बुधवार, 17 जून 2015

फर्जी डिग्री के दम पर


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
दुनिया के तमाम मुल्‍कों ने तमाम क्षेञों में तरक्‍की की है, हमने शिक्षा के क्षेञ में झंडे गाड़े हैं। अंग्रेजों के ज़माने में जब लॉर्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा पद्धति को बनाने के लिए अपना सिर खपाया तब उसने ख्‍याब में भी नहीं सोचा होगा कि कालान्‍तर में दुनिया भर की शिक्षा व्‍यवस्‍थाएँ उसकी बनाई भारतीय शिक्षा व्‍यवस्‍था से बुरी तरह पिछड़ जाएंगी। बताइये भला, बिना पढ़े-लिखे, बिना स्‍कूल-कॉलेज जाए आदमी ग्रेजुएट-पोस्‍ट ग्रेजुएट, डाक्‍टर-इन्‍जीनियर की डिग्रियाँ हासिल कर ले, इससे क्रांतिकारी उपलब्धि और क्‍या हो सकती है? दूसरा कोई बड़ा से बड़ा मुल्‍क हमारी इस अभिन्‍न उपलब्धि के आसपास भी नहीं फटक सकता।

प्रिटिंग प्रेस के अविष्‍कार ने दुनिया को बस मोटी-मोटी किताबों का बोझ दिया, मगर हमने उस पर फर्जी डिग्रियों की छपाई करवाकर अपने छाञों के सर पर उस बोझ का साया भी नहीं पड़ने दिया। फर्जी डिग्रियों की छपाई के इस कौशल से हमने शिक्षा को तो स्‍तरीय बनाया ही बनाया है, छपाई की कला में भी हम इस कदर सिद्धहस्‍त हुए हैं कि एक बार असली डिग्री को आसानी से नकली डिग्री साबित किया जा सकता है परन्‍तु नकली डिग्री को नकली डिग्री साबिल करने में विशेषज्ञों को भी नाको चने चबाना पड़ जाता है।

किताबी कीड़ों का दुनिया में हमेशा आतंक रहा है। कम्‍बखत सारी डिग्रियाँ खुद ही हड़प लिया करते रहे हैं। न केवल डिग्रियाँ बल्कि आई.ए.एस, आई.पी.एस से लेकर चपरासी तक की नौकरी पर इन्‍हीं का कब्‍ज़ा रहता आया है। हमने देश को इस कलंक से मुक्ति दिला दी। हमने नकल संस्‍कृति का तूफानी विकास और विस्‍तार कर देश के कोटि-कोटि ‘नालायकों’ तक डिग्रियों की सप्‍लाई सुलभ करवाई ताकि वे भी सम्‍मानजनक नौकरियों में जाकर देश सेवा करे और गौरवान्वित महसूस कर सकें। कुछ प्रतिभाशाली लोगों ने तो अपने पुरुषार्थ के दम पर देश की संसदीय राजनीति का मान बढ़ाने में सफलता पाई है। साधु-साधु।

एक ज़माना था लोग फर्जी शब्‍द से थर-थर कॉपते थे और चुपचाप शराफत के लिबास में लिपटे स्‍कूल-कॉलेज और यूनीवर्सिटीज़ में पढ़-पढ़ कर चश्‍में वालों का धंधा चमकाया करते थे। फर्जी डिग्रियाँ एक दूर की कौड़ी थी लिहाज़ा हाड़ तोड़ मेहनत और मशक्‍कत करके असली डिग्री की भीख सी माँगनी पड़ती थी। हमने परिस्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया। डिग्रियों को चना जोर गरम और मुँफली के ढेर की तरह गली-गली में बेचने के लिए पहुँचवा दिया । जिसको जो विषय पसन्‍द हो, आओ, पैसा फैको, डिग्री तुलवाओ और चलते बनो।

