गुरुवार, 7 नवंबर 2013

मंगूदादा और मंगल अभियान


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
मंगू दादा उर्फ मंगलसिंह आज थोड़े से खफ़ा हैं। उनकी खफ़गी का पहला कारण तो यही है कि मंगल पर कुछ भेजें या न भेजें इस बाबत् उनसे राय क्यों नहीं ली गई। दूसरा मुद्दा यह है कि यान में ‘बंदर’ क्यों नहीं भेजा गया! बंदर जाता और जिंदा वापस आ जाता, तभी तो पता चलता कि मंगल पर ‘कब्ज़ा’ करने में कोई रिस्क है या नहीं। मंगू दादा की गैंग जो अब तक शहर के कई हिस्सों में कब्ज़ा करके झोपड़-पट्टी बना चुकि है, मुस्तैदी से कमर कस के तैयार है कि कोई नई जगह मिले तो झोपड़-पट्टी स्थापन की आगामी योजना को मूर्त रूप दिया जावे।

तीसरा मुद्दा यह है कि मंगलयान के साथ कोई सर्वेयर-इंजीनियर-आर्किटेक्ट भेजने की कोई ज़रूरत क्यों नही महसूस नहीं की गई। वे लगातार बड़बड़ा रहे हैं-‘‘हद होती है मिसमैनेजमेंट की, कैसे-कैसे बेवकूफ घुस गये हैं इसरो में। आखिर कैसे ‘मंगल’ का खसरा-अक्स बनाया जाएगा, कैसे साइट डेवलपमेंट की प्लानिंग होगी, कैसे प्लाटिंग के नक्शे तैयार होंगे, किसी को चिंता ही नहीं है। ऐसा थोड़ी है कि बस ज़मीन पर कब्जा करके प्लाट बेच दो, फिर बेचारे खरीददारों को अपना प्लाट ढूँढ़ने में नानी याद आ जाए।’’ मंगूदादा का काम पुख्ता होता है बाकायदा सारी परमीशंस, कागज़ात, मय रजिस्ट्री के वे ज़मीन के प्लाट बेचते हैं, किसी को धोखा नहीं देते, कब्जे़ की ज़मीन हो तो क्या हुआ।

मंगल पर ‘खनिज संपदा’ का पता भी लगाया जाएगा। मंगूदादा खदान आवंटन के लिए कागज़ात तैयार करने तक की मोहलत न दिये जाने पर भी इसरो से नाराज़ हैं। उनका कहना है कि इसरो सोना-चाँदी, और हीरा-पन्ना आदि के खनन व्यवसाइयों के हाथों बिक चुका है, उसे मिट्टी-मुरम-कोपरा के खदान मालिकों की बिल्कुल चिन्ता ही नहीं है। मंगूदादा ने जब से सुना है कि मंगल पर ‘लाल मुरम’ बहुतायत में है वे तब से हिसाब लगा रहे हैं कि उनके पास उपलब्ध वैध-अवैध संसाधनों से कितनी मुरम वे साल भर में खोदेंगे और कितनी मुरम पर ‘मंगल सरकार’ को ‘रायल्टी’ देंगे और कितनी खा जाएँगे।

मंगूदादा परेशान हैं कि ‘मीथेन’ क्या होती है! उन्होंने तो आजतक सिर्फ दो ही गैसों के बारे में सुना था, जिसमें से एक से तो उनके ‘निजी’ ताल्लुकात हैं और दूसरी है ‘रसोई गैस’। यह तीसरी गैस कहाँ से आ गई उनके लिए चिंता का विषय है। उनका सवाल है कि ‘‘जब रसोई गैस की इतनी किल्लत है देश में, तो उसे खोजने की बजाय ये लोग ‘मीथेन’ की खोज क्यों कर रहे हैं!’’

