गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

गरीब सब कुछ खा गए है


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

               
        एक नए रहस्य का पर्दाफाश हुआ है। गरीबोंकी पोल खुल गई है। एक तरह से कहा जाए रंगे हाथोंकी तर्ज पर वे रंगे पेटपकड़े गये हैं। पैसठ सालों से हम हैरान-परेशान थे कि आखिर कम्बख्त यह महँगाई बढ़ती क्यों है? राजनीतिज्ञों ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए, अर्थशास्त्रियों ने एक से एक भारी-भरकम सिद्धांत पेले, मगर असली चोर अब पकड़ में आया है। ये साले गरीब देश का सारा अन्न भकोस-भकोस कर महँगाई को हवा दे रहे हैं।

            कुछ दिन पहले मैंने बाज़ार जाने की हिम्मत की थी। आलू-प्याज और दूसरी तमाम सब्जियों के दाम आसमान पर थे। माजरा अब समझ में आया है। गरीब आसमान में बैठकर दना-दन सब्जियाँ, आलू-प्याज खा रहे थे। कुछ समय बाद दाम कुछ कम हुए, जरूर गरीबों को अमीरों पर रहम आ गया होगा और उन्होंने अपने खाने की तादात और गति पर लगाम लगा ली होगी। अंडा, मटन-मच्छी की दुकान पर जाने में तो मेरी आज भी रूह काँपती है, गरीब-गुरबे इस कदर नानवेज खा रहे हैं कि उसकी कीमत हमेशा सातवे आसमान पर ही रहती है। ये गरीब जरूर लोगों को पूरी तौर पर वेजीटेरियन बनाकर छोड़ेंगे।

  एक दिन मैं रेडीमेड कपड़ों की दुकान पर गया, पैंट-कमीज़ खरीदने, लेकिन कमीज़ के भाव सुनकर मुझे गश आते-आते रह गया इसलिए मैंने पैंट की कीमत तो पूछी ही नहीं। पूछता तो शायद हार्ट अटैक का सामना करना पड़ता। अब तक मेरी खोपड़ी में यह सवाल घूम रहा है कि आखिर एक अदद कमीज़ की कीमत उस दुकान के सेल्समेन की तनख्वाह से दो-गुनी कैसे हो सकती है। सेल्समेन की तनख्वाह देढ़ हज़ार और कमीज़ की कीमत तीन हज़ार थी। अब पता चला देश के गरीब ब्रांडेड पैंट-कमीजे़ं पहन-पहनकर उनके दाम बढ़ा रहे हैं।

                इन गरीबों ने देश में महँगाई ही नहीं बहुत कुछ बढ़ाया है। जैसे गुरबकों ने गरीबी ही बढ़ा मारी। वे देश वासियों की क्रय शक्ति ही खाकर बैठ गए हैं, गरीबी तो बढ़ना ही है। उन्होंने बेरोज़गारी बढ़ाई है, क्योंकि वे रोजगार की संभावनाएँ खाए बैठे हैं। उन्होंने जमाखोरी-कालाबाज़ारी बढ़ाई है, क्योंकि वे कायदा-कानून पचा कर बैठे हैं। और तो और उन्होंने भ्रष्टाचार बढ़ाया है क्योंकि वे रात-दिन देशवासियों की ईमानदारी की कमाई खाते रहते हैं। भूखे मरने की नौबत न आ जाए इसलिए लोग रिश्वत और कमीशन खाकर अपनी जान बचाते हैं। किसी को यह बात मालूम नहीं है, मैं बता दूँ कि ये गरीब देश के पूँजीपतियों, नेता मंत्रियों, अधिकारियों-कर्मचारियों और ईमानदारी से मेहनत करके, खून-पसीना बहाकर कमाई गई धन-दौलत को अत्यंत चाव से खाने के शौकीन न होते, तो कसम से देश में इतना भ्रष्टाचार कभी नहीं होता।
                जब से महँगाई बढ़ने के अत्यंत गोपनीय राज का पर्दाफाश हुआ है, मेरी बेचैनी बढ़ गई है। मेरी हार्दिक इच्छा है कि जितनी जल्दी हो सके मुझे उस कमीशन का चेयरमैन बना दिया जाए, जो इस मामले में कम से कम दस बोरी कागज़ खर्च करने की ज़रूरत से गठित किया जाएगा। मैं अपनी रिपोर्ट मैं इन गरीबों का सूपड़ा साफ करने के प्रभावी तौर-तरीकों पर अपने अमूल्य सुझाव दे दूँगा। मगर मुझे मालूम है ऐसा नहीं होने वाला, क्योंकि ये गरीब शिखर पर बैठे नीति-नियंताओं का सारा ज़मीर तक खाकर हज़म कर चुके हैं, इसलिए देश में भाई-भतीजावाद और बहन-भाँजावाद बहुत बढ़ गया है। गरीब सब कुछ खा गए हैं इसलिए देश में हर कुछ अब चरम पर पहुँच गया है।

