शुक्रवार, 28 मार्च 2014

जबरदस्ती का चुनावी टिकट



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
वे नाहरमुँह भागे चले आए और बेहद शर्मिंदगी से बोले-‘‘कम्बख्तों ने कहीं का नहीं छोड़ा, जबरदस्ती ‘टिकट’ पकड़ा दिया। ऊपर से धमकाया भी है कि-‘‘अगर ज़मानत ज़ब्त हुई तो बेटा तेरी खैर नहीं!’’ उनके साथ घटी इस त्रासद घटना से मुझ पर भी ‘सकते’ का दौरा सा पड़ गया है।
वे सुबकते हुए अपनी पीड़ा बयान कर रहे थे-‘‘ भगवान का दिया हुआ सब कुछ है अपने पास, मगर उस निर्दयी ने बिना माँगे चुनाव का टिकट दिलवाकर इस गरीब पर इतना बड़ा अन्याय किया है कि मत पूछो। पता नहीं किस जन्म का पाप है जो आज यह दिन देखने को मिल रहा है। कभी किसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत नहीं आई, मगर अब वोटों के लिए हाथ फैलाकर भीख कैसे माँगू समझ में नहीं आ रहा है। जी करता है कि गले में फाँसी का फंदा लगाकर आत्महत्या कर लूँ।’’
मैंने उन्हें सात्वना देते हुए कहा-‘‘देखों, निराशा भरी बातें मत करों, जो होना है वह तो हो गया। नाम वापसी के समय तक कुछ हो सकता हो तो देख लो, किसी राष्ट्रीय स्तर के नेता से जुगाड़ हो तो सिफारिश लगवाकर टिकट कैंसल करवाने की कोशिश कर लो, पैसे का मुँह मत देखना, जितना खर्च करना पड़े कर लो, तब भी अगर कुछ न हुआ तो फिर लड़ो भैया, ईश्वर की मर्ज़ी के आगे हम भी क्या कर सकते हैं। अब जब ओखली में सर डल ही गया है तो भलाई इसी में है कि परिस्थितियों का सामना करो।’’
वे बोले-‘‘क्या खाकर सामना करूँ? विरोधियों की प्रचंड लहर चल रही है और इन निकम्मों, बदमाशों के पिछले सढ़सठ सालों के कुकर्म मेरे माथे पर आ गए हैं। मैं तो कम्बख्त परचा दाखिल करने से पहले ही हारा हुआ केंडीडेट हूँ। मोहल्ले वालों तक के वोट नहीं पड़ने वाले। घर वाली भी शर्तिया ‘नोटा’ का बटन दबा कर आएगी।’’
मैंने कहा-‘‘देखों भैया, तुम्हारे सर पटकने से न वोटर पिघलने वाला है और न चुनाव आयोग तुम्हें निर्विरोध विजेता घोषित करने वाला है। हिम्मत हारने से काम नहीं चलने वाला मित्र, चुनावी व्यूहरचना बनाना प्रारंभ करो।’’
वे बोले-‘‘काहे की व्यूहरचना! पार्टी वालों ने साफ कह दिया है कि एक पैसा नहीं देंगे, अपनी गाँठ से लगाओ। तुम्हीं बताओं हारने के लिए कोई अपनी गाँठ की पूँजी खर्च करता है। राजनीति में आदमी कमाने के लिए जाता है या गँवाने के लिए! मति मारी गई थी मेरी जो पार्टी की सदस्यता ले ली, किसे पता था कि कम्बख्त चुनाव गले पड़ जाएंगे। पार्टी का तमाम कार्यकर्ता भी विरोधी उम्मीद्वार से बारगेनिंग में लगा है, एक कमबख्त तो मेरे ही वोट का सौदा कर आया।’’
उपसंहार-कुछ समय बात सुना गया कि वे विरोधी पार्टी के पक्ष में चुनाव प्रचार करने की विरोधी पार्टी की शिकायत पर चुनाव आयोग में तलब किये गए, जहाँ उन्होंने अपनी पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए चुनाव आयोग को उसकी मान्यता समाप्त करने की गुजारिश की है। 
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शुक्रवार, 21 मार्च 2014