मंगल के ‘वायुमंडल’ में ‘पतंग’ उड़ सकती है या नहीं, इससे ज्यादा महत्व वायुमंडल का मंगूदादा के लिए और कुछ नहीं। मंगूदादा के हिसाब से इस अभियान में महत्वपूर्ण मुद्दों की अनदेखी हुई है, पैसा खाया गया है। इसकी तुरंत जाँच होना चाहिए, ताकि मंगलयान को वापस बुलाकर उसमें ये मुद्दे भी जोड़े जा सकें।    

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रविवार, 3 नवंबर 2013

धनलक्ष्‍मी के आगमन के इंतज़ार में

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
‘दीपावली’ और ‘धन’ का रिश्‍ता बड़ा सगा-सगा और नज़दीक का सा है। क्‍यों, पता नहीं। सामंती दौर की उत्‍साहवर्धक परम्‍परा थी कि राज्‍यों की सेनाएँ अक्‍सर एक-दूसरे से मारा-कुटी कर लेने के बाद जीती हुई सेना शञुओं का तमाम माल-असबाब लूट कर अपने राज्‍य में ले आती थीं। वापस आकर वे उस लूट के माल को जनता में बाँटती थीं या सब कुछ राजा ही हड़प लेता था पता नहीं, परंतु लगता है लंका पर फतह हासिल करने के बाद रामचन्‍द्र जी और उनकी सेना ने लंका से उखाड़-उखाड़ कर लाए सोने की ईंट-पलस्‍तर दो-दो, पाँच-पाँच तोले की पेकिंग में बंधवाकर अपने नागरि‍कों के बीच बाँटी होंगी। शायद परम्‍परा की उसी निरन्‍तरता में भारतीय जन-गण आज भी दीपावली पर पलक-पॉवडे़ बिछाए बाँट जोहता बैठा रहता है कि कोई आए और हराम के धन की वर्षा कर जाए, ताकि वह धन बटोर कर नए कपड़े सिलवाए, मिठाइयाँ खरीदे, पटाखे चलाए, जुआ सट्टा खेले।
‘धन-लक्ष्‍मी’ की उत्‍कंठा-आकांक्षा में बरसों-बरस से दिवाली बदस्‍तूर मनाई जाती है। खान्‍दान में कभी देहरी लांघकर आई हो या न आई हो, मगर दिवाली के दिन ‘लक्ष्‍मी’ अवश्‍य आती है यह गलतफहमी लोगों को शायद ‘ञेता’ से ही चली आ रही है, जबकि सभी जानते हैं कि दिवाली आती है तो साथ में लगा-लगा ‘दिवाला’ भी चला आता है। अर्थात हाथ में आता-वाता तो कुछ नहीं है, जमा कर रखी गाँठ की थोड़ी-मोड़ी लक्ष्‍मी भी स्‍वाहा हो जाती है। हो सकता है उन दिनों दिवाली में रामसेना ने बाँटा होगा धन, मगर आजकल दिवाली जैसे त्‍योहारों पर ‘कार्पोरेटी धन-सेनाएँ’ साम-दाम-दंड-भेद से लोगों की जेब से धन निकालने की कवायद करती देखी जा सकती हैं। ‘बाज़ार’ ने पब्लिक को फ‍जिू़ल के सामान की खरीददारी से घर भरने का चस्‍का लगाकर लक्ष्‍मी का प्रवाह अपनी तिज़ोरियों की ओर मोड़ रखा है। लक्ष्‍मी जी भी व़न-वे ट्राँफिक सी बस धन्‍ना सेठों की तिज़ोरियों की तरफ ही दौड़ती नज़र आतीं हैं। आम जनता कितनी ही बेसब्री से उसका इंतज़ार करे मगर वह भुक्‍कड़ों के घर की दिशा में कभी भटकती नज़र नहीं आती।
लक्ष्‍मीजी बेरोकटोक घर में आ सकें इसके लिए लोग तरह-तरह की उठापटक करते हैं, मगर वे देवी जी अर्थशास्‍ञ की नियमों के विपरीत किसी गरीब-गुरबे के घर में जाने को कभी तैयार ही नहीं होतीं, चाहे कितना भी बड़ा भक्‍त हो। अर्थशास्‍ञ का नियम है कि बड़ी पूँजी छोटी पूँजी को खा जाती है, इसलिए लक्ष्‍मीजी अपने साथ ‘धन’ का जो तूफानी अंधड लेकर धन्‍ना सेठों की तिजोरी की तरफ लपकती हैं, तो उसमें बेचारे छोटे-मोटे लक्ष्‍मी भक्‍तों की लुटिया ही डूब जाती है, किसी को कुछ मिलता-विलता नहीं है।
