शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

हरिभूमि में व्यंग्य- कौन है भारत जो बंद हो जाता है

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
भाई लोगों ने भारत बंद किया, हालांकि वह जगह-जगह से खुला रहा।
भाई लोगों से मेरा मतलब ‘भाई लोगों’ से ही है, वे अगर सिर तोड़ने के संकल्प के साथ लट्ठ लेकर न घूम रहे होते तो वणिक बिरादरी भला माल बेचने से क्या बाज आने वाली थी। वणिक बिरादरी के कर्मठों की मजबूरी है कि उन्हें भूख भी लगती है और नींद भी आती है, इसलिए वणिकाइन के हाथ की खीर-पूड़ी खाने और दिन भर की लूट-खसौट उसके हवाले करने के बाद नर्म-मुलायम गद्दों पर खुर्राटे भरने के लिए उन्हें घर भी जाना पड़ता है, वर्ना वे रात भर जगराता करके भी माल बेचने से बाज ना आएँ। सो, देश हित में भाई लोगों को उन्हें सिर तोड़ने की धमकी देकर अपने ‘भारत’ का शटर बंद रखने के लिए चेताना पड़ता है, तब कहीं जाकर ‘भारत’ कायदे से बंद होता है।
भारत जगह-जगह से खुला यूँ रहा कि जगह-जगह कांग्रेसी वणिकों की दुकानें भी हैं, वे भी काउन्टर के पीछे विपक्षी ‘भाइयों’ की खोपड़ी फोड़ने के लिए पर्याप्त हथियारों की व्यवस्था के साथ आराम से गल्ले पर बैठे रहे, कि देखते हैं कौन माई का लाल हमारी सरकार की मँहगाई बढाने की भीष्म प्रतिज्ञाओं को खंडित करता है। बीवी भले ही घर में हाईकमान को पानी पी-पीकर कोस रही हो कि खुद तो मौज मजे में है, और यहाँ सपोर्टरों को मँहगाई ने परेशान कर रखा है। समर्पित पुराना कांग्रेसी वणिक पार्टी के बचाव में अपना सिर टूटने का खतरा उठाकर भी अपनी दुकान खोले बैठा है, ताकि पार्टी की नज़र में महान होने का मौका मिल सके, और कोई ना कोई टिकट पक्का हो जाए। दूसरी ओर, जनता के सामने संत बनने का मौका भी रहे कि देखों यह कमीना विपक्ष तुम्हारी गली-गली में फजीहत कर रहा है, मगर हम भले ही चौगूने दाम पर माल बेच रहे हों पर, परोपकार में बेच तो रहे हैं, किसी को भूखों तो नहीं मरने दे रहे ! देश का भला ही तो कर रहे हैं। भारत भले ही बंद रहा हो परन्तु मँहगाई से दो गुना हो गए मुनाफे पर इन्हीं का एकाधिकार रहा, क्योंकि बंद समर्थक दुकानदार मजबूरी में दिन भर विपक्ष के पीछे घूमते रहे क्योंकि आखिर वे ही तो उनके महान कार्यकर्ताओं की गिनती में सबसे ऊपर आते हैं, और मौका लगने पर जनता भी कहलाते हैं।
इस बंद से मेरे सामने एक बहुत ही बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि आखिर ‘भारत’ है क्या चीज़, जो चंद राजनैतिक गुंडों के डंडा लहराने से बंद हो जाता है, और दिन भर हुडदंग-लीला कर बसें-वसें जलाने के बाद शाम को खुल जाता है। क्या बड़े-बडे़ औद्योगिक घरानों के प्रतिनिधि के रूप में गली-गली नुक्कड़-नुक्कड़ पर लोगों की जेब से पैसा निकालने के लिए तैनात ‘शोरूम’ भारत हैं, जिनके, काँच टूटने के डर से बंद होने को ‘भारत बंद’ होना कहा जाता है! या दो वक्त की रोटी की जद्दोजहद के अड्डे, छोटी-छोटी दुकानों के टपरे ‘भारत’ हैं जिन्हें एक दिन के बंद की सज़ा के रूप में एक दिन की कमाई से महरूम रहना पड़ता है। याकि बंद के आतंक से सहमे हुए अपने-अपने घरों में कैद मजदूर किसान, मध्यमवर्ग की आम जनता ‘भारत’ है जिसे इस बंद से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता। आखिर कौन है भारत जो बंद हो जाता है और खुल जाता है।