मंगलवार, 26 मार्च 2013

होली की छूट का फायदा (बुरा न मानो होली है)

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//

      होली के मौके पर वासंती फिज़ाओं में चारों ओर एक नारा डूबने-उतराते लगता है- होली है भई होली है, बुरा न मानो होली है। शहर भर के हुड़दंगीलाल हुरियारे दूसरे तमाम होली-भीरू नर-नारियों को खुली चेतावनी सी देते घूमते हैं कि- सुन लो भैया होली है, और भारतीय संस्कृति ने हमें जन्मसिद्ध अधिकार दिया हुआ है, हम तुम्हारे मुँह पर पान की पीक थूक सकते हैं, मूत्र त्याग कर सकते हैं, कालिख, कीचड़-गंदगी का मोटा पलस्तर चढ़ा सकते हैं, तुम्हारे कपड़े फाड़कर दिगम्बर अवस्था में बदबू और संडांध भरे गटर के मेनहोल में तुम्हें डुबकी लगवा सकते हैं, देसी ठर्रे की अख्खी बोतल चढ़ाकर तुम्हारी माँ-बहन एक कर सकते हैं, तुम साले क़तई बुरा नहीं मानना। जो तुमने बुरा मानने की जुर्रत की तो फिर किसी अच्छे अस्थि विशेषज्ञ का नाम-पता और फीस की पूछताछ भी लगे हाथों कर रखना, होली की पारम्परिक छूटका फायदा उठाकर हम तुम्हारे हाँथ-पाँव तोड़ने की क्रिया भी अंजाम दे सकते हैं।

खान्दानी आशिक मिज़ाज हुरियारों को होली का विशेष इंतज़ार रहता है। उनकी पवित्र इच्छा रहा करती है कि उन्हें भँग की तरंग में दूसरों की बीवियों, बहन-बेटियों के तन पर रगड़-रगड़कर रंग-गुलाल लगाने की विशेष छूट दी जाए और इस कृत्य को देखकर कोई भी इज्ज़तदार इंसान क़तई बुरा न माने। कुछ टपोरी किस्म के अत्योत्साही बंदे साल भर होली का इंतजार ही इसलिए करते हैं कि बुरा न मानो होली हैकी सार्वजनिक अपील की आड़ में अपने प्रिय सामाजिक शत्रुओं की जम कर लू उतारने का मौका मिले। किसी पर भयंकर कोटि के शाब्दिक भाले-बर्छियों की बौछार करने, किसी की छीछालेदर करने, या किसी की इज्ज़त का पंचनामा बनाने का इससे अच्छा मौका और कौन सा हो सकता है। बीच चैराहे पर किसी की भी पगड़ी हवा में उछाल दो और धीरे से यह नारा छोड़ कर चलते बनों -होली है भई होली है, बुरा न मानो होली है।