पुराने ज़माने में जब लॉटरी का धंधा सरकारों की देखरेख में चला करता था, कई लक्ष्‍मी भक्‍त लाटरी के टिकट खरीद कर पूजा में रखा करते थे और लक्ष्‍मी जी से प्रार्थना किया करते थे कि उनकी खरीदी एखाद लॉटरी पर कुछ नहीं तो आखरी एक अंक का ही ईनाम लग जाए। उनकी यह आत्मिक मंशा होती थी कि उनके खरीदे लॉटरी टिकट के नम्‍बर पर ही उस व्‍हील को फ्रीज़ करवाने में लक्ष्‍मीजी पिछले दरवाज़े से उनकी मदद करे, जिस व्‍हील को घुमाकर लाटरी का भाग्‍यशाली नम्‍बर निकाला जाता है। उन बेवकूफों को किसी ने कभी यह ज्ञान दिया ही नहीं होता कि व्‍हील को मन चाही जगह पर रोककर मनचाहे नम्‍बर पर ईनाम बाँटने के शुद्ध मानवीय कौशल के सामने लक्ष्‍मीजी की एक नहीं चला करती। वे वहाँ उतनी ही मूक दर्शक होती हैं जितना कोई सीधा-साधा भारतीय नागरिक होता है।
आज भी कुछ लोग घरवाली से पंगा लेने की कीमत पर भी, दिवाली के बजट से कुछ धन निकालकर जुए-सट्टे-मटके की भेंट चढ़ा आते हैं ताकि लक्ष्‍मी जी की कृपा उन पर हो जाए, मगर वहाँ भी जुआ-सट्टा खिलाने वाले ‘दादा’ लोगों की लक्ष्‍मीजी से ज़्यादा धाक होती है यह उन बेचारों को पता ही नहीं होता। दिवाली के दिन ‘तीन पत्‍ती’ खेलने का शौक भी कुछ लोग इसी भरोसे पाले रखते हैं, कि लक्ष्‍मी जी उनकी लगातार होती हार से तरस खाकर एखाद राउंड उन्‍हें भी जीतने का मौका देंगी, मगर शातिर सटोरिए ऐसा होने दें तब न, लक्ष्‍मी जी उनके सामने भी पानी भरती नज़र आती हैं।
इधर लक्ष्‍मीजी का रुझान बाज़ार में लूटमार मचाने वाली ताकतों की ओर ज़्यादा दिखाई देता है। मिलावटखोर, कालाबाज़ारिये, नकली माल बनाने-बेचने वाले दिवाली पर जितना खुश दिखते हैं उतना कोई और नहीं, क्‍योंकि लक्ष्‍मीजी की कृपा उन्‍हीं पर ज्‍़यादा होती है। लक्ष्‍मी जी की इस अदृष्‍य कृपा का दारोमदार भी उन लक्ष्‍मी भक्‍तों के हाथ होता है जिनके घर में दबाकर हराम का माल आता हो, यानी रिश्‍वत, कमीशन, या हफ्‍ताखोरी। जिनके पास हराम का माल आता है दिवाली पर उनकी बाँछे देखिए कैसी खिलकर फड़फड़ाती, उपत-उपत कर अपने-आप सामने आती रहती हैं, जबकि मेहनत-मशक्‍कत करके कमाने वालों की बाँछे लैंस लेकर ढूढ़ने से भी दिखाई नहीं देती।
    दीपावली की पारम्‍परिक खुशियों को पलीता लग गया है। कौन पागल है जो आजकल मर्यादा    पुरुषोत्‍तम राम के अयोध्‍या आगमन की खुशियों में मिठाइयाँ खाता-खिलाता हो। जिसे देखों वह लक्ष्‍मी के आगमन के इंतज़ार में मुँह बनाए बैठा रहता है। चाहे सही रास्‍ते से आए या गलत रास्‍ते से, बस लक्ष्‍मी आना चाहिए। आ गई तो समझो सबकी बाँछे खिल गईं, वर्ना भाड़ में गई दिवाली और भाड़ में गए दिवाली मनाने वाले।
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शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

एक टिकिटार्थी का पत्र


//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

डीयर हाईकमान्ड !