गुरुवार, 24 जून 2010

सूतक का चिमटना

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
          क्या होता है, कैसा होता है, कहाँ रहता है, कहाँ से आता है, कहाँ जाता है, यह सब तो नहीं पता परन्तु यह कम्बखत 'सूतक' बैठेठाले आए दिन हमसे आ चिमटता है। पड़ोस में कोई मुसलमान रहता हो, ख्रिस्तान रहता हो, और किसी दूसरे धर्म, सम्प्रदाय का बन्दा रहा करता हो, उससे नहीं चिमटेगा। दुनिया के किसी देश में, किसी शहर में, किसी नस्ल, किसी जाति के आदमी से यह सूतक कभी नहीं चिमटेगा, मगर हम दुनिया में कहीं भी रहें यह बाकायदा घर ढूँढ़कर हम पर चढ़  बैठेगा और हम जैसे पवित्र दूध के धूले संस्कार-पुत्रों को अपवित्र कर जाएगा। फिर किसी सहस्यमय अशुद्धि से मुक्ति के लिए गोमूत्र छिड़कने से लेकर पूजा-पाठ और अर्धनग्न होकर पवित्र नदी (भले ही वह पर्याप्त प्रदूषित हो जो कि होती ही है) में डुबकी लगाने का प्रदर्शनकारी कर्मकांड। नदी ना हो तो आसपास किसी तालाब, पोखर, कुएं, बावड़ी पर हर हर गंगे के नाद के साथ शरीर से चिमटे सूतक को ठंडे पानी से रगड़-रगड़ कर छुटाने की हौलनाक कवायद। खुले में नंगे बदन स्नान की ऐसी कोई प्राकृतिक व्यवस्था ना हो तो घर ही में नगर निगम के बाल्टी भर मटमैले पानी में चम्मच भर गंगा जल डालकर भी काम चलाया जा सकता है।
          ब्रम्हांड भर में कहीं भी ग्रहण हो और भारतीय पंडितों को पता भर चल जाए तो समझो सूतक चल पड़ा। हमारे देश में भले ही रात हो या घने बादलों की वजह से यह अनोखा खगोलीय कार्यक्रम ज़्यादा लोग देख भी न पाएँ, परन्तु सूतक बिलानागा बराबर हर एक से आ चिमटेगा और समय के अन्तर के हिसाब से देश-दुनिया भर में जरूरतमंद भारतीयों से चिपटता चला गया।
          किसी के यहाँ बच्चा हो तब भी वह फौरन घर के हर सदस्य से आ चिमटता है। बच्चा भले ही किसी मेटरनिटी होम में पैदा हुआ हो, घर में सुख की नींद सो रहे परिवार के दूसरे सदस्य इस सूतक की चपेट में आ जाते हैं। इधर अस्पताल में डॉक्टर और तमाम स्टाफ को छोड़कर यह घर में बुढ्ढा-बुढ्ढी से जा चिमटेगा और वे अस्पताल जाकर बहु की सेवा सुश्रुषा करने की बजाय घर में बंद होकर बैठ जाएँगे। बच्चे का बाप मान लो किसी दूसरे शहर में हो तो सूतक पहली ट्रेन पकड़कर वहाँ पहुँच जाएगा और उससे जा चिमटेगा, बेचारा सवा महीने अपनी निजी कलाकृति का मुखड़ा भी देख नहीं पाएगा।
          घर में कोई सिधार जाए सूतक बिना देर किये आ खड़ा होता है और इमर्जेंसी से भी खतरनाक निषेधाज्ञा लागू कर देता है। छुआछूत की धारा एक सौ चौवालिस लागू हो जाती है। परम्पराओं की तमाम धाराएँ ज़मीन तोड़-तोड़कर बाहर निकल पड़ती हैं। मृतक की आत्मा बाहर बिजली के खंभे (आजकल घरों में पेड़ कम ही होते हैं) पर बैठी देखती रहेगी कि किसने-किसने सूतक का पालन नहीं किया, किसने घर के बाहर कदम रखा, किसने किसी दूसरे के घर जाकर नाश्ता-पानी कर लिया। आत्मा को यह पसंद नहीं कि उसे भूखा रखकर लोग सूतक में खुद खाएँ-पिएँ। सूतक की निषेधाज्ञा का क्रूर तकाज़ा है कि यदि   वह विराजमान है और पड़ोस में कोई मर भी रहा हो तो उसके मुँह में दो चम्मच पानी भी मत डालो।
          यू तो हम भारतीयों पर जाति-धर्म से निरपेक्ष कोई ना कोई सूतक हमेशा चिमटा ही रहता है, मगर दिमाग को लगे अज्ञान के ग्रहण का सूतक बेहद अनिष्टकारी साबित हो रहा है। इस सूतक से मुक्ति के लिए विज्ञान के समुद्र में डुबकी लगवाई जाना ज़रूरी है, मगर परम्पराओं की नदी में डुबकी लगाने का व्यामोह लोगों से छूटता नहीं। विडंबना है कि आजकल नदियों में गले-गले तक कीचड़ के अलावा कुछ नहीं।

बुधवार, 9 जून 2010

नुक्कड़ नाटक दास्तान-ए-गैसकांड का एंडरसन प्रसंग


जादूगर    -    लड़के! सात समुन्दर पार जाएगा ?
जमूरा    -    पासपोर्ट नहीं है!
जादूगर    -    फिकर नहीं!
जमूरा    -    तो ठीक है उस्ताद, मगर काहे के वास्ते!
जादूगर    -    पकड़ लाने को!
जमूरा    -    किसको ?
जादूगर     -    एंडरसन को !
जमूरा    -    एंडरसन कौन ?

जादूगर    -    बहुराष्ट्रीय कम्पनी का मालिक, लाशों का सौदागर, अमरीकी पूँजीपति,   मुनाफाखोर, गरीब देशों की अवाम  की जान का दुश्मन, सफेद सुअर।

जमूरा    -    समझ गया, समझ गया उस्ताद। मगर अंग्रेजी नहीं आती।

जादूगर    -    फिकर नहीं, बस बैठ हवा के झोके पर, रुकना मत किसी के रोके पर, घुस जाना गोरों के देश में, पकड़ लाना एंडरसन को..................गिलि-गिलि-गिलि फूं...........

(जमूरा घेरे के चक्कर लगाता है, एंडरसन को पकड़ लाता है)

जमूरा    -    उस्ताद, पकड़ लाया, पकड़ लाया। बड़ी मुश्किल से हाथ आया है। के रिया था टेम नहीं है। डालर की एक बोरी उठाओ और उस्ताद और तुम मजमा-वजमा बन्द कर ऐश करना। जमूरे ने पटकनी मन्त्र सुनाया और कन्धे पर बिठाकर उठा लाया। उस्ताद, गोरा आदमी बड़ा नाराज़ है, इसे वेलकम गीत सुना दें। अगर ये नाराज़ हो गया तो हमारा देश इक्कीसवी सदी में कैसे जाएगा ? हमारे देश में लेटेस्ट टेक्नालॉजी कैसे आएगी ?