बस एक अदद वादा दे दो



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
चुनाव की बेला निकट है। शर्तिया चुनाव जीतने के लिए साम-दाम-दंड-भेद के अलावा अगर कुछ ज़रूरी है तो वह है एक अदद धाँसू वादा। कितनी भी न्याय-नीति, सुशासन की बातें कर लीजिए, जनता की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला, वह तब तक टस से मस नहीं होगी जब तक उससे एक लार टपकाने वाला वादा नहीं कर लिया जाएगा। जनता-जनार्दन को वोटर में तब्दील कर उसका वोट झड़ाने के लिए भाषणों की स्टेंडअप कॉमेडी के साथ-साथ चंद आकर्षक और लुभावने वादों की झड़ी लगाना अत्यंत आवश्यक है। मेरी ओर से कुछ बेहतरीन वादों के पेटी पैक नमूने प्रस्तुत हैं जिन्हें सचमुच जीतने का इच्छुक उम्मीद्वार बिना किसी रिस्क के आज़मा सकता है।
इन दिनों महँगाई आसमान छू रहीं है। सरकार तो अपने कर्मचारियों-अधिकारियों को महँगाई भत्ता बाँटकर उनका गुस्से पर ठंडा पानी डाल देती है। चुनाव जीतने की ख्वाहिश रखने वाले उम्मीदवारों वोटरों को भी महँगाई भत्ता बाँटने का वादा कर सीट सुरक्षित कर सकते हैं। चुनाव के बाद में महँगाई भत्ता सीधे वोटरों के खाते में जमा करने का वादा कर दें। वोटरों का बैंक तो ज़रूर होता है मगर उनका कोई खाता तो होता नहीं, लिहाज़ा कोई भत्ता जमा करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। बात आई गई हो जाएगी।
गरीबों के लिए सस्ती दरों पर जो गेहूँ-चावल बाँटा जा रहा है, मध्यमवर्गीय वोटरों को जिन्हें मुफ्त का माल नहीं मिल रहा उनके पेट में काफी दर्द है और इस वजह से उनका वोट दिशाहीन हो सकता है। इसलिए उनसे पाँच-पाँच किलो शरबती गेहूँ और आधा किलो भर बासमती राइस प्रति व्यक्ति बाँटने का वादा कर वोटों को मनचाही दिशा दी जा सकती है। घी-तेल के ढाई-ढाई सौ ग्राम के पाउच और कम से कम हफ्ते भर का किराना घर-घर पहुँचाने का वादा कर दिया जाए तो समझ लो वोटर अपने खर्चे पर देश भर में फैले अपने रिश्तेदारों को बटोर कर समारोहपूर्वक आपके नाम का बटन दबाने बूथ पर पहुँच जाएगा। पेट्रोल-डीज़ल, मिट्टी का तेल और रसोई गैस के भाव हमेशा चढ़े रहते हैं। ये ज्वलनशील पदार्थ सुविधाजनक पेकिंग में पैक करवा कर घर-घर बँटवाए जा सकते हैं, इससे फुटकर मतदाता को रिझाया जा सकता है। पेट्रोल-डीज़ल, घासलेट और रसोई गैस की ऐजेंसियाँ बँटवाने का वादा करके वोटरों के प्रभावशाली दलालों को अपने पक्ष में सक्रिय कर सके तो गजब हो जाए। ये लोग तो खुद सारी व्यवस्था जमा कर वोटरों को घेर-घेर कर बूथ तक ले आने की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभा देंगे।