                अर्सा पहले शर्म लिहाज के युग में, भारतीयों के किसी भी छोटी-मोटी बात पर बुरा मानकर चुल्लू भर पानी में डूब मरने के लिए दौड़ पड़ने का बड़ा जबरदस्त भय हुआ करता था, इसलिये चोरको मुँह पर चोरशब्द फेंककर मारने की बजाए लोग सब्र से साल भर होली की प्रतीक्षा करते थे और चोर को अच्छी तरह से आगाह करने के बाद कि भई बुरा न मानना, होली है, उसे चोरकह लिया करते थे। इतने में ही अगला शर्म के मारे पानी-पानी हो जाता था और आत्महत्या करने पर उतारू हो पड़ता था। मगर आजकल जमाना बदल गया है। प्रोफेशनल बेशर्मो से भरी इस दुनिया में सचमुच बुरा मानने वालों का जबरदस्त टोटा है, आरोपों की भारी से भारी चार्जशीट पाकर भी कोई बुरा मानने का नाम नहीं लेता। वक्त के तकाज़े का हवाला देकर किसी को बुरा मानने का मात्र अभिनय भर करने के लिए कहा जाए तब भी वह बुरा नहीं मानेगा। बिजली के खंभों पर लाउड स्पीकर के चैंगे लगाकर भी यदि आप ऐलानिया तौर पर चोर को चोरसम्बोधित कर चिल्लाएंगे तब भी वह बुरा नहीं मानेगा। होलीका खास मौका हो या रोज़मर्रा का कोई साधारण दिन, डाकू को डाकू कहिये, ठग को ठग कहिये, जालसाज़-घोटालेबाज़ को जालसाज़-घोटालेबाज़ कहिये, कातिल को कातिल, बलात्कारी को बलात्कारी कह दीजिए, वह बुरा मानने से रहा। बोल-बोल आपका मुँह दुख जाएगा, आप मानसिक रूप से थक कर चूर हो जाएंगे मगर फिर भी वह दाँत निपोरता आपके सामने खड़ा मुस्कुराता रहेगा। इतना ही नहीं, वह पूरी शिद्दत से अपनी और भी दो-चार महान खूबियाँ का बखान आपके सामने करके फिर आपसे कहेगा, हाँ अब मेरी बुराई करो, मैं बिल्कुल बुरा नहीं मानूँगा।

चरम भ्रष्टाचार के रंग में रंगे इस युग में आप रात-दिन भ्रष्टों के कान में भ्रष्टाचार के भारी-भरकम आरोपों का पारायण करते रहिये मगर उनके कानों पर जूँ भी रेंग जाए तो मजाल है। हाँ, यदि आप किसी राह चलते आदमी को धोके से ईमानदारकह दें तो बहुत संभव है कि वह आपके पीछे जूता लेकर दौड़ पड़े और मार-मार कर आपकी टाट गंजी कर दे। इतना ही नहीं, हो सकता है अपनी इस बेइज्जती के लिये वह आपको माननीय अदालत तक घसीट कर ले जाए और आप पर पाँच-दस लाख का मानहानी का मुकदमा ठोक दे। 

                भारत जैसे प्रचंड लोकतांत्रिक देश में अगर कोई यूँ ही बैठेठाले बुरा मानने लग पड़े तो उसे पागल कुत्ते का काटा मानकर तुरंत कुत्तों के डाक्टर के पास ले जाया जाना चाहिए। जब हिस्ट्रीशीटर चोर-डाकू, ठग-धोखेबाज़ माफिया-बलात्कारी का तमगा छाती पर लटका होने के बावजूद समाज में, घर-बाहर, राजनैतिक अखाड़ों, देश के शिखर संस्थानों में बेशर्मों के लिए प्रचंड मान-सम्मान पाने की प्रचूर संभावनाएँ सामने हिलोरें लेती रहतीं हों, तो फिर आखिर क्यों कर कोई बिना मतलब बुरा मानता फिरेगा, फिर चाहे होली हो या और कोई दूसरा दिन!  