जादूगर    -     हाँ लड़के इसे गाना सुना।
                     (सब गाते हैं)
                     एंडरसन आया
                     डालर लाया
                    लाशों के ढेर पर मुँह फाड़-फाड़ कर
                    ठहाका खूब लगाया,
                    ठहाका खूब लगाया
                    अमरीका के गोरे ने
                    गिरफ्तार कर छोड़ दिया
                    भई डालर भर बोरे में,
                    डालर भर बोरे में
                    सत्ता यूँ मुस्काई
                    चलो खर्च निकले चुनाव के
                    शुक्रिया अमरीकी भाई,
                    शुक्रिया अमरीकी भाई देखो और भी आना
                    देश में और कम्पनी खोल कर कब्रिस्तान बनाना
                    कब्रिस्तान बनाना जनता हम दे देंगे
                    मगर ध्यान रखना समय-समय पर
                    नोट जरूर खिलाना................
एंडरसन    -    टूम लोग ये क्या गाटा ठा.........? हमको समझ नहीं आया। टुम हमको ट्रांसलेशन करके सुनाटा क्या ?   

जमूरा    -    हम तेरा वेलकम करटा। हमारे देश का परम्परा हाय, जो भी विदेशी आटा उसको एयरपोर्ट पर भक्तिगीत  सुनाटा हम लोग.............

एंडरसन    -    फरम्फरा! ये क्या होटा हाय ?

जमूरा    -    फरम्फरा मीन्स ट्रेडीशन-ट्रेडीशन!

एंडरसन    -    ट्रेडीशन, ओह ! पर ये टुम कैसा वेलकम किया। तुम्हारा सरकार ने टो हमारा बहुत अच्छा वेलकम किया। हमको एयरपोर्ट से हमारा कम्पनी का गेस्ट हाउस तक लाया। अच्छा खाने-पीने का इंटज़ाम किया। हमको बोला सर आप सात समुन्दर पार से आया, भूखा होगा, खाना खाओ, हम खाया, खूब खाया, खूब पिया और डंड पेला। फिर देखो टुम्हारा सरकार को हमारा कितना फिकर हाय। हमको बोला युवर एक्सीलेंसी, इधर टुम्हारा जान को खतरा हाय। टुमको डेहली भेजने को मांगता, बुरा नई मानने का। टुमको इंपोर्टेड कार में घुमायेगा-फिराएगा, ऐश करायेगा। स्टेट प्लेन से भोपाल और हिन्दुस्तान भर का खूबसूरत नज़ारा दिखायेगा। टुमको मालूम हमको रिक्वेस्ट किया टुम्हारा सरकार ने कि सर, हम एक नाटक करने को मांगटा, आपको हीरो बनाने को मांगटा। हम बोला, हज़ारों लोगों को जान से मारने के बाद हम टो वैसे ही     डुनिया का हीरो है। फिर भी हम बोला, ठीक है। टुमको मालूम नाटक का नाम ? ‘‘एंडरसन की गिरफ्तारी’’।
   
जादूगर    -    हाँ और उन्होंने जनता को मूर्ख बनाने के लिए एक नाटक किया। ‘‘एंडरसन की गिरफ्तारी’’। कानूनी ज़रूरत पूरी करने के बहाने हज़ारों लोगों के हत्यारे को छोड़ दिया 25 हज़ार की ज़मानत लेकर। जब अपराध हो रहा होता है तब हमारा कानून चुप बैठा रहता है। और जब अपराध हो चुकता है वह भी इतना भयानक कि हज़ारों लोग तड़फते हुए दम तोड़ देते हैं और लाखों लोग बीमारी से घिरे धीरे-धीरे दम तोडेंगे, तब ये कानूनी नाटक सिर्फ 25 हज़ार की ज़मानत पर खूंखार हत्यारे को खुद ब खुद छोड़ देता है। हां तो जमूरे करदे इस मौत के सौदागर को कटघरे में खड़ा और बांध दे इसकी शैतानी आँखों पर उगलवाऊ पट्टा.....................!
(जमूरा पट्टा बांधता है)
गोरे आदमी चला जा !

एंडरसन    -    किढर अमरीका ? लाओ-लाओ कार लाओ, प्लेन लाओ!   
जादूगर    -    खामोश!
                    अटरम सटरम बकना मत तू
                    खरी बात ही कहना
                    फेंक रहा हूँ उगलवाऊ मन्तर
                    ज़रा तमीज़ से रहना
                    गिलि गिलि गिलि गिलि फूं......................
                    गोरे आदमी लौट आ !
एंडरसन    -    लौट आया!
जादूगर    -    जनता सवाल पूछेगी जवाब देगा ?
एंडरसन    -    देगा!
जादूगर    -    झूठ तो नहीं बोलेगा ?
एंडरसन    -    बोलेगा भी तो टुम क्या कर लेगा ? टुम्हारा सरकार हमारा मुट्ठी में हाय...............!
जादूगर    -    चुप...................तू कौन.........?
एंडरसन    -    एंडरसन दी गे्रट !
जादूगर    -    हिन्दुस्तान क्यूं आया.........?
एंडरसन    -    ज़हरीली गैस के सक्सेसफुल एक्सपेरीमेंट पर हमारे हिन्दुस्तानी एजेन्टों को बधाई देने.............!
जादूगर    -    दे दी ?
एंडरसन    -    दे दी पर मज़ा नहीं आया । हम उनके काम से नाखुश हाय ..............
जादूगर    -    क्यूं ?
एंडरसन    -    बहुत कम मरे............
जादूगर    -    दस हज़ार कम है बे ?
एंडरसन    -    हमारा प्लानिंग तो पूरा शहर साफ करने का ठा !

जादूगर    -    सुन रहे है साहेबान, प्लानिंग तो इनकी पूरा शहर साफ करने की थी ! अगर पूरा देश, पूरी दुनिया साफ करने की भी होती तो कोई बड़ी बात नहीं.......... एंडरसन......!