भारतवर्ष की चुनाव परम्परा में देसी-विदेशी ठर्रे का काफी महत्व रहा है। दरअसल ठर्रा लोकतंत्र के अभिन्न अंग के रूप में लम्बे समय से अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है। पहले के ज़माने के चुनावों में एक अदद पव्वे की आपूर्ति के एक नशीले वादे से काम चल जाता था, परन्तु अब ज़माना बदल गया है, लोगों को रिजल्ट आने तक का कोटा चाहिए। चुनावी सख्तियों के मद्देनज़र यह एक बड़ा मुश्किल काम है, उम्मीद्वारी खतरे में पड़ सकती है। सबसे बढ़िया तरीका यह है कि आप समाज के कुछ दंदफंदी ब्लेक मार्कटियर्स को मुफ्त में देसी-विदेशी शराब के ठेके दिलवाने का पुख्ता वादा कर लें, बाकी का काम वे खुद कर लेंगे।
उम्मीद्वारों के सामने इन दिनों भीड़ पर नियंत्रण रखने वाले छुटभैये नेताओं को साधना एक बड़ा चुनौती भरा काम है। वे थाली के मैंढक की तरह उछल-उछल कर दूसरी पार्टियों के पाले में कूदते रहते हैं। उनसे वादा किया जाए कि उन्हें सोने अथवा हीरे की खदान दिलवाई जाएगी। फिर भी यदि वे न माने तो उनसे कोयले अथवा मुरम-कोपरे, पत्थर की खदान दिलवाने का लालच दे दीजिए, वे नोटों के अंबार का  सुखद स्वप्न आँखों में लिए आपके लिए वोटों का अंबार लगवा देंगे। आजकल सोने-हीरे की खदान से इतना सोना-हीरा नहीं निकल रहा है जितना मुरम-कोपरे और पत्थर की खदानों के ज़रिये पैदा किया जा सकता है।
कहा जा रहा है कि आसन्न चुनावों में इस बार सबसे ज़्यादा अनिर्णय की स्थिति में पड़ा हुआ युवा वर्ग निर्णायक भूमिका निभाने जा रहा है। कम्प्यूटर, टेबलेट, मोबाइल फोन, से लेकर पीज़ा-बर्गर पेप्सी-कोक तक कुछ भी मुफ्त बाँटने का वादा कर इस युवा ऊँट अपनी मनपसन्द करवट बिठाया जा सकता है। जींस, टी शर्ट, आदिदास के जूते भले ही फटे हों मगर हों ब्रांडेड तो देश के ये होनहार अपनी शक्ति ई.वी.एम. में आपके नाम के बटन पर उतार देंगे।
जहाँ तक मुझ जैसे बुद्धिजीवी का प्रश्न है मुझसे तो बस एक अदद रेमण्ड के सूट का वादा कर देना, मैं तुरंत तुम्हारे जाल में फँस जाउँगा और अपना कीमती वोट उम्मीद्वार के घर जाकर दे आउँगा। मेरी बीवी का वोट चाहिए तो एक चंदेरी की साड़ी मेरे हवाले कर देना उसे बूथ तक ले जाने की जिम्मेदारी मेरी, बाकी वो बदन किसका दबाएगी यह मैं नहीं कह सकता।
यदि कोई उम्मीद्वार चुनाव आयोग के डर से अथवा अपने किन्हीं अदृश्य सैंद्धातिक आग्रहों के कारण उपरोक्त में से कुछ भी बाँटने का वादा करने में अपने आप को असमर्थ पाता है तो कोई समस्या नहीं है, बस जनता-जनार्दन को थोड़ा सा डर, भय, आतंक, दंगा-फसाद, मार-काट कत्लेआम का वादा दे देना, भगवान ने चाहा तो वोट आपके पक्ष में पड़ जाएगा। कुछ भी नहीं चाहिए हमारे देश के सम्मानित वोटर को, खूब चुनाव लड़ो, जीतो, सांसद बनो, मंत्री बनो। उसे कुछ दो न दो, एक बस एक अदद वादा दे दो, इस चुनाव में तो आपका काम पक्का बन जाएगा।
            उम्‍मीद्वार खुद अपनी रिस्‍क पर ये वादे करे। चुनाव आयोग का डंडा पड़ने पर मेरी कोई जिम्‍मेदारी नहीं होगी।