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

आओ घर में दुबक कर वेलेन्टाइन डे मनाएँ


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

माई डियर वेलेन्टाइन,
फिर वो मनहूस दिन आ गया है जिस दिन लाख एहतियात बरतने, लुकने-छुपने के बावजूद पिछले आठ बरस से बिलानागा हम भारतीय संस्कृति के हाथों पिटते आ रहे हैं। तुम्हें याद होगा जानेमन, कि पिछले उन आठ वेलेन्टाइन डेज़ में हमने तीन बार सार्वजनिक पार्कों में थप्पड़ खाए, दो बार महँगे रेस्टोरेंट से (आधा फास्ट फूड और कोक छोड़) मुँह छुपाकर भागे, दो बार कोतवाली में कान पकड़कर उठक-बैठक लगाने के बावजूद दो-दो सौ रुपये की रिश्वत देकर छूटे और एक बार बिरला मंदिर की सीढ़ियों पर आधा घंटे तक मुर्गा-मुर्गी बनाकर खड़े किये गए। मोहल्ले के बच्चे कम्बख़्त अब तक कुकुड़-कू, कुकुड़-कू की आवाज़ निकाल कर चिढ़ाते हैं। प्रिये, इसलिए अब हमने कसम खा ली है कि भले ही सरकार हमें बन्दूक का लायसेन्स बनवा दे, या मिलेट्री की सुरक्षा मुहैया करा दे, भले ही अपोजिट पार्टी के गुंडे हाथों में डंडे-झंडे लेकर हमारी रक्षा के लिए सड़कों पर उतर पड़ें, या अपने मम्मी-पापा ही पीछे खड़े होकर अपन को आशीर्वाद दें, कि मनाओं बेटा वेलेन्टाइन डे’, मगर हम वेलेन्टाइन डे पर किसी सूरत में घर से बाहर नहीं निकलने वाले।


प्रिये, उस महान संत को क्या पता था कि वे जिस डेको दुनिया की सबसे खूबसूरत नेमत के लिए मुकर्रर कर रहे हैं, भारतभूमि पर उसकी कैसी छिछालेदर होने वाली है। उन्हें अगर ज़रा भी अन्दाज़ होता कि इस पवित्र दिन हमारे देश में प्रेमी जोड़ों को जगह-जगह अपनी इज्ज़त का फालूदा करवाना पडे़गा और पार्कों-उद्यानों नदी-तालाबों के मनोरम किनारों से चप्पल-जूते छोड़कर भागना पड़ेगा तो वे वेलेन्टाइन डे को भारतभूमि पर न मनाने का उपदेश भी साथ ही साथ दिये जाते। पता नहीं संत वेलेन्टाइन पहले हुए थे या मथुरा-वृन्दावन के ग्वाले, मगर राधा-कृष्ण इस मामले में बड़े सौभाग्यशाली कहे जा सकते हैं जो द्वापर में ही रासलीला रचाकर चले गए, इधर कलयुग तक अगर निकल आते तो मुन्सीपाल्टी के बाग-बगीचों में उन बेचारों की क्या गत होती हम ही समझ सकते हैं।


प्रियतमें, तुम समझ रही हो ना कि आजकल का माहौल कितना उजड्ड हो गया है। देश के पार्कों में लड़कियों के साथ खुले-आम छेड़-छाड़, गुंडागर्दी बलात्कार की तो खुली छूट है, परन्तु प्रेम-विरहियों को मिलने की इजाज़त नहीं है। भारतीय संस्कृति के रखवाले तब डंडा लेकर नहीं घूमते जब सड़क पर किसी अबला की इज्ज़त लुट रही होती है, मगर तब वे कुकरमुत्तों की तरह निकल आते हैं जब वेलेन्टाइन डे करीब आने लगता है।