माँबदौलत का परनाम पहुँचे.......

शेरों वाली के आशीर्वाद से फिर से चुनाव की घोषणा हो गई है। इस दफे घर-वालों, रिश्तेदारों, यारों-दोस्तों, और खास लोंडे-लपाड़ों की तरफ से हमारे ऊपर तगड़ा प्रेशर है, सभी कह रहे हैं कि बहुत साल हो गये पार्टी के लिए ‘गुंडागर्दी’ करते अब तो ‘टिकट’ मिलना ही चाहिये। ऐरिये के सारे बदमाश, गुंडे-मवाली, चोर-उचक्के, ड्रग-डीलर माफिया सरगना और तस्कर बड़ी आस लगाए बैठे हैं कि कब हम मंत्री-विधायक बनें और उन्हें एक शान्तिपूर्ण वातावरण में चैन की बंसी बजाते हुए तरक्की करने का मौका मिले। हाँ, जनता ज़रूर डरी हुई है, कि अगर हमें टिकट मिल गया, और हम जीत गए, तो फिर क्या होगा ? लेकिन जनता से हमें क्या लेना देना, ‘वोट’ ही तो चाहिये.... उसके लिए तो हमारे लौंडे-लपाड़े ही काफी हैं, सब सम्हाल लेंगे।

विरोधी पार्टियों के लोगों ने अपने ‘उम्मेदवारों’ को पोस्टर, झंडे-डंडे भी बाँटना शुरू कर दिये हैं.....हमने तो यहाँ तक सुना है, कि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए पार्टी से फन्ड भी मिल चुका है, और ससुरों ने फन्ड खाना शुरू भी कर दिया है। लेकिन हमारी पार्टी ने अभी तक अपना ‘उम्मेदवार’ तक डिक्लेर नहीं किया है, और ना ही चाय-पानी के लिए पैसे भिजवाएँ हैं। आप को बता दें, कि ‘उम्मेदवार’ डिक्लेर करने में ज़्यादा देर की गई, तो विरोधी पार्टी वाले शहर के सारे धन्ना सेठों के यहाँ से पैसा बटोर चुके होंगे। वैसे तो हमने लोगों पर अड़ी डालकर उगाही चालू कर दी है, लेकिन ‘मुन्ना पाँड़े’ उसमें बेवजह टाँग अड़ा रहा है।

हमें अन्दरूनी तौर पर खबर मिली है, कि आप लोग इस बार भी ‘मुन्ना पाँडे़’ को टिकट देने की फिराक में हो, जिसने पार्टी फन्ड खा-खाकर चार-चार बंगले बना लिये। दो बंगलों में दो कार्पोरेशनों के दफ्तर चल रहें हैं, एक में उसकी फैमिली रहती है, और एक ‘चंदा बाई’ को दे रखा है। लोगों से पैसा ऐंठ-ऐंठकर उसने दर्जनों बसें-ट्रकें चला लीं। सारे सरकारी विभागों से, यहाँ तक कि पुलिस-थानों से भी बिना नागा हफ्ता वसूली करता है, और हर साल ट्रांसफर में लाखों रुपये डकार जाता है, पार्टी को पता भी नहीं चलता। हर बार एक ही एक आदमी को ऐसा सुनहरा मौका देना अच्छी बात नहीं है, आखिर हमारी पार्टी एक ‘परजातांत्रिक पार्टी’ है, सभी को बराबर का मौका मिलना चाहिये।

