीं पीयोगे तो लीवर-कीडनी खराब नहीं होगी तो क्‍या होगा ? जाओ पहले किसी कलारी पर जाकर ठर्रा चढ़ाओ, सब ठीक हो जाएगा।
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भक्‍त- बाबा मेरी शादी नहीं हो रही है।
बाबा- शादी में लड्डू कब से नहीं खाया ?
भक्‍त- कल ही खाया था बाबा।
बाबा- कल के पहले कब खाया था?
भक्‍त- परसो !
बाबा- परसो के पहले ?
भक्‍त- नरसो !
बाबा- दूसरों की शादियों में रोज़-रोज़ लड्डू खाओगे तो कृपा कैसे आएगी। आज से लड्डू खाना बंद करके बरफी खाओ, कृपा आना शुरू हो जाएगी।
भक्‍त- बाबा मैं तो लड्डू के साथ-साथ बर्फी भी खाता हूँ !
बाबा- यही तो गड़बड़ करते हो। जाओ लड्डू खाना बंद करके सिर्फ बरफी खाओ। बहुत जल्‍दी शादी हो जाएगी।
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भक्‍त- बाबा मैं बहुत पढ़ता हूँ बहुत पढ़ता हूँ लेकिन पास ही नहीं होता।
बाबा- अच्‍छा, क्‍या कर रहे हो ?
भक्‍त- बाबा बी.एस सी. कर रहा हूँ।
बाबा- कौन से सब्‍जेक्‍ट से बी.एस सी. कर रहे हो।
भक्‍त- फि‍जिक्‍स, केमेस्‍ट्री, मैथ्‍स बाबा।
बाबा- इसीलिए तो कृपा नहीं आ रही है, कल से राजनीति और दर्शनशास्‍ञ की पढ़ाई करके बी.एस.सी. की परीक्षा दो पास हो जाओगे।
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यह सब सीन देख-सुनकर मुझे पूरा भरोसा हो गया है कि इस देश में ठगी का धंधा अब बड़ी इज्‍ज़त का धंधा हो गया है और अब इसमें जूते पड़ने की संभावनाऍं नगण्‍य हो गईं है। चूँकि व्‍यंग्‍यकारों के पास ऐसी धांसू सलाहों की कोई कमी नहीं होती इसलिए सभी व्‍यंग्‍यकारों को भी मेरी विनम्र सलाह है कि जबरन कलम घिसना छोड़कर बाबागिरी का धंधा शुरू कर मूर्खता पूर्ण सलाहें देने लग पड़ें, कहीं कोई खतरा नहीं है, फायदा ही फायदा रहेगा। मैं तो बहुत जल्‍द यह धंधा शुरु करने वाला हूँ। प्रथम सौ लोगों को फीस में मोटी छूट दी जाएगी। पहले आऍं पहले पाऍं।   