      प्रियतमा, आशा है तुम्हारा ब्लडप्रेशर नार्मल होगा, मेरे हाथ-पाँव भी अभी काँपना शुरू नहीं हुए हैं। फिर भी तुम कहो तो वेलेन्टाइन डे के दिन हम कहीं चोरी-छुपे मिलने की बजाय किसी अच्छे डाक्टर का एपाइंटमेंट लेकर कम्पलीट चेकप करा लेते हैं। दवा-गोली साथ में रहेगी तो हौसला रहेगा। आओ इस बार हम घर में ही दुबक कर वेलेन्टाइन डे मना लें! तुम अपने घर और मैं अपने, किसी को हवा भी नहीं लगेगी। मगर क्या भरोसा घर में बैठे संस्कृति के रक्षक ही हमारी पिटाई कर दें तो फिर अपन क्या करेंगे!

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

बलात्‍कारियों की गुप्‍त मीटिंग


//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

अभी-अभी खबर मिली है कि दिल्‍ली में वरिष्‍ठ बलात्‍कारियों की एक गुप्‍त मीटिंग हुई है। इस क्‍लोज़ मीटिंग में बड़ी संख्‍या में अनुभवी बलात्‍कारियों ने बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लिया और हाल ही में चलती बस में हुई सामुहिक बलात्‍कार की एक घटना की ञृटियों-खामियों पर गम्‍भीरतापूर्वक विचार विमर्श किया। बलात्‍कारियों ने सबसे पहले अपने उन बलात्‍कारी साथियों को सफलतापूर्वक पकड़ लिए जाने की आश्‍चर्यजनक घटना पर पुलिस वालों की कड़े शब्‍दों में निन्‍दा एवं भर्त्‍सना की उसके बाद बारी-बारी से अपनी सामाजिक चिन्‍ताएँ साझा की।

बलात्‍कारियों के नेता ने मीटिंग में जबरदस्‍त हुंकार भरते हुए कहा कि- हम उन नपुंसकों एवं नामर्दों की र्इंट से ईंट बजा कर रख देंगे जो हमें हमारे जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित करना चाहते हैं। उन्‍होंने उपस्थिति बलात्‍कारियों के समक्ष एक क्रांतिकारी नारा दिया कि - बलात्‍कार हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, इसे हमसे कोई नहीं छीन सकता। नेता ने इस नारे के नीचे सभी बलात्‍कारियों को एक जुट होने का फतवा जारी किया।   

नेता के भाषण से उत्‍साहित होकर एक बलात्‍कारी जो मुँह ढापे चुपचाप सभा में बैठा था अचानक चौक कर आश्‍चर्य से चिल्‍लाया- अच्‍छा, यह बात हमें तो पता ही नहीं थी, हम फालतू में अपना मुँह छुपाए फि‍र रहे हैं। कोई चीज़ जन्मसिद्ध अधिकार हो तो फिर खामोखां डरने की क्‍या बात है। इससे पहले कि ये शरीफज़ादे एकजुट हो जाएँ हम सबको एकजुट होना ज़रूरी है। 

एक अन्‍य बलात्‍कारी जिसकी आँखों में धन से ज्‍़यादा वासना की भूख दिखाई दे रही थी उत्‍तेजित होकर चीखने लगा- इन कम्‍बख्‍तों को आईन-कानून का कोई खयाल ही नहीं है। अरे हम ही अगर हाथ पर हाथ बैठे रहेंगे तो तुम क्‍या अपने कानून की किताबों को बैठकर चाटोगे ? जब बलात्‍कारियों के खिलाफ बढ़िया कानून बने हुए हैं तो फि‍र हमें स्‍वतंञतापूर्वक बलात्‍कार भी तो करने दो। तभी तो पता चलेगा कि कानूनों का पालन होता भी है या नहीं होता। हमें अपना काम करने की स्‍वतंञता होना चाहिए कानून तो हमेशा अपना काम करता ही है।   