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

न समझोगे तो मिट जाओगे, अरे ओ ‘आप’ वालों

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
समझते क्या हो अपने-‘आप’ को? हरीशचन्द्राई का ठेका ले रखा है क्या ‘आप’ ने, जो हम सबको चोर-उच्चकों का सर्टिफिकेट बाँटकर खुद दूध का धुला बने फिर रहे हो। कान खोलकर सुन लो, झूठे वादे करके ‘आप’ दुनिया को बेवकूफ बना सकते हो, हमें नहीं। यह हक पारम्परिक रूप से सिर्फ हमारे पास है। हमी हैं जो वादाखिलाफी के बावजूद दो-दो तीन-तीन पारियों में खेल जाते हैं। ‘आप’ को तो वादे पूरे कर देने के बाद भी हम एक पारी तक पूरा टिक जाने दें, तो हमारा नाम बदल देना। अपनी औकात में रहो ‘आप’ वालों, समझे कि नहीं समझे।
गुरबक समझते हो हमें? बरसों-बरस से बनी लीक तोड़गे! जनता को पानी दोगे! और वह भी मुफ्त! उल्लू के पट्ठों, जनता क्या मुफ्त पानी देने के लिए होती है? मूर्खों, इतना भी नहीं पता कि जनता को उंगली पकड़ाओ तो वो पोछा पकड़ लेती है। ‘आप’ उसे पानी दोगे तो वह ‘साफ’ पानी माँगने के लिए आ खड़ी होगी। तो क्या सबको आर.ओ. सिस्टम बाँटते फिरोगे? जनता की सेहत के साथ खिलवाड़ करना चाहते हो नराधमों! कीड़े पडे़ंगे कीड़े ‘आप’ के शरीर में। कितनी घृणास्पद और निंदनीय बात है, सार्वजनिक नलों पर झौंटा-झॉटी, गाली-गलौच, सिर-फुटव्वल और खून-खच्चर की सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति को जड़ से खत्म करना चाहते हो बदमाशों, तुम्हें नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी।
बिजली का बिल आधा करोगे, जैसे बिजली ‘आप’ के बाप की है । अरे है बाप की तो पूरा बिल ही माफ कर दो न, कौन रोक रहा है ‘आप’ को? ‘आप’ तो बिल के साथ-साथ उसे जमा करने के लिए पैसे भी बाँट दो जनता में, हमारे बाप का क्या जा रहा है! मगर, ताजा-ताजा गल्ले पर बैठे हो बेटों इसलिए भाई समझ कर समझा रहे हैं, जनता को बिजली-विजली नहीं दी जाती, सिर्फ बिल दिया जाता है। दुगना है, तिगुना है, या चार-पाँच-छः गुना यह नहीं देखा जाता। दादागिरी से उससे पैसे भरवाए जाते हैं, या फिर लाइन काट दी जाती है। कोई ज़्यादा चू-चपड़ करें तो उसे जेल भिजवा दिया जाता है। यह होता है सुशासन का तरीका, मगर नए-नए आए हो न, ‘आप’ नहीं समझोगे।
बतोलेबाज़ी की हद होती है, कह रहे हो कि दिल्ली में पाँच सौ सरकारी स्कूल खोल दोगे। अबे, उनमें पढ़ने के लिए बच्चे कहाँ से लाओगे! और प्रायवेट स्कूलों के मालिकों को क्या धूनी रमाने के लिए हिमालय भेज दोगे? या कि उन स्कूलों के बाहर डंडा धारी पुलिस बिठाओगे? हद है! कल को तो ‘आप’ कहने लगोगे कि जनता को पढ़ाई के लिए स्कूलों में धक्के खाने की ज़रूरत नहीं है, हम घर-घर में स्कूल खोल देंगे। जनता के बच्चों को इस तरह घर-घर जाकर ज्ञानी बना देने की परम्परा अच्छी नहीं है, समझ लो अच्छे से। कल को यही जनता और उसके बच्‍चे जूते-चप्पल हाथ में लेकर ‘आप’ को ही ज्ञान बाँटने के लिए आ खड़े होंगे। भागते फिरोगे गली-गली।