माँबदौलत इस दफे पार्टी का सबसे योग्य उम्मेदवार है। इस बात को आप चाहे तो क्षेत्र के किसी भी थाने से पता कर सकते हो। पिछले साल सबसे ज़्यादा केस अगर दर्ज हुए हैं तो हम पर, सबसे ज्यादा वारंट ईशू हुए तो हमारे नाम, सबसे ज़्यादा जमानतें हुई तो हमारी, और सबसे ज़्यादा ज़िला-बदर हुए तो हम। मगर मजाल है कि एक बार भी जेल गए हों । क्या करें, यह तो जन सेवा है, करना ही पड़ती है, वर्ना जनता की नज़र में नेता कैसे बने रह पाएँगे। अब आप को क्या-क्या बताएँ, आपको सब कुछ पता ही है हमारे बारे में, लेकिन फिर भी एक लोकल लेखक से अपना ‘बायोडाटा’ बनवा कर भेजे दे रहें हैं, जिससे हमारी राजनैतिक योग्यता के बारे में आपको कोई गलत-फहमी, शकोशुबहा ना रहें।

माँबदौलत ज़्यादा पढ़ा लिखा तो नहीं है, राजनीति में वैसे भी पढ़ाई-लिखाई का क्या काम । बचपन में एक बार माटसाब का सिर फोड़कर जो भागे तो आज तक पाठशाला की तरफ मुड़कर नहीं देखा। आपका आशीर्वाद रहा तो चुनाव जीतकर, मंत्री बनकर फिर शायद उस ओर जाना हो जाए। स्कूल भले ही ना गएँ हों, लेकिन शहर के हर स्कूल-कॉलेज में माँबदौलत की तूती बोलती है। बच्चे हर साल पहले दर्जे में ऐसे ही नहीं पास होते, मास्साबों की गर्दन पर छुरा अड़ाकर, धड़ल्ले से नकल करवाते हैं, तब कहीं जाकर शहर के लड़के-लड़कियाँ देश भर में नाम और रुपया कमाते हैं । अब उस ‘बैजू घसियारे’ को ही ले लो जो ‘हाईकोरट’ में काला लबादा चढ़ाए घूमता रहता था और आजकल लाल बत्ती दर्जे पर एक कार्पोरेशन का अध्यक्ष है, उसने कानून की परीक्षा हमारी कलारी में बैठ कर दी थी। चार हॉयस्कूल के लड़के लगाए थे कापी लिखने के लिए, ‘उँनीवर्सिटी’ में ‘टॉप’ किया था। क्यों ना करता बैजू हमारा लँगोटिया यार जो ठहरा। हमारे सारे लफड़े-झगड़े बैजू ही देखता है। कानून का इतना माहिर कि एक बार भी सज़ा चिपकने नहीं दी। आपके यहाँ भी कोई नालायक छोरा हो तो भेज दो इधर, जो चाहो इम्तहान दिलवा देंगे, पास करवाने की गारन्टी हमारी। कुलपति की कालर पकड़कर मार्कशीट निकलवा लाएँगे।

शहर में हर किस्म के दंगा-फसाद कराने, और उन्हें शानदार ढंग से सफल बनाने में हमने हर बार पूरा-पूरा योगदान दिया है। चाकू, छुरा, तलवार, कट्टा, वगैरह चलाने में माँबदौलत का कोई मुकाबला नहीं है। बम बनाना और कहीं भी फेंककर दस-बीस लोगों को चित कर देना हमारे बाएँ हाथ का खेल है। चुनाव में इस सबकी बहुत ज़़रूरत पड़ती है। अगर हम ‘उम्मेदवार’ हुए तो इन कामों के लिए बाहर से मैन-पावर और असला बुलाने की ज़रूरत नहीं पडे़गी, सब कुछ हम और हमारे लौंडे-लपाडे़ सम्हाल लेंगे...... खर्चा भी बचेगा। ‘मुन्ना पाँडे़’ इस मामले में हमसे कई गुना कमज़ोर पड़ता है। उससे तो दिवाली में ‘टिकली’ भी फोड़ने को कहो तो जूते छोड़कर भाग खड़ा होता है। 