सोमवार, 5 मार्च 2012

कीचड़ उछालना एक कला कला है


व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
            एक दूसरे के ऊपर कीचड़ उछालना भी क्या खूब कला है, और दिनों-दिन परवान भी चढ़ती जा रही है। जब, जहाँ, जैसे, जितना, जिस क्वालिटी का, जिस किसी पर चाहो कीचड़ उछाल दो और खुद नव्हे-धुले से चुपचाप अपने घर में बैठे रहो। अगला, अपने बदन पर उछला कीचड़ साफ करने की कोशिश में घाट-घाट पर गंगानहाता फिरे, अपन अपने खी-खी करके हँसते रहो।
            कीचड़ उछालने के इस काम के लिए देश में जब, जहाँ, जितना चाहो कीचड़ हर वक्त उपलब्ध है। मनों, टनों, लीटरों, क्विंटलों की क्वांटिटी में बेहतरीन, बदबूदार, लटपटा कीचड़, किसी भी नहा-धोकर बाहर निकले आदमी पर उलीचने के लिए थोक मात्रा में, हर वक्त तैयारशुदा हालत में मिलता है। इसमें राशनिंग की कोई समस्या नहीं है। आप चाहे सामने वाले किसी शरीफ आदमी पर अपनी ऊँगलियों के पोरों से कीचड़ की चंद बूँदे छिड़क दो, अंजुली में लेकर उछालों, या बाल्टी, मग्गे, तगारी से भर-भरके फेंको, अथवा टेंकरों-ट्रालियों में भरकर किर्लोस्कर पम्प के माध्यम से ही क्यों ना उड़ाओ, इफरात मात्रा में यह आपको बिना किसी उठा-पटक के रेडीमेड प्राप्त हो सकता है। यदि कीचड़ ज़्यादा फोर्स से उछालने की ज़रूरत नहीं है  तो आप इसे एक नन्हें से टुल्लू पम्प से भी उछाल सकते हैं, यह उछलेगा और बड़ी खूबी से उछलकर लक्ष्य का दामन गंदा करेगा। वैसे भी किसी बड़े पम्प से उड़ाकर कीचड़ को इधर-उधर फालतू वेस्ट करके भी क्या फायदा! जितना, जिस पर और जिस जगह पर उछालने की आवश्यकता है बस उतना, उसी पर और उसी जगह पर उछले तो ज़्यादा अच्छा है। आगे के लिए बचाकर रखना भी जरूरी है, पता नहीं कब किस पर उछालने की जरूरत आन पडे़।
जैसे भी उछालों, विगत तिरेसठ साल के लम्बे अनुभव एवं गहन अध्ययन से प्राप्त ज्ञान के आधार पर हम यह दावे के साथ कह सकते हैं कि राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में, पूर्ण आत्मविश्वास और कमिटमेंट के साथ उछाला गया एक अदद कीचड़ का छोटा सा छींटा भी, सामने वाले का मुँह पर्याप्त रूप से काला करेगा ही करेगा। कीचड़ बना ही लोगों का मुँह काला करने के लिए है। अब तक कीचड़ उछालने की इस प्रदर्शनकारी कला के पीछे एक मात्र जायज़ और सर्वमान्य, नीतिसंगत, तर्कसंगत कारण लोगों का मुँह काला करना ही रहा है और आगे भी रहेगा। इससे इतर दूसरी कोई भी वजह कीचड़ को उछालने की इस रचनात्मक गतिविधि के पीछे ना तो भूतकाल में देखी ही गई है और ना ही भविष्य में देखी जा सकेगी।
            जिस व्यक्ति के दर्शनीय व्यक्तित्व से उस पर आपादमस्तक कीचड़ उछालने की क्रांतिकारी प्रेरणा मिलती हो, उसका मुखमण्डल चाहे शुद्ध उजला, गोरा-चिट्टा, साँवला हो, या कि काला-पीला हरा-नीला, वह व्यक्ति अपने ठेठ मोहल्ले-पड़ोस का हो या कि पाकिस्तान, चीन, इटली-जापान का, दूध पीता बच्चा हो या कि मलाई खाता बूढ़ा-नौजवान, नर-नारी हो या कि किन्नर, कीचड़ यदि उछाला गया है तो वह अपना काम करके ही मानेगा। क्रिया के विरुद्ध यह एक अटल प्रतिक्रिया है, और शत्-प्रतिशत् होनीहार है।
जिस तरह मुँह से निकली बात और कमान से छूटा तीर वापस नहीं आ सकता उसी तरह एक बार तबियत से उछाला हुआ कीचड़ कभी भी वापस आकर अपनी जगह पर गिर ही नहीं सकता, भले ही वह अपनी जन्मस्थली से लम्बवत ही क्यों ना उछाला गया हो। इस मामले में पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल का नियम भी पूरी तौर पर प्रभावहीन है, इसलिए यह खतरा भी नहीं है कि किसी पर उछाला गया कीचड़ वापस आकर उछालने वाले का ही मुँह काला कर दें। यह संभावना नगण्य है। यह बात अलग है कि कोई अनाड़ीपने में अपने ही मुँह पर कीचड़ उछाल ले। तब तो वह मुँह काला करेगा ही करेगा, चाहे कीचड़ उछालने के तत्काल बाद उछालने वाले को आत्मज्ञान हो जाए कि-‘‘अरे अरे अरे, यह क्या अनर्थ हो गया’’, और वह खुद अपने उछाले कीचड़ से मुँह छुपाता यहाँ-वहाँ भागता फिरे, कीचड़ पीछा छोड़ने वाला नहीं है, उछला है तो बिना मुँखमंडल की शिनाख्त के मुँह काला करेगा। इतिहास गवाह है कि कीचड़ उछालने की कला का ठीक से रियाज़ किये बगैर जब-जब अनाड़ीपने से कीचड़ उछाला गया है वह उछालने वाले पर ही आकर गिरा है।
तो महानुभाव, कीचड़ उछालने की कला की बारीकियों को समझ लेना आपके हित में है, ताकि वह उछले तो लक्ष्य पर ही उछले, आप पर नहीं, और लक्ष्य को मुँह दिखाने लायक ना छोड़े।
राष्‍ट्रीय साप्‍ताहिक पञिका "शुक्रवार" के होली विशेषांक में प्रकाशित।