परसों तुम्हारा नया शिमूफा होगा कि जनता को मरने के लिए प्रायवेट अस्पतालों में जाने की जरूरत नहीं है, ‘आप’ गली-गली में सरकारी अस्पताल खोल दोगे और मुफ्त इलाज और दवाइयाँ भी बँटवाओगे। इतना कमीनापन अच्छा नहीं। करोड़ों रुपये खर्च कर स्थापित हुए कुशाग्र बुद्धि डॉक्टर और लायसेंस के लिए लाखों रुपया खर्चा कर धंधे पर बैठे ड्रगिस्ट-केमिस्ट क्या फुटपाथ पर बैठकर जड़ी-बूटी कूटेंगे ? ‘नानसेंस’, किसी दिन कहोगे प्रदूषण बहुत है, सारी जनता को आक्सीजन सिलेंडर बाँटे जाएंगे, मुफ्त! यह सब क्या सरकारी जिम्मेदारियाँ हैं? बिगाड़ रहे हो जनता को! कल को हम वापस आएंगे तो इतना सब कुछ कैसे कर पाएंगे? बंद करो यह लोकतंत्र-लोकतंत्र का नाटक, दिमाग खराब कर के रख दिया ‘आप’ ने।
गप्प हॉक रहे हो कि मुंसीपाल्टी, कलेक्ट्री, आर.टी.ओ. में किसी को दलाली देने की जरूरत नहीं है, सारे काम मुफ्त हो जाएंगे। पंजीरी बँट रही है क्या सालों? लोकतंत्र में ऐसा कहीं होता है। लोकतंत्र का मतलब क्या यह होता है कि सब कुछ मुफ्त बँटने लगे, सब को सब कुछ मिल जाए, चारों ओर अमन चैन हो, सब कुछ ठीक-ठाक चलने लगे। मूर्खों हमारी नहीं तो कम से कम अपनी तो चिंता कर लो, पहली बार में ही जनता को सब कुछ दे दोगे, तो अगले चुनावों में वोटों के लिए जनता क्या बांगलादेश से लाओगे?
बावलों अगर सपने में भी यह सोचते हो कि ‘आप’ जैसे पढ़े-लिखों की गुडागर्दी से देश की सारी जनता ‘आप’ के झाँसे में आ जाएगी तो सुन लो, अभी बच्चे हो, जनता को झाँसे में लाने का जो अनुभव हमें है, तुम्हें बिल्कुल नहीं है। सावधान हो जाओ ईमानदारी के पिल्लों, हमारी फौज ‘आप’ को भौंक-भौंक कर खदेड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार है। हम ‘आप’ को भंभोड़कर रख देंगे और काटेंगे-घसीटेंगे अलग। ‘आप’ को इस देश से खदेड़कर ही दम लेंगे।
वह समय गया जनतंत्र की औलादों, जब जन का, जन के लिए, जन के द्वारा चलाए जाने वाले परोपकारी राज्य को ‘जनतंत्र’ कहने की कुप्रथा प्रचलन में थी। हमने एडी-चोटी का जोर लगा कर ऐसी कुप्रथाएँ खत्म की और धन का, धन के लिए, धन के द्वारा स्वलोभकारी राज्य की स्थापना की जो आज ‘धनतंत्र’ के नाम से जोर-शोर से चल रहा है। ‘आप’ लोग जन-जन को फालतू की पट्टी पढ़ाकर हमारी भविष्य की सारी योजनाओं पर पानी फेरना चाहते हो! याद रखो, भूलकर भी अगर ऐसी नापाक हरकत की, तो दौड़ा-दौड़ाकर इसी जनता से पिटवाएंगे ‘आप’ को, जो कि लहरा-लहरा कर ‘आप’ की घिनौनी झाड़ू दिखाने की जुर्रत कर रही है हमें।
कम्बख्तों, जीयो और जीने दो के सिद्धांत पर चलना चाहिए, मगर नहीं! ना जाने किस मिट्टी के बने हो, जरा भी लोच नहीं है। अगला चुनाव फिर सर पर आ गया है, खर्चे पानी के लिए कुछ तो माल अन्दर कर लेने देते! दया-धर्म कुछ है कि नहीं दुनिया में? हमें पता है लालची बंदरों, तुम हमें बिल्कुल हॉथ मारने नहीं दोगे। खुद, पाँचों उंगलियाँ घी में और सर कढ़ाई में डाल कर बैठना चाहते हो चांडालों, ताकि सारे मुल्क पर कब्ज़ा कर सारा माल अकेले ही चॉप सको! मगर ‘आप’ की तो ऐसी की तैसी, हमने भी कोई कच्ची गोलियाँ नहीं खेली है, जो जुम्मा-जुम्मा चार दिन में हम जैसे घाघों को किनारे कर सको! तुम रायता बनाना शुरू तो करो, हम भी उसे फैलाने के लिए कमर कस के तैयार बैठे हैं। ना हमने तुम्हारे रायते को मिट्टी में मिला दिया, तो संसदीय प्रजातंत्र के पटल से हमारा नामो-निशान जे.सी.बी. लगवाकर खुरचवा देना, हम कुछ नहीं कहेंगे। अब सम्हल जाओ, ज्यादा होशियारी मत झाड़ो। न समझोगे तो मिट जाओगे, अरे ओ ‘आप’ वालों तुम्हारी दास्तॉ भी न होगी दास्तानों में।   