अफीम, चरस, गाँजा, भाँग, अवैध शराब, कालाबाज़ारी, ऐसा कोई गैरकानूनी धंधा नहीं है, जो हमारे अलावा कोई ओर चला ले। इस मामले में हम ‘मुन्ना पाँडे़’ के भी बाप हैं। हमारे सैंकड़ों लौंडे तो इसी रोज़गार में लगे हुए है और हमारे आशीर्वाद से दिन-रात तरक्की कर रहें हैं।

माँ-बहनों के बीच भी हमारा अच्छा खासा रुतबा है। पूरे शहर भर में हमारे अलावा कोई उनकी इज़्ज़त पर हाथ नहीं डाल सकता, इससे माँ-बहनों में हमारी काफी अच्छी छवि बनी हुई है।

शहर भर के शातिर-बदमाश हमारे इशारे पर उठक-बैठक लगाते हैं। चुनाव के दिनों में सबको बूथ केप्चरिंग, पेटी लूटने, फ़र्ज़ी वोट डलवाने के काम में लगा देते हैं। हमने भी अपने राजनैतिक कैरियर की शुरूआत ‘मुन्ना पाँडे़’ के लिए बूथ लूटकर ही की है, लिहाज़ा इस क्षेत्र में हम काफी अनुभवी हैं, और आज के जमाने में चुनाव के लिए यह सबसे बड़ी ‘कोलीफिकेशन’ है। चुनाव जीतने की सौ टका गारंटी.......।

हाँ तो डीयर हाईकमान्ड ! हमने बहुत थोड़े में अपनी सारी खूबियों और अनुभवों का खुलासा कर दिया है, आशा है आप विस्तार में समझ गए होंगे। ना समझे हों, तो समर्थकों का ट्रेन भर छोटा सा डेलीगेशन लेकर दिल्ली आ जाते हैं, वहीं सारी बातें समझा देंगे, मगर हमारे समर्थकों के हाथों दिल्ली वालों की जेबों पर जो कट लगेगा उसकी जिम्मेदारी आपकी और पार्टी की होगी।

एक और बात हमने सुन रखी है, कि बगैर लेन-देन टिकट नहीं कटती.....। साले कमीनापन नहीं छोड़ोगे.....! हमसे भी लोगे ! कोई बात नहीं, कमाते ही इसलिए हैं ताकि आडे़ वक्त में किसी को खरीद सकें। हमारी तरफ से बेफिक्र रहना, जितना कहोगे ‘हवाले’ से भिजवा देंगे.......कम पडे़गा तो और भिजवा देंगे.....और कम पडे़गा तो और भिजवा देंगे.......सौ-पचास रुपए खर्च हो जाए तो कोई गम नहीं, हमें तो बस ‘टिकट’ चाहिये ही चाहिये।

आज खोपड़ी ठीक है सो इतनी सब मिन्नत भी कर ली, इसके बाद भी अगर ‘हमें’ टिकट देकर अपना योग्य ‘उम्मेदवार’ नहीं बनाया तो समझ लो हाईकमान्ड.....! भाड़ में गए तुम और चूल्हे में गई तुम्हारी पार्टी......। चुनाव चिन्ह रखेंगे ‘गुप्ती’, और ‘इंडिपेंडेंट’ लड़ जाएँगे। उखाड़ लो हमारा क्या उखाड़ते हो। हमारे रहते कोई माई का लाल यहाँ से जनता का ‘पिरतिनिधि’ बनने की हिम्मत नहीं कर सकता, क्योंकि चुनाव में तो हर हाल में हम ही खडे़ होंगे, हम ही वोट डलवाएँगे, और हम ही जीतेंगे...... फिर समर्थन के लिए घूमते रहना पीछे-पीछे....। 
               तुम्हारा मॉबदौलत
               पता- गुंडों की छावनी
                बन्दूकपुरा, थाना डकैतगंज
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ऱाष्‍ट्रीय साप्‍ताहिक पञिका शुक्रवार के 24 अक्‍टूबर 2013 अंक में प्रकाशित