शनिवार, 28 जनवरी 2012

न राजनीति न बाजनीति

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
आजा़दी के बाद कुछ सालों तक देश को गुरबत से बाहर निकालने के लिए बड़े-बड़े राजनैतिक विचारों की पोटलियाँ पटक-पटक कर लोग चुनाव जीत जाते थे। उसके बाद कुछ सालों तक कभी पंचवर्षीय योजनाओं से देश की तस्वीर पलटने, कभी गरीबी हटाने के नाम पर, कभी समाजवाद के सब्ज़बाग दिखाकर चुनाव जीते जाने लगे। फिर कुछ समय हुआ फीलगुड और चौतरफाविकास की एकतरफाबातें झिला-झिला कर चुनाव जीतने की कोशिशें चलीं। अब इस सब प्रपंच की कोई ज़रूरत नहीं रह गई है। आजकल जो सबसे ज़्यादा जरूरी बात है वह यह कि आपकी पार्टी में कुछेक मुँहफट, बड़बोले, बदतमीज किस्म के लोगों का जमावड़ा हो जो चुनावी मंचों पर, प्रेस कांफ्रेंसों में विरोधी पार्टियों के धाकड़ नेताओं की लू उतार सके, मीडिया और प्रेस को आकर्षित कर बडे़-बड़ों की चुन-चुन कर छीछालेदर कर सके।
मौजूदा नेताओं के सौजन्य से जल्दी ही ऐसा समय आने वाला है जब छुटभैये नेता चुनावी मंचों पर खड़े होकर एक-दूसरे की माँ-बहन से निकट रिश्ते का ऐलान किया करेंगे। सार्वजनिक मंचों से गाली-गलौच और अपशब्दों की ऐसी झड़ी लगेगी मानों चुनाव में हार-जीत इसी बात पर निर्भर हो कि कौन भरपूर निर्लज्जता से खड़ी-खड़ी अश्लील गालियों की बौछार कर सकता है, योग्य उम्मीदवार उसी को माना जाकर चुन लिया जाएगा।
ग्रास रूट लेवल पर भी अब भोले-भाले समाजसेवी किस्म के राजनैतिक कार्यकर्ताओं का कोई काम नहीं रह गया है जो साफ-सुथरा कुर्ता-पजामा पहनकर, गाँधी टोपी धारण कर वोटरों से माताजी, बहनजी, भाईसाहब और काका, चाचा, मामा का रिश्ता बनाकर ‘‘वोट हमी को देना’’ की विनम्र अपील करते घूमते थे। अब चुनाव जीतने के लिए पार्टी में टपोरी किस्म के कार्यकर्ताओं का रिक्रूटमेंट ज़्यादा ज़रूरी है जो धौंस-दपट से वोटों की झड़ी लगा दें।
देश के वोटर भी आनंद ले रहे हैं। नौंटकी में जिस तरह भाँड दर्शकों को हँसाता है, फिल्मों, टी.व्ही. सीरियलों में जिस तरह फूहड हास्य कलाकार कमर मटकाकर लोगों का मनोरंजन करता है और जिस तरह सर्कस का जोकर तमाशबीनों को हँसा-हँसा कर लोट-पोट कर देता है, उसी तरह आजकल वोटर नेताओं की तू-तू मैं-मैं से, खुश हो-हो कर ताली पीटता है। किसी को न राजनीति से मतलब है न बाजनीति से।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