एंडरसन    -    उस्ताद!
जादूगर    -    कम्पनी हमारे मुल्क में क्यों लगाई!
एंडरसन    -    टो क्या हमारे मुल्क में लगाटा..... हमारे यहाँ का लोग बड़ा कीमटी हाय!
जादूगर    -    हमारे यहाँ के नहीं हैं कीमती.............

एंडरसन    -    पालिसी उस्ताद पूँजीवाद की मेन पालिसी। भारत जैसे पिछडे़ देश में बिजनेस करना, गरीब लोगों को शोषण करना, साथ-साथ उन पर घातक रसायनों का, गैसों का प्रयोग करते रहना ताकि वक्त पड़ने पर कम से कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा लोग मारे जा सकें और प्रापर्टी को कोई नुकसान न हो! हम टो भई टुमारे मंत्रियों-अफसरों को थोड़ा बहुत खिला-पिला डेटे हैं, उनके बेटों, भांजों-भटीजों को अच्छी नौकरी दे देते हैं, टुम्हारा सरकार को करोड़ों रुपया दान करते हैं और आराम से बिना रोकटोक के काम करटे हैं। देखा नहीं, भोपाल में इटना सब होने के बाद भी टुम्हारा डिल्ली का सरकार मल्टी नेशनल का स्वागट करता ! बोलटा इंडिया में और ज़्यादा विडेशी पूँजी लगाओ।

जादूगर    -    सुना है तुम्हारे यहां इस गैस पर पाबंदी है ?
एंडरसन    -    सवाल ही नहीं उठता! टो क्या हम बिजनेस नहीं करें! हमारी तो अब भी यह कोशिश रहेगी कि हमारा कारखाना भोपाल टो क्या हिन्दुस्तान भर से कहीं ना जाने पाए, हम डेखटे हैं कैसे जाता है.......?

जमूरा    -    नहीं चलेगी, नहीं चलेगी, नहीं चलेगी ये चालाकी
                   देख ली दुनिया ने अब झाँकी
                   बना रखे षड़यंत्रों की
                   चकनाचूर करेंगे हम सब नसें तुम्हारे तंत्रों की...............
उस्ताद, बहुत हो गई बकवास, अब जनता भड़करने को है। अगर भड़क गई तो यह गोरा बंदर अपने मुल्क नहीं जा पाएगा। इसको दो एक पहलवानी लात, खुद-ब-खुद हुक्म समझ जाएगा। नही दोबारा यहां आएगा।
(जादूगर और जमूरा दोनों मिलकर उसे लात मारते हैं। एंडरसन भीड़ में घुस जाता है।)

( गैस त्रासदी पर लिखे गए नुक्कड़ नाटक ‘‘दास्तान-ए-गैसकांड का अंश, लेखक-राजीव लोचन व प्रमोद ताम्बट। इस नाटक के प्रथम संस्करण का प्रकाशन 26 दिसम्बर 1984 को हुआ था। एंडरसन के संबंध में उठ रहे सवाल इस नाटक में आज से 26 साल पहले कितने सशक्त रूप में उठाए गए थे वह नाटक के इस एंडरसन प्रसंग से स्पष्ट है।मुख्य पृष्ठ का डिजाइन स्वर्गीय किशोर उमरेकर का है।)

मंगलवार, 8 जून 2010

हरिभूमि में व्यंग्य - लेखन क्षमता का अदृभुत कमाल

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

देश में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं लेकिन विकट प्रतिभाएँ गिनी-चुनी हैं। एक विकट प्रतिभा का अभी कुछ ही समय पहले आविर्भाव हुआ है। आई.पी.एल,. जिसका फुल-फार्म इंडियन पिसाई लीग, इंडियन पैसा लीग, इंडियन पापी लीग आदि-आदि किया जाकर अब भी अन्तिम होना बाकी है, के कमिश्नर ललित मोदी ने उनके ऊपर लगे छत्तीस-पेजी आरोपों का जवाब पन्द्रह हज़ार पन्नों में देकर बड़े-बडे़ लिख्खाड़ों को धराशायी कर दिया है। आम तौर पर जिस देश में चार लाइन मात्र लिखने में लोगों की नानी मरती हो, और खास तौर पर, लिखने वालों में चार पन्ने लिखने के बाद मौलिकता का गधे के सिर से सींग की तरह लोप होने लगता हो, उस देश में जीवन भर नोट कमाने की जुगत में रहने वाले एक खान्दानी बनिए ने रातों-रात मौलिकता की सम्पूर्ण भावनाओं के साथ पन्द्रह हज़ार शुभ्र-सफेद पन्ने काले कर मारे, वह भी बिना यह साहित्यिक चिंता पाले कि इन पन्द्रह हज़ार पन्नों को कोई पढ़ेगा भी या नही, है ना कमाल की बात ?
आई.पी.एल. के दीवानों के लिए भले ही यह कान पर जूँ रेंगाने वाली घटना ना हो मगर साहित्यकारों के लिए यह अवश्य ही एक चिंता में डालने वाली घटना हो सकती है। अवश्य ही यह एक महान व्यावसायिक जलन का विषय हो सकता है कि वे, जो जीवन भर कलम घसीट-घसीट कर रीम का रीम कागज़ काला करते रहने के लिए बदनाम हैं, मगर फिर भी कुल मिलाकर पन्द्रह हज़ार पृष्ठों का रद्दी में बिकने लायक कचरा तैयार नहीं कर पाते, इधर इस कल के छोकरे ने एक झटके में इतना कागज़ गोद दिया कि उसे छः बक्सों में रखकर ढोने के लिए चार कारों की व्यवस्था करना पड़ी। कमाल की उत्पादन क्षमता है। मेरा दावा है कि देश के सारे साहित्यकार भी अगर मिलकर इतने पृष्ठों का उत्पादन करना चाहे तो इतने कम समय में हरगिज़ नहीं कर सकते। उत्पादन तो दूर, आयतन की दृष्टि से इतने कम समय में तो वे शांत चित्त से पन्द्रह हज़ार पृष्ठों की सामग्री के समानुपातिक सोच भी लें तो साहित्य जगत में, विशेषकर साहित्य जगत के पुरस्कार खेमे में तूफान आ जाए।
यूँ तो मोदी की उस ऐतिहासिक रचना को कोई खानदानी किताबी कीड़ा तक पलटकर देखना नहीं चाहेगा, मगर फिर भी तीव्र गति से समसामयिक लेखन के इस कौशल को बिना किसी मूल्यांकन प्रक्रिया को अन्जाम दिए सम्पूर्ण सम्मान की नज़र से देखा जाना चाहिए। तत्काल सम्मान इत्यादि की घोषणा भी कर दी जाए तो इतर लोग भी जिनके पढ़ने के लिए इस कालजयी साहित्य की पन्द्रह हज़ार पेजी रचना की गई है, इसे पढ़ने से बच जाऐंगे। रचनाशीलता के इस महान जज़्बे की इज्ज़त करते हुए मोदी की इस कृति को अवश्य ही नोबल पुरस्कार के लिए भेजा जाना चाहिए। यह नोबल पुरस्कार के लिए भी सम्मान की बात होगी क्योंकि आज तक इतनी हृष्ट-पुष्ट कृति पुरुस्कारार्थ नहीं आई होगी। वे दें या ना दें, मोदी लें या ना लें, उनकी मर्ज़ी, मगर हमें मोदी जैसे भारतीयों की लेखन क्षमता का झंडा ऊपर उठाने के लिए यह प्रयास जरूर करना चाहिए।