एक और बलात्‍कारी उठकर रोष प्रकट करने लगा- ये लो हमें कमज़ोर समझ रहे हैं मिञों, तभी तो फाँसी दो फाँसी दो की रट लगाए बैठे हैं, जैसे हमारी कोई सुनेगा ही नहीं। फि‍र किस-किस को फाँसी दोगे बाबा ! हम तो घर-घर में घात लगाए बैठे हैं, एक ढूँढ़ोगे तो हज़ार की तादात में मिलेंगे, कर लो क्‍या करते हो।

एक जवान बलात्‍कारी जिसे इस क्षेञ में बहुत ज्‍़यादा अनुभव नहीं था उठकर बोलने लगा- आप सब अनुभवी बलात्‍कारियों से निवेदन है कि हम जैसों के लिए भी कुछ करें जो बस आँखों ही से बलात्‍कार कर लेने के लिए मजबूर हैं ज्‍़यादा हुआ तो फब्‍तियों से बलात्‍कार कर लेते हैं या सीटियाँ से। यह भी कोई जि़न्‍दगानी है, कानून-पुलिस के डर के मारे इससे ज्‍़यादा कुछ कर ही ना पाओ। थोड़ा और खुलापन देश में आना चाहिए ताकि हम भी ठीक से बलात्‍कारियों की जमात में गिने जा सकें।    ्‍या िदृध अधिकार हो तो ्रो ्रि  

और इसके बाद इन बलात्‍कारियों ने देश भर में आम जनसाधारण एवं महिलाओं द्वारा बलात्‍कारियों को फाँसी की सजा की की जा रही माँग के विरुद्ध एकजुट होने अपने हितों की रक्षा के लिए मानवाधिकार संगठनों की लाँबिंग करने एवं मानवाधिकार आयोग के समक्ष अपने बुनियादी अधिकारों की रक्षा की गुहार लगाने के निर्णय का सामुहिक प्रस्‍ताव पास किया, एवंिन्‍दा जनक लात्‍कारियों के पकड़े प्रधानमंञी से मिलकर अपना चार्टर ऑफ डिमांड उनके समक्ष प्रस्‍तुत करने का सैंद्धांतिक निर्णय लिया। समझा जाता है कि बलात्‍कारियों को प्रधानमंञी महोदय की चुप्‍पी से बहुत आशाएँ हैं। हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्‍वास है कि आज नहीं तो कल अवश्‍य बलात्‍कारियों की ही सुनी जाएगी और उनके बुनियादी अधिकारों की रक्षा भी हो जाएगी, क्‍योंकि अपने देश का तो ऐसा है कि सीधे-साधे नागरिकों कि भले खटिया खड़ी हो जाए, मगर अपराधियों का बाल भी बांका नहीं होना चाहिए।