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

मंगूदादा और मंगल अभियान


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
मंगू दादा उर्फ मंगलसिंह आज थोड़े से खफ़ा हैं। उनकी खफ़गी का पहला कारण तो यही है कि मंगल पर कुछ भेजें या न भेजें इस बाबत् उनसे राय क्यों नहीं ली गई। दूसरा मुद्दा यह है कि यान में ‘बंदर’ क्यों नहीं भेजा गया! बंदर जाता और जिंदा वापस आ जाता, तभी तो पता चलता कि मंगल पर ‘कब्ज़ा’ करने में कोई रिस्क है या नहीं। मंगू दादा की गैंग जो अब तक शहर के कई हिस्सों में कब्ज़ा करके झोपड़-पट्टी बना चुकि है, मुस्तैदी से कमर कस के तैयार है कि कोई नई जगह मिले तो झोपड़-पट्टी स्थापन की आगामी योजना को मूर्त रूप दिया जावे।

तीसरा मुद्दा यह है कि मंगलयान के साथ कोई सर्वेयर-इंजीनियर-आर्किटेक्ट भेजने की कोई ज़रूरत क्यों नही महसूस नहीं की गई। वे लगातार बड़बड़ा रहे हैं-‘‘हद होती है मिसमैनेजमेंट की, कैसे-कैसे बेवकूफ घुस गये हैं इसरो में। आखिर कैसे ‘मंगल’ का खसरा-अक्स बनाया जाएगा, कैसे साइट डेवलपमेंट की प्लानिंग होगी, कैसे प्लाटिंग के नक्शे तैयार होंगे, किसी को चिंता ही नहीं है। ऐसा थोड़ी है कि बस ज़मीन पर कब्जा करके प्लाट बेच दो, फिर बेचारे खरीददारों को अपना प्लाट ढूँढ़ने में नानी याद आ जाए।’’ मंगूदादा का काम पुख्ता होता है बाकायदा सारी परमीशंस, कागज़ात, मय रजिस्ट्री के वे ज़मीन के प्लाट बेचते हैं, किसी को धोखा नहीं देते, कब्जे़ की ज़मीन हो तो क्या हुआ।

मंगल पर ‘खनिज संपदा’ का पता भी लगाया जाएगा। मंगूदादा खदान आवंटन के लिए कागज़ात तैयार करने तक की मोहलत न दिये जाने पर भी इसरो से नाराज़ हैं। उनका कहना है कि इसरो सोना-चाँदी, और हीरा-पन्ना आदि के खनन व्यवसाइयों के हाथों बिक चुका है, उसे मिट्टी-मुरम-कोपरा के खदान मालिकों की बिल्कुल चिन्ता ही नहीं है। मंगूदादा ने जब से सुना है कि मंगल पर ‘लाल मुरम’ बहुतायत में है वे तब से हिसाब लगा रहे हैं कि उनके पास उपलब्ध वैध-अवैध संसाधनों से कितनी मुरम वे साल भर में खोदेंगे और कितनी मुरम पर ‘मंगल सरकार’ को ‘रायल्टी’ देंगे और कितनी खा जाएँगे।

मंगूदादा परेशान हैं कि ‘मीथेन’ क्या होती है! उन्होंने तो आजतक सिर्फ दो ही गैसों के बारे में सुना था, जिसमें से एक से तो उनके ‘निजी’ ताल्लुकात हैं और दूसरी है ‘रसोई गैस’। यह तीसरी गैस कहाँ से आ गई उनके लिए चिंता का विषय है। उनका सवाल है कि ‘‘जब रसोई गैस की इतनी किल्लत है देश में, तो उसे खोजने की बजाय ये लोग ‘मीथेन’ की खोज क्यों कर रहे हैं!’’