रविवार, 6 जून 2010

मालामाल करने की चिरौरियाँ

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

    वैसे तो हमारे खानदान में कभी किसी को कोई ईनाम-इकराम नहीं मिला, किसी की कोई लॉटरी नहीं लगी, किसी ने विरसे में हमारे लिए धनदौलत की कोई पोटली नहीं छोड़ी, मगर जबसे मैंने पत्राचार और ब्लॉगिंग के लिए इन्टरनेट का इस्तेमाल तेज़ किया है, दुनिया भर के सैकड़ों दयालु और उदार किस्म के बदमाश मुझे नाना तौर-तरीकों से जबरदस्ती मालामाल कर देने पर तुले हुए हैं। पता नहीं मेरे बारे में उन्हें यह गलतफहमी कैसे हो गई कि हिन्दी का लेखक है तो ज़रूर लॉटरीखोर और सट्टेबाज़ होगा। याकि उनका आकलन है कि भारतीय लेखक है तो मुफ्तखोर तो ज़रूर होगा, लालच का मारा पक्का जाल में आ फँसेगा। या फिर शायद वे सोच रहे हैं कि दुनिया में सबसे बेवकूफ कोई है तो वह है भारतीय लेखक, फिर व्यंग्यकार हो तो उससे मूर्ख तो कोई हो ही नहीं सकता, इसलिए इन दिनों सैकड़ों की तादात में इन्टरनेट के ठगों ने मेरे ऊपर कड़ी फील्डिंग लगा रखी है, जाल बिछा रखा है और इंतज़ार कर रहे हैं कि कब में उसमें जा फसूँ।
    सुदूर विदेशों से, या क्या पता यहीं किसी होटल में बैठकर, कई लॉटरी और सट्टे वाले रोज़ मेरे ईमेल बाक्स में ढेरों बधाइयाँ भेज रहे हैं। कांग्रेच्यूलेशंस, यू हैव वन 1 लैख यू.एस. डालर्स। कांग्रेच्यूलेशंस, यू आर द विनर ऑफ द यू.एस. नेशनल लॉटरी, क्लेम फॉर ट्वेंटी फाइव थाउजेंड पाउंड। कांग्रेच्यूलेशंस, यू आर द जैकपॉट विनर......। और बधाइयों के साथ तुरन्त अपना नाम, पता, दूरभाष आदि जानकारी भेजने का निवेदन, व देरी होने की सूरत में दावा खारिज कर दिये जाने की सख्त धमकी भी होती है। सच कह रहा हूँ, अव्वल तो मैंने कभी कोई लॉटरी का टिकट खरीदा ही नहीं, ना ही कहीं कोई सट्टे की पर्ची ही लगाई है, फिर पता नहीं क्यों ये दानी लोग जबरदस्ती मेरी आर्थिक स्थिति सुधारने पर उतारू है। जब देश की अर्थव्यवस्था सैद्धातिक रूप से मेरी आर्थिक दशा सुधारने के सरासर खिलाफ है तो फिर ये बेचारे क्यों खामोखां परेशान हो रहे हैं, क्या पता !
    एक कोई पीटर साहब हैं। वे मेरे नाम लाखों डॉलर छोड़कर मरे हैं। अब उनके वकील जैफरसन चुपचाप यह पैसा खा जाने की बजाय मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हैं कि मैं अपनी अमानत हासिल करने के लिए उनसे सम्पर्क करूँ। मैंने अपने माँ-बाप से पूछ लिया है कि अपने खानदान में कभी कोई पीटर नाम का आदमी हुआ है क्या ? उन्होंने भी अपनी याददाश्त पर काफी ज़ोर डालकर देख लिया, पुराने पारिवारिक पोथी-पत्रों को भी पलट लिया, मगर कहीं से कोई सूत्र इन पीटर साहब से जुड़ता नज़र नहीं आ रहा।
    एक कोई मूसा महाशय हैं, जो नाम से ही गैंगस्टर प्रजाति के प्रतीत होते हैं। वे चाहते हैं कि उनका किसी बैंक में फँसा हंड्रेड बिलियन फाइव थाउजेंड यू.एस. पाउंड मेरे खाते में ट्रांसफर कर दिया जाए। किसी की भी कसम खवा लो, यह जो रकम ऊपर लिखी है, भारतीय मुद्रा में दरअसल कितनी होती है मुझे नहीं मालूम। मुझे भय है कि इतनी बड़ी रकम मेरे खाते में आने से कहीं मुझे हार्ट अटैक ना हो जाए या मेरी बैंक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स कहीं खुशी के मारे पागल ना हों जाएँ।
    एक साहब मुझे अपना बिजनेस पार्टनर बनाना चाहते हैं। दुनिया भर के बड़े-बडे़ देशों को छोड़कर वे भारत जैसे भुक्कड़ देश के एक, ‘बिजनेस’ ही से नफरत करने वाले शख्स की पाटनरी आखिर क्यों चाहते हैं और दुनिया के बड़े-बडे़ घरानों को लात मारकर वे मुझ ही से पाटनरी में धोका क्यों खाना चाहते हैं, यह एक बड़े रहस्य की बात हैं। लगता है उन्हें डूबने का शौक चर्रा रहा है और यह सच है कि दुनिया में अगर बिजनेस डुबाने में सचमुच कोई उनके काम आ सकता है तो वह मैं ही हूँ।
    मुझे मालामाल करने के लिए की जा रही रोज़ की नई-नई विदेशी चिरौरियों से तंग आकर अब मैं इन्टरनेट पर रातों-रात अपना ठिकाना बदलने की तैयारी कर रहा हूँ, जैसे कोई किराएदार चुपचाप बिना किराया दिये मकान छोड़कर भाग जाता है। मगर मुश्किल यह है कि बिना किराया, फ्री-फंड के इस मकान इन्टरनेट पर कोई पता-ठिकाना ऐसा नहीं है जहाँ ये बदमाश आपको ढूँढ़ते हुए ना जा पहुँचें। आप चाहकर भी इनकी आपको मालामाल कर देने की चिरौरियों से बच नहीं सकते। एकबार आप इनके हत्थे लग भर जाओ, ये बिना थके यूँ आपके पीछे लग जाएंगे कि अरेबियन कहानियों का जिन्न भी शर्मा जाए।