ढँकना ज़रूरी है!


//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//
उत्तरप्रदेश में हाथी की मूर्तियों को ढॉंकने के लिये कहा गया है। वजह यह है कि हाथी की मूर्ती दिखाकर कोई वोटर को प्रभावित न कर सके। ठीक भी है, हाथी की मूर्तियों को ही क्यों, साक्षात हाथियों को भी कपड़े से ढँकने की ज़रुरत है जो उत्तरप्रदेश के जंगलों, चिड़ियाघरों मैं हैं अथवा साधु-संतो के पास पल रहे हैं। उन्हें देखकर भी तो वोटर हाथी से प्रभावित होकर वोट डाल आ सकता है। सिर्फ हाथी ही क्यों जगह-जगह मौजूद गणेशजी की मूर्तियों को भी चुनाव तक ढँक दिया जाना चाहिये ताकि उन्हें देखकर कोई हाथी को वोट देने के लिए न निकल पड़े।
समाजवादियों ने अपना चुनाव चिन्ह साइकिलही आखिर क्यों रखा! इसलिए क्योंकि साइकिलआम जनता के घर-घर में दो-दो, चार-चार होती हैं और हर वक्त उसकी आँखों के सामने होती है। अब चुनाव के समय समाजवादी साइकिल को सिर पर रख कर घूमेंगे इसलिए इसे भी ढँकना चाहिए। जहाँ कहीं भी साइकिल खड़ी दिखाई दे उसे ढँक दिया जाए तो जनता समाजवादियों के बरगलाने में क़तई नहीं आएगी।
सबसे ज्यादा लाभ तो कांग्रेस को मिलना चाहिये, क्योंकि हर एक व्यक्ति के पास दो-दो पंजे हैं। आदमी न केवल अपने पंजों से प्रेरणा का शिकार हो सकता है बल्कि दूसरों के पंजे भी उसे कांग्रेस को वोट देने के लिए फुसला सकते हैं। इसलिए चुनाव आयोग को चाहिए कि छोटी-छोटी कपड़े की थैलियाँ हर व्यक्ति के दोनों पंजों पर चढ़वा दी जाए, तो कांग्रेस कभी भी चुनाव में दूसरों के पंजों का बेजा फायदा नहीं उठा पाएगी।
इधर कीचड़ में जगह-जगह कमलका फूल पाया जाता है, कोई भी इंसान इस कमल को देखकर भाजपाइयों के झाँसे में आ सकता है, इसलिए यू.पी. भर में कमल के फूलों पर एक-एक पॉलीथिन की पन्नी उल्टी डाल दी जाए। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।
कई तरह के चुनाव चिन्ह सार्वजनिक जगहों पर पाए जाते हैं। वे सारे ढँक दिए जाएँ तो चुनाव में उन्हें दिखाकर भोले-भाले मतदाताओं को वोट डालने के लिए रिझाया नहीं जा सकेगा। कुछ चीजों को ढँकने में नानी याद आ सकती हैं, मगर चुनाव निष्पक्ष होना बेहद ज़रूरी है, नानी याद आए या नाना।