मंगल के ‘वायुमंडल’ में ‘पतंग’ उड़ सकती है या नहीं, इससे ज्यादा महत्व वायुमंडल का मंगूदादा के लिए और कुछ नहीं। मंगूदादा के हिसाब से इस अभियान में महत्वपूर्ण मुद्दों की अनदेखी हुई है, पैसा खाया गया है। इसकी तुरंत जाँच होना चाहिए, ताकि मंगलयान को वापस बुलाकर उसमें ये मुद्दे भी जोड़े जा सकें।    

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रविवार, 3 नवंबर 2013

धनलक्ष्‍मी के आगमन के इंतज़ार में

व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
‘दीपावली’ और ‘धन’ का रिश्‍ता बड़ा सगा-सगा और नज़दीक का सा है। क्‍यों, पता नहीं। सामंती दौर की उत्‍साहवर्धक परम्‍परा थी कि राज्‍यों की सेनाएँ अक्‍सर एक-दूसरे से मारा-कुटी कर लेने के बाद जीती हुई सेना शञुओं का तमाम माल-असबाब लूट कर अपने राज्‍य में ले आती थीं। वापस आकर वे उस लूट के माल को जनता में बाँटती थीं या सब कुछ राजा ही हड़प लेता था पता नहीं, परंतु लगता है लंका पर फतह हासिल करने के बाद रामचन्‍द्र जी और उनकी सेना ने लंका से उखाड़-उखाड़ कर लाए सोने की ईंट-पलस्‍तर दो-दो, पाँच-पाँच तोले की पेकिंग में बंधवाकर अपने नागरि‍कों के बीच बाँटी होंगी। शायद परम्‍परा की उसी निरन्‍तरता में भारतीय जन-गण आज भी दीपावली पर पलक-पॉवडे़ बिछाए बाँट जोहता बैठा रहता है कि कोई आए और हराम के धन की वर्षा कर जाए, ताकि वह धन बटोर कर नए कपड़े सिलवाए, मिठाइयाँ खरीदे, पटाखे चलाए, जुआ सट्टा खेले।
‘धन-लक्ष्‍मी’ की उत्‍कंठा-आकांक्षा में बरसों-बरस से दिवाली बदस्‍तूर मनाई जाती है। खान्‍दान में कभी देहरी लांघकर आई हो या न आई हो, मगर दिवाली के दिन ‘लक्ष्‍मी’ अवश्‍य आती है यह गलतफहमी लोगों को शायद ‘ञेता’ से ही चली आ रही है, जबकि सभी जानते हैं कि दिवाली आती है तो साथ में लगा-लगा ‘दिवाला’ भी चला आता है। अर्थात हाथ में आता-वाता तो कुछ नहीं है, जमा कर रखी गाँठ की थोड़ी-मोड़ी लक्ष्‍मी भी स्‍वाहा हो जाती है। हो सकता है उन दिनों दिवाली में रामसेना ने बाँटा होगा धन, मगर आजकल दिवाली जैसे त्‍योहारों पर ‘कार्पोरेटी धन-सेनाएँ’ साम-दाम-दंड-भेद से लोगों की जेब से धन निकालने की कवायद करती देखी जा सकती हैं। ‘बाज़ार’ ने पब्लिक को फ‍जिू़ल के सामान की खरीददारी से घर भरने का चस्‍का लगाकर लक्ष्‍मी का प्रवाह अपनी तिज़ोरियों की ओर मोड़ रखा है। लक्ष्‍मी जी भी व़न-वे ट्राँफिक सी बस धन्‍ना सेठों की तिज़ोरियों की तरफ ही दौड़ती नज़र आतीं हैं। आम जनता कितनी ही बेसब्री से उसका इंतज़ार करे मगर वह भुक्‍कड़ों के घर की दिशा में कभी भटकती नज़र नहीं आती।
लक्ष्‍मीजी बेरोकटोक घर में आ सकें इसके लिए लोग तरह-तरह की उठापटक करते हैं, मगर वे देवी जी अर्थशास्‍ञ की नियमों के विपरीत किसी गरीब-गुरबे के घर में जाने को कभी तैयार ही नहीं होतीं, चाहे कितना भी बड़ा भक्‍त हो। अर्थशास्‍ञ का नियम है कि बड़ी पूँजी छोटी पूँजी को खा जाती है, इसलिए लक्ष्‍मीजी अपने साथ ‘धन’ का जो तूफानी अंधड लेकर धन्‍ना सेठों की तिजोरी की तरफ लपकती हैं, तो उसमें बेचारे छोटे-मोटे लक्ष्‍मी भक्‍तों की लुटिया ही डूब जाती है, किसी को कुछ मिलता-विलता नहीं है।