सोमवार, 17 मई 2010

ब्लॉगिंग में ठलुआते हुए एक साल

//प्रमोद ताम्बट//
ब्लॉगिंग में ठलुआते हुए 15 मई को हमें एक साल पूरा हो गया। यू तो इसमें घुसने की जद्दोजहद हम 15 मई 2009 से भी पहले कई महीनों से कर रहे थे लेकिन कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में इसके चर्चे सुन-सुनकर दिमाग पर एक आतंक सा तारी था ब्लॉगिंग का, मगर इस आतंक से मुक्त होने के लिए ब्लॉगिंग की राह बताने वाला कोई नहीं था। सोचते थे कि एक टाँग लेखन में और दूसरी कम्प्यूटर में होने के बावजूद कम्बख्त यह ब्लॉगिंग हमारे अत्याचारों से महरूम कैसे रह सकती है। आखिर गूगल पर ढूढ़-ढूढ़कर पता चला कि ब्लॉगिंग है किस चिड़िया का नाम, फिर भी यह खोज काफी दिन तक चली कि आखिर हमारा सिर ब्लॉगिंग में कैसे घुसे।
जैसे तैसे www.blog.co.in का राज खुला और हमने हफ्तों की मेहनत के बाद इस पर अपना ब्लॉग बनाने में सफलता पाई, मगर फिर सबसे बड़ा एक सवाल सामने आ खड़ा हुआ कि इसमें पोस्ट कैसे लगाई जाए। पूरे बारह घंटे की मेहनत के बाद हमने देवनागरी फोन्ट में टंकित अपनी व्यंग्य रचनाओं को उसमें चिपकाने में सफलता पाई, और जब ब्लॉग खोला तो देखा कि वहाँ तो अंग्रेजी फोंट की खिचड़ी सी पकी हुई है। अब खोज का एक और क्षेत्र खुला कि कम्बख्त ये ब्लॉगर्स दुनियाभर को अपनी पोस्ट हिन्दी में पढ़वाने में कैसे कामयाब हो जाते हैं। फिर गूगल की शरण में जाना पड़ा। कई तरह की सर्च लगाने के बाद एक और नई बला सामने आई जिसका नाम था ‘यूनीकोड’। कम्प्यूटर के जितने जानकार मेरे परिचितों में थे उन दिनों उन सबसे मैंने इस बला के बारे में जानना चाहा, लेकिन कोई ठीक-ठीक बता नहीं पाया कि यह ‘यूनीकोड’ है क्या चीज़। कोई बोला यह एक तरह का कोड होता है जो किसी को नहीं मालूम होता है, किसी ने कहा यह तो परमाणु बम का कोड है जो कि प्रधानमंत्री के पास होता है और कोई हाँकने लगा, यह तो जैसे मास्टर की होती है वैसा एक कोड होता है जिससे दुनिया का कोई भी कम्प्यूटर खुल सकता है। जितने मुँह उतनी बातें। किसी ने तो यह भी कहा कि वो जो दवाइयों के रैपर पर बार कोडिग बनी होती है उसे यूनीकोड कहते हैं।
आखिर फिर गूगल काम आया और उसने हमें वेबदुनिया की यूटिलिटी तक पहुँचाया जहाँ देवनागरी को यूनीकोड में ट्रांसफर करने की सुविधा उपलब्ध थी। यह खोज हमारे लिए किसी हीरे की खदान से कम नहीं थी। तुरंत उसमें अपने व्यंग्य यूनीकोड में परिवर्तित ब्लॉग पर लगाएँ और उसका लिंक अपने कुछ परिचित-अपरिचितों को भेजा कि भैया पढ़ो हमने भी तीर मार लिया है।
मुझे याद है सबसे पहले श्यामल सुमन जी ने मुझे हड़काया कि भैये हिन्दी तो ठीक से लिखना सीख लो। श को ष लिख रहे हो, और भी कई गलतियों की तरफ उन्होंने मेरा ध्यान आकर्षित किया। गलती मेरी नहीं थी, वेवदुनिया के यूनीकोड कन्वर्टर में जो कमियाँ थी वे सब उस व्यंग्य में दिखाई दे रहीं थी। मैंने श्यामल जी को समस्या बताते हुए निवेदन किया कि कोई अच्छा यूनीकोड कन्वर्टर हो तो बताएँ। उन्होंने मुझे गूगल ट्रांसलिटरेशन का लिंक भेजा। इसमें रोमन में लिखना मुझे दुनिया का सबसे बोर काम लगा। चूँकि मुझे हिन्दी टाइपिंग आती थी इसलिए मैं चाहता था कि मेरे व्यंग्य फटाफट बिना किसी कान्हा-मात्रा, नुक्ते की त्रृटि के हुबहू यूनीकोड में परिवर्तित हो जाएँ, लेकिन आज जबकि मैं काफी बेहतर सुविधाओं का उपयोग कर रहा हूँ फिर भी ऐसा कोई कन्वर्टर मुझे अब तक नहीं मिला है जिसमें त्रृटिहीन कन्वर्शन हो जाए।( मेरे ब्लॉग व्यंग्य पर इस पोस्ट के बाद श्री रवि रतलामी जी ने मुझे एक त्रृटिहीन कन्वर्टर भेज दिया है।)