शुक्रवार, 21 जून 2013

स्कूल चले हम



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
स्कूल खुल गए है। ‘स्कूल चले हम’ का नारा बुलंद है। हालाँकि, यह साफ नहीं है कि स्कूल आखिर जाना किसको है। क्या सिर्फ उन्हीं नालायकों से स्कूल जाने की अपील की जा रही है जो कभी स्कूल के पचड़े में पड़ना नहीं चाहते और सुखी हैं, बल्कि मास्टरों को भी पढ़ाने के बेकार झंझट से बचाये हुए हैं। या, उन्हें भी स्कूल जाना है जो स्कूल जाकर भी कभी ठीक से पढ नहीं पाए और बेतकल्लुफी से देश का बंटाधार कर रहे हैं।
दीवारों पर नारा लिखा मिलता है - ‘‘हम अपना कर्त्‍तव्‍य निभाएँ, हर बच्चे को स्कूल ले जाएँ।’’ ठीक है हम कर्त्‍तव्‍य निभाने को तैयार हैं, और अपने आसपास जो भी बच्चा प्रसन्नचित हँसता-खेलता नज़र आएगा उसे पकड़कर स्कूल तक छोड़ भी आऐंगे, मगर उस बच्चे को स्कूल से व़ापस कौन लेकर आएगा यह कोई नहीं बता रहा है। बच्चा स्कूल चला तो जाए मगर लौटकर न आए, कितने टेन्शन की बात है।
आला अफसरों-मंत्रियों द्वारा सरकारी खर्चे पर छोटे शिक्षा अधिकारियों-कर्मचारियों को डॉट पिलाई जाती है कि बताओं-‘‘हम चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि ‘स्कूल चले हम’, फिर भी बच्चे स्कूल क्यों नहीं पहुँच रहे हैं ?’’ बात यह है कि बच्चों की नन्हीं-नन्हीं नजरें जहाँ-जहाँ तक भी जाती हैं, इलाके में कोई स्कूल ही नहीं होता, बच्‍चे जाएँ तो कहाँ जाएँ ? दूर-दराज के स्कूलों में बच्चे मान लो पहुँच भी जाएँ तो जिस भवन को स्कूल बताया जाता है वहाँ भैंसें बंधी हुई मिलतीं है। कुछ बच्चे उस पेड़ को स्कूल मानने को तैयार नहीं होते जिसके तने पर ब्लेकबोर्ड के लिए पटिया ठोककर दीवार बनाने का खर्चा बचाया गया होता है। कुछ बच्चे काफी विचार-विमर्श के बाद घर में ही बैठे ताश खेलना ज्यादा पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें इस गुप्त रहस्य का कभी पता नहीं चलता कि आखिर उन्हें कौन से स्कूल की ओर चलकर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी है, प्रायमरी, माध्यमिक अथवा हाईस्कूल। कुछ के लिए तगड़ी फीस कुशाग्र विद्यार्थी बनने के रास्ते का पहला और अंतिम रोड़ा बन जाती है।  
कुछ को दलिया पसंद नहीं है इसलिए दिक्कत है, और कुछ इस सूचना के अभाव में निर्णय नहीं ले पाते हैं कि किस स्कूल में छिपकली, काकरोच, मेंढक, साँप-बिच्छू युक्त पोषण आहार की बजाए शुद्ध शाकाहारी खाना मिल सकता है! कुछ का सोचना है कि माँसाहार ही कराकर पढ़ाई कराई जानी है तो चिली-चिकन, मटन-दोप्याज़ा न सही, थोड़ा स्टेंडर्ड बढ़ाकर कम से कम अंडा-करी तो परोसी जाए!
एक बात और है बच्चों को तो गा-गाकर स्कूल चलने के लिए कहा जाता है परन्तु मास्टरों से बिल्कुल नहीं कहा जाता कि वे भी कभी स्कूल चले जाएँ। संभव है बच्चे तो समय पर स्कूल पहुँच जाएँ मगर मास्टरजी स्कूल पहुँचने की कोई पक्की गारंटी नहीं हैं। ऐसी परिस्थिति में बच्चे ‘टॉकीज़ चले हम‘, ‘आवारागर्दी करें हम’ का कार्यक्रम भले हाथ में ले लें, ‘स्कूल चले हम’ का नारा सुन लें लगता नहीं है।
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