पुराने ज़माने में जब लॉटरी का धंधा सरकारों की देखरेख में चला करता था, कई लक्ष्‍मी भक्‍त लाटरी के टिकट खरीद कर पूजा में रखा करते थे और लक्ष्‍मी जी से प्रार्थना किया करते थे कि उनकी खरीदी एखाद लॉटरी पर कुछ नहीं तो आखरी एक अंक का ही ईनाम लग जाए। उनकी यह आत्मिक मंशा होती थी कि उनके खरीदे लॉटरी टिकट के नम्‍बर पर ही उस व्‍हील को फ्रीज़ करवाने में लक्ष्‍मीजी पिछले दरवाज़े से उनकी मदद करे, जिस व्‍हील को घुमाकर लाटरी का भाग्‍यशाली नम्‍बर निकाला जाता है। उन बेवकूफों को किसी ने कभी यह ज्ञान दिया ही नहीं होता कि व्‍हील को मन चाही जगह पर रोककर मनचाहे नम्‍बर पर ईनाम बाँटने के शुद्ध मानवीय कौशल के सामने लक्ष्‍मीजी की एक नहीं चला करती। वे वहाँ उतनी ही मूक दर्शक होती हैं जितना कोई सीधा-साधा भारतीय नागरिक होता है।
आज भी कुछ लोग घरवाली से पंगा लेने की कीमत पर भी, दिवाली के बजट से कुछ धन निकालकर जुए-सट्टे-मटके की भेंट चढ़ा आते हैं ताकि लक्ष्‍मी जी की कृपा उन पर हो जाए, मगर वहाँ भी जुआ-सट्टा खिलाने वाले ‘दादा’ लोगों की लक्ष्‍मीजी से ज़्यादा धाक होती है यह उन बेचारों को पता ही नहीं होता। दिवाली के दिन ‘तीन पत्‍ती’ खेलने का शौक भी कुछ लोग इसी भरोसे पाले रखते हैं, कि लक्ष्‍मी जी उनकी लगातार होती हार से तरस खाकर एखाद राउंड उन्‍हें भी जीतने का मौका देंगी, मगर शातिर सटोरिए ऐसा होने दें तब न, लक्ष्‍मी जी उनके सामने भी पानी भरती नज़र आती हैं।
इधर लक्ष्‍मीजी का रुझान बाज़ार में लूटमार मचाने वाली ताकतों की ओर ज़्यादा दिखाई देता है। मिलावटखोर, कालाबाज़ारिये, नकली माल बनाने-बेचने वाले दिवाली पर जितना खुश दिखते हैं उतना कोई और नहीं, क्‍योंकि लक्ष्‍मीजी की कृपा उन्‍हीं पर ज्‍़यादा होती है। लक्ष्‍मी जी की इस अदृष्‍य कृपा का दारोमदार भी उन लक्ष्‍मी भक्‍तों के हाथ होता है जिनके घर में दबाकर हराम का माल आता हो, यानी रिश्‍वत, कमीशन, या हफ्‍ताखोरी। जिनके पास हराम का माल आता है दिवाली पर उनकी बाँछे देखिए कैसी खिलकर फड़फड़ाती, उपत-उपत कर अपने-आप सामने आती रहती हैं, जबकि मेहनत-मशक्‍कत करके कमाने वालों की बाँछे लैंस लेकर ढूढ़ने से भी दिखाई नहीं देती।
    दीपावली की पारम्‍परिक खुशियों को पलीता लग गया है। कौन पागल है जो आजकल मर्यादा    पुरुषोत्‍तम राम के अयोध्‍या आगमन की खुशियों में मिठाइयाँ खाता-खिलाता हो। जिसे देखों वह लक्ष्‍मी के आगमन के इंतज़ार में मुँह बनाए बैठा रहता है। चाहे सही रास्‍ते से आए या गलत रास्‍ते से, बस लक्ष्‍मी आना चाहिए। आ गई तो समझो सबकी बाँछे खिल गईं, वर्ना भाड़ में गई दिवाली और भाड़ में गए दिवाली मनाने वाले।
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