खैर, ‘व्यंग्य’ नाम का मेरा ब्लॉग चल निकला। मैंने अपने सम्पर्कों की सूची लगातार बढ़ाते हुए हरेक नई पोस्टिंग पर अपने ब्लॉग का लिंक और आलोचना समालोचना प्रतिक्रिया का निवेदन लोगों को भेजना शुरू कर दिया। लोगों ने प्रतिक्रिया में तारीफों की झड़ी लगा दी। कुछ लोगों ने मेरा निवेदन मानते हुए आलोचना और समालोचना भी की। एक बोला -है कौन बे तू, तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे मेल बाक्स में आने की ? खबरदार जो आइन्दा आया ! एक बहनजी बोलीं, तुम जैसे लफंगों को मैं खूब जानती हूँ, आइन्दा अगर ऐसी हरकत की तो पुलिस में कम्पलेंट कर दूँगी। हमने तुरंत ऐसे गुस्सैल आलोचकों को अपनी मेलिंग लिस्ट से बिदा किया। लेकिन फिर भी बहुत सारे लोगों ने दुनिया भर से ब्लॉग का तहेदिल से स्वागत किया और हमारे लेखन को खूब सराहा। तारीफों के वे पुलंदे मैंने अपने ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया के तहत सजा कर रखे हैं। हालॉकि सारी प्रतिक्रियाएँ मैं उसमें अब तक नहीं डाल पाया हूँ क्यों कि यह जो www.blog.co.in वेवसाइट है, अपने आप में बेहद नखरैल वेवसाइट है। मन होता है तो पोस्टिंग, एडिटिंग करने देती है, नहीं होता तो अपना थोबड़ा तक नहीं दिखाती। आज भी जब मुझे कुछ संदर्भों के लिए इसपर अपना ब्लॉग देखना है यह खुलने में नखरे कर रही है। इससे तंग आकर मुझे ब्लॉगस्पाट डॉटकॉम पर एक नया ब्लॉग ‘व्यंग्यलोक’ खोलना पड़ा। अभी मैं दोनों ब्लॉगों में बराबरी से पोस्टिंग करता हूँ।
इस समय तक हमें एग्रीगेटरों के बारे में मालूम नहीं था। जहाँ तक मुझे याद है माननीय दिनेश्वर द्विवेदी जी ने मुझे कई सारे एग्रीगेटरों के लिंक दिए जिनके साथ मैंने मशक्कत करके उनके लिंक अपने ब्लॉग पर लगाए, मगर मेरा अनुभव है कि इनमें से कोई भी एग्रीगेटर अच्छी तादात में पाठक मुहैया नहीं कर पाता। इसलिए मैं तो अब भी अपने ब्लॉग की, व्यंग्य रचनाओं की पसंद नापसंद का आकलन अपने व्यक्तिगत सम्पर्कों से प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर करता हूँ। एग्रीगेटरों पर बमुश्किल 5-10 से लेकर 20-25 पाठक मिलते हैं, जिसमें हमारा रिकार्ड तो 0 तक का भी है, प्रतिक्रियाएँ भी कभी कभी 1-2 मिल पातीं हैं ( अपवादस्वरूप व्यंग्य में इस पोस्ट पर 25 कमेन्ट मिले हैं ), लेकिन आंकड़ों के लिए हमारे द्वारा तैनात गूगल एनालेटिक्स की माने तो इस एक साल में हमारे ब्लॉग पर 56 देशों के 346 शहरों के 3000 से ज़्यादा विजिटर्स आ चुके हैं, 7500 से ज़्यादा विज़िट्स हो चुकी हैं। यह आंकड़े मेरे लिए बेहद उत्साहित करने वाले हैं, और देश विदेश के मेरे इन्हीं पाठक महानुभावों को धन्यवाद देने के लिए मैंने व्यंग्य से हटकर आज की यह पोस्ट लिखी है।
पिछले दिनों मैंने अपने इतने दिनों के अनुभवों के आधार पर परिकल्पना ब्लॉग के श्री रवीन्द्र प्रभात जी के अनुरोध पर परिकल्पना ब्लॉगोत्सव के लिए एक लेख ‘‘ब्लॉगिंग को परिवर्तन के हथियार के रूप में ढालने की जरूरत है......’’ लिखा था जो कि http://utsav.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_7114.html पर उपलब्ध है। आशा करता हूँ ब्लॉगिंग जगत में इसे समझने की कोशिश की जाएगी।
अंत में पुनः मैं अपने सभी प्रशंसकों, आलोचकों, समालोचकों, और विशेषकर अनुज खरे (व्यंग्यकार) जैसे मित्रों का आभार प्रकट करना चाहूँगा जो लगातार मुझे उत्साहित करते हुए लेखन की ऊर्जा प्रदान करते रहते हैं। मैं उन बलाओं का भी तहेदिल से शुक्रिया अदा करना चाहूँगा जो मुझे पाज़ीटिव एनर्जी प्रदान करती रहती हैं जो कि सृजन के लिए बेहद ज़रूरी है।