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

अपनी तो पौ-बारह हो गई



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
             ज़िन्दगी भर घास छीली, अब जाकर मेहनत सफल हुई, भैयाजी मनीस्टरबन गए। हमने अपनी पूरी जिन्दगानी भैयाजी की चम्मचगिरी में स्वाहा कर दी। जहाँ- जहाँ भैयाजी रहे, हम उनकी फटी चप्पल की नाई उनके पाँवों से चिपटे रहे, जब-जब भैयाजी ने आवाज लगाई, हमने भैयाजी के चरणों के नीचे अपने पलक-पॉवड़े बिछा दिये, और जब-जब भैयाजी ने अपनी बैल सी गरदन उठाकर ऊपर की ओर ताका, हम झट से उनके लिए पोर्टेबल सीढ़ी बन गए। आखिरकार बरसों-बरस की कड़ी तपस्या और संघर्ष आखिर रंग लाया, भैयाजी मनीस्टरबन ही गए।
भैयाजी जब टाकीज़ में टिकटों की ब्लेकमेलिंग किया करते थे, हम उनके चम्मच थे। भैयाजी जब मुन्सीपाल्टी में राशनकार्ड, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने की दलाली करते थे, हम उन के चम्मच थे, भैयाजी जब कलेक्टरी में जाति प्रमाणपत्र, मूल निवासी प्रमाणपत्र, बन्दूक के लायसेंस बनवाने की दलाली करते थे, हम उनके चम्मच थे, भैयाजी जब आर.टी.ओ. में लायसेंस परमिट की दलाली में आए, हमने उनका तन-मन से साथ दिया। भैया जी जब राष्ट्रीय-अन्तर्राट्रीय स्तर के सौदे पटाने लगे, हमने उनकी सफल पीए गिरी की। बदले में भैयाजी ने जो भी धनदिया हमने भगवान का प्रसाद समझकर जेब में रख लिया। भैयाजी की कृपा से मिली इसी खुरचन को जमा कर-कर के इस गुलाम ने प्रापर्टी की दलाली का यह छोटा सा बिजनेस प्रारम्भ किया। अब चूँकि भैयाजी मनीस्टरबन गए हैं तो अब हमें यह दल्लेगिरी करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है। हमारी सामाजिक-राजनैतिक जिम्मेदारियाँ इतनी बढ़ गई हैं कि क्या बतावे। अब हम भी अपना यह छोटा सा कारोबार मंथली के रेट से किसी को सौंप कर भैयाजी के साथ-साथ देश की सेवा के लिए मैदान में उतरने वाले हैं।
            दलाली, पार्षदी, चेयरमेनी, विधायकी आदि-आदि तरक्की की सीढ़ियों पर भी हमारे सिर पर कुछ कम काम नहीं थे, सारे दंद-फंद हम ही को सम्हालना पड़ते थे।  अब तो भैयाजी चूँकि पहली बार मनीस्टरबने हैं तो हमें तो सॉस लेने की फुरसत मिलने वाली नहीं है। भैयाजी का सच्चा चम्मच साबित होने की परीक्षा सही मायनों में तो अब शुरू हुई है। चमचों की भीड़ में एक सफल चमचा बनकर उभरना कोई मामूली बात नहीं है, एड़ी चोटी के बीच का जोर लगाकर दम साधे रहना पड़ता है। कौन आकर खो कर जाएगा कोई भरोसा नहीं रहता।
लायसेंस, कोटा, परमिट, टेन्डर, ट्रांसफर-पोस्टिंग-एपाइंटमेंट, और न जाने क्या-क्या। रात-दिन बस काम ही काम। इस सबमें भैयाजी की फिक्सिंग आखिर हमी तो करवाएँगे। उसके बाद लेन-देन का प्रापर हिसाब रखना, प्रापर्टी, इन्वेस्टमेंट, नईं-नईं बिजनेस डील, पार्टनरशिप, शेयर-डिबेंचर, इत्यादि-इत्यादि मामलों की पकड़ उस गधेको तो बिल्कुल ही नहीं है, वह सब हमको ही तो लुक आफ्टर करना पडे़गा।
            सबसे बड़ी समस्या यह है कि समय बहुत कम बचा है, और काम बहुत पड़ा है। साल डेढ़ साल के लिए कोई मनीस्टरबने तो चाहे कितने हाथ-पैर मार ले, आखिर क्या उखाड़ लेगा! और फिर, भैयाजी की किस्मत बहुत ही खराब है, क्योंकि उनके मनीस्टरबनने से पहले ही देश में सारे बड़े-बडे़ घोटाले हो चुके हैं अब भैयाजी को करने के लिए बचा ही क्या है। मगर फिर भी हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि भैयाजी जैसी शातिर प्रतिभाएँ हाथ पर हाथ धरे बैठने के लिए नहीं पैदा होती हैं। कुछ न कुछ कहीं न कहीं से भैयाजी कूट ही लेंगे। भैयाजी जैसा काबिल मनीस्टरहै तो अपनी तो पौ-बारह हो गई, अपन को कौन रोक सकता है बहती गंगा में हाथ धोने से।