हमारा दृढ़ संकल्‍प है कि भविष्‍य में हम अपनी सेवाओं का व्‍यापक विस्‍तार करेंगे। हमारे आदमी साथ में डिग्रियों का कैटलॉग लेकर घर-घर जाकर लोगों की पसन्‍द की‍ डिग्रियाँ बेचेंगे। ऑन लाइन खरीदारी की सुविधा भी हम शीघ्र ही चालू करने वाले हैं। आप समुचित भुगतान कर अपनी मन पसन्‍द डिग्री, अपनी सुविधा के वर्ष और कॉलेज-यूनीवर्सिटी के हिसाब से हमारी साइट से सीधे डाउनलोड कर सकेंगे।

सचमुच, शिक्षा के क्षेञ में यह एक युगान्‍तरकारी पड़ाव है। हमने कसम खाई है कि देश में शिक्षा के पारम्‍परिक ढाँचे को नेस्‍तोनाबूद करके एक नई रोशनी का मार्ग प्रशस्‍त करेंगे। फर्जी डिग्रियों के दम पर हम अपने इस देश को दुनिया का सिरमोर बना कर ही दम लेंगे।                

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रविवार, 14 जून 2015

मैगी को बदनाम मत करो


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
 मैं ‘मैगी’ हूँ। दुनिया भर में मुझे बेहद चाव से खाया जाता है। मगर आज मेरे अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। मुझे अखाद्य करार दिया जाकर मार्केट से बाहर करने का षड़यंत्र चल रहा है। मुझे ताज्जुब है, जब भारत की गली-गली में सैकड़ों अखाद्य पदार्थों की बिक्री पर कोई प्रतिबंध नहीं है, रोज़ाना हज़ारों लोग इन मिलावटी, नकली अखाद्य पदार्थों को खाकर अस्पतालों के चक्कर लगाते नज़र आते हैं और कुछ तो बेचारे बेमौत मारे भी जाते हैं, तब मुझ जैसी नफासत से बनने वाली चीज़ को बदनाम करके बंद करने की साजिश चल रही है। पाप पड़ेगा नासपीटों तुम सबको!
वैसे वेषभूषा, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और खाने की विधि से तो मैं भारतीय नमकीन सिवैयों की मौसेरी बहन होती हूँ लेकिन उस हिसाब से इज़्जत मेरी कभी नहीं हुई। यहीं भारत में कई वर्षों तक मैं ‘केचुआ’ सम्प्रदाय की मानी जाकर नफरत और उपेक्षा की शिकार रही, लेकिन धीरे-धीरे मेरे आकाओं ने मेरी इस छवि को भारतीय जनमानस में से दफा करके मेरे धाँसू स्वाद के बल पर भारत में धूम मचा दी। मल्टीनेशनल व्यापार तिकड़मों और भूमंडलीकरण के अन्तर्राष्ट्रीय षड़यंत्रों के दम पर मैंने बच्चों, नौजवानों और यहाँ तक कि बड़े-बूढों तक में पेट के रास्ते दिमाग में और दिमाग के रास्ते पेट में उतरने के संघर्ष में अद्वितीय प्रगति एवं मुकाम हासिल किया है। जो बच्चे देसी सिवैयों की तरफ आँख उठाकर नहीं देखते थे वे धीरे-धीरे चटोरों की भाँति मुझ पर टूट पड़ने लगे। बच्चों के माँ-बाप भी मेरे चटर-पटर स्वाद के दीवाने होकर पारम्परिक दाल-रोटी का स्वाद ही भूल गए।