रविवार, 2 मई 2010

व्यंग्य-संतई का संभावनापूर्ण रास्ता


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

     इन दिनों झूर के संत बनने का मन कर रहा है। क्या मजे है संतों के! बड़े-बड़े वातानुकूलित आश्रम, बड़ी-बड़ी लक्झरी गाड़ियाँ, धन-दौलत, सुख-समृद्धि, आनंद-मंगल सभी कुछ! सबसे बड़ी बात दर्जनों भक्तिनों का प्रेम-भक्तिभाव, ऐसा स्वर्णिम अवसर भला और किस धंधे में मिलता है! वैसे तो हर कहीं औरतों को निहार भर लेने से महिला उत्पीड़न का आरोप और बेभाव जूते पड़ने की सीधी संभावना प्रबल बनी रहती है। एक यही संतई का धंधा ऐसा है जिसमें विशेष आशीषाभिलाषिनों को किसी भी कोण से, किसी भी प्रकार का आशीर्वाद दे दो लाभदायक होता है।
    जवानी से लेकर इस अधेड़ावस्था तक क्या-क्या लंपटयाई नहीं की! लम्बी-लम्बी ज़ुल्फें रखीं, रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर छैला बने घूमे, दर्जनों बालाओं के इर्द-गिर्द भँवरों की तरह मंडराए, फेरे मारे, चप्पलें घिसीं, मगर परिणाम अनुकूल  नहीं आए। फिर फिल्मी कवियों-शायरों के अनुयाई बनकर पथभ्रष्ट हुए, कविताई की, शायरी लिखी, मगर मछुआरे सी तपस्या के अभाव में एक मछली तक जाल में नहीं फाँस पाए। उस वक्त यह अक्ल नहीं आई कि लफूटियाई छोड़कर कहीं छोटा-मोटा  आश्रम डाल लेते, सन्यास धारण कर लेते, आशीर्वाद देने का धंधा करते, तो काम आसानी से बन जाता, और आज एक-दो नहीं दर्जनों दुःखी आत्माएँ अपना तन-मन-धन अर्पण कर स्वेच्छा से आश्रम में पड़ी रहतीं, जब जिसको जी चाहे आशीर्वाद दे लेते, सम्पन्न भक्तों से भी दिला देते।
    ज़िन्दगी भर सर पटकते रहे कि कहीं कोई छोटा-मोटा धंधा कर लेंते जो आगे जाकर विशाल नेटवर्क का रूप ले सके, मगर फालतू पूँजी और नसों-नाड़ियों में धंधे के उस कला-कौशल का उद्याम प्रवाह ना होने के कारण यह संभव नहीं हुआ। संत हुए होते तो ना पूँजी की ज़रूरत होती ना किसी पुश्तैनी कला-कौशल की- स्वयंस्फूर्त आयोजना से दुनिया के सबसे पुराने धंधे के एक विशाल रैकेट का निर्माण निश्चित रूप से हो सकता था जिसके सफल प्रबंधन के माध्यम से हम किसी छोटे-मोटे साम्राज्य का सुख तो भोग ही सकते थे, मगर जीवन में कभी कोई प्लास्टिक का रैकेट तक हाथ में पकड़ा हो तब ना दूसरा कोई रैकेट पकड़ पाते।
    सुनहरे भविष्य के सपनों की दुनिया में ऐसे मदहोश रहे कि धन के मुक्त प्रवाह का उद्गम और दिशा ही देख ना पाए, छोटी-मोटी, घटिया सी चाकरी को ही ऐशो-आराम और जीवन का सार समझते रहे, ताड़ ही नहीं पाए कि असली ऐश तो वहाँ हैं जहाँ छूछा पुण्य भर बाँटने के बदले में अकूत धन मिलता है, वास्तव में जो जीवन का सार है। अन्दाज़ा ही नहीं लगा पाए कि बड़े-बडे़ ओहदेदारों का लाइन लगाकर आश्रम के दरवाजे पर खडे़ रहने का सुख क्या होता है, जिनके खुद के दरवाज़े पर आम जनता लाइन लगाए खड़ी रहती है। ये ओहदेदार अपनी-अपनी ओहदादारी के हिसाब से सेवाएँ भी देते रहते हैं और आश्रम में सम्पन्न हो रहे गोरखधंधों पर पर्दा डालने के साथ ही साथ केश और काइंड में मोटे-मोटे चढ़ावे भी पेश करते हैं। आश्रम के किसी कोने में हत्या, आत्महत्या, बलात्कार, ड्रग कारोबार जैसा, भारतीय दंड संहिता में वर्णित मामूली सा अपराध घटित  हो जाए तो प्राण-प्रण से जान बचाने के लिए दौड़ भी पड़ते हैं।
    कभी-कभी मति मारी जाती है तो आदमी संभावनापूर्ण रास्तों को छोड़कर आलतू-फालतू रास्तों पर चला जाता है। संतई का रास्ता ऐसा विकट संभावनापूर्ण रास्ता है जिसमें सन्यास का अद्भुत आनंद भी है और क्षूद्र सांसारिकता का सुख भी। अब भी समय है, बीती ताहि बिसार कर आगे की सुध लें, तो जिन्दगी का कुछ मज़ा आए।