माफ कीजिएगा, दाल-रोटी का स्वाद भूले नहीं बल्कि हम लोगों ने आपको सायास उसे भूलने पर मजबूर कर दिया। बताइये भला, बच्चे रोटी-सब्जी दाल-चावल इत्यादि-इत्यादि बाबा आदम के ज़माने की रेसिपियाँ खाते रहते तो मुझे कौन पूछता? इसीलिए मेरे आकाओं ने इंसानों की जीभ पर चटोरपन के विकास के लिए काफी शोध एवं अनुसंधान करवाकर ऐसे-ऐसे केमिकल और साल्ट्स का उपयोग करना शुरू किया कि मैगी ना मिले तो बच्चे भूखे मर लें लेकिन खाने की तरफ आँख उठाकर न देखें। मेरा दिवाना कोई भी बच्चा मुझे न खिलाने पर अपनी अम्मा का खून भी कर सकता है, ऐसी दिवानगी है मेरी। कभी-कभी पैकेट में पड़ी-पड़ी मैं यह सोचती रहती हूँ कि कहीं यह भविष्य का मानव गढ़ने की साजिश की शुरूआत तो नहीं, जब किसी भी खाने में कोई भी केमिकल खिलाकर अपनी पसंद का आज्ञाकारी इन्सानी पुतला बनाया जाना संभव होगा? चलो छोड़ो भी मुझे क्या करना।
बच्चों की अम्मा तो बहुत खुश है । उसे चार घंटे की कीचन की मारामारी से निजात मिल गई, क्योंकि मैं तो दो मिनिट में पक कर तैयार हो जाती हूँ। पकाने में भी दो मिनिट और खाने में भी दो मिनिट। यह अलग बात है कि उसे निकालने के लिए ‘पाखाने’ में दो दिन तक का लम्बा इंतज़ार करना पड सकता है। कम नमक, ज्यादा मिर्च, बेस्वाद खाने की रोज की चिक-चिक से भी मुक्ति मिल गई। कंपनी ने जो अगड़म-बगड़म मिला दिया उसे खाकर बाप-बच्चे सब तृप्त होकर चुपचाप काम पर लग जाते हैं।
फटाफट संस्कृति का ज़माना है। इंसान के पास समय की बेहद कमी है। प्रोफेशनल ज़िन्दगी का तकाज़ा है कि जिस खाने के लिए रात-दिन खटते रहो उसी के लिए समय मत निकालो। कौन प्रोफेशनल आज गेहूँ पिसाने चक्की पर जाना पसन्द करेगा और घर पर साग-रोटी पकाकर खाना चाहेगा। इतनी देर में दस-बीस हज़ार रुपए ज्यादा छप जाएंगे। इसलिए मैं और मुझ जैसे बहुत से वेज-नानवेज फटाफट प्रोडक्ट आपकी ज़िन्दगी में अहम जगह बना चुके हैं। बनाएंगे क्यों नहीं, वे आपके पेट में डालने से पहले ‘भेजे’ में जो डाले जाते हैं। मेरे लिए अमिताभ बच्चन और माधुरी दीक्षित जैसे कई लोकप्रिय कलाकार यह काम बखूबी करते हैं। यही है इस युग की खासियत। किसी के भी दिमाग में जो चाहे डाल दो वो हू-चूँ तक नहीं करेगा। विज्ञान और टेक्नॉलॉजी ने इतनी तरक्की कर ली है कि यदि वो चाहे तो आपका दिमाग मुझे तो क्या ‘गोबर’ तक को खाने के लिए बदहवासों की तरह टूट पड़े।
क्या चाहिए मेरे आकाओं को, बस यही कि में घर-घर छः टाइम खाई जाने लगूँ और दुनिया के हर देश के हर कोने में अपनाई और गाई जाने लगूँ और उनका सालाना टर्न ओव्हर दिन दूना रात चौगूना बढ़ता चला जाए। तो इसमें उनकी क्या गलती है, जब आपके देश में उनके इस सपने को साकार करने के लिए नतमस्तक होकर दुम हिलाते हुए स्वागत में खड़े बंदे मौजूद हैं तो बुरी ही सही क्यों न मैं दनादन बिकूँ? इसके लिए अमानक केमिकल वगैरा जो भी मिलाना है मिलाकर हम तो आगे बढ़ेंगे, कौन रोकेगा हमें? आखिर धनिए में लीद भी तो इसीलिए मिलाई जाती है और डिटर्जेंट से दूध भी इसीलिए बनता है ताकि कुछ लोग मुनाफे की दुनिया के सिरमौर हो जावे। किसका क्‍या बिगाड़ लेते हो तुम लोग?
मगर दोस्तों, व्यक्तिगत तौर पर इसमें मेरी क्या गलती है बताइये? मैं तो मैन मेड आयटम हूँ। खाने के शौकीन सभी लोगों के सामने निरपेक्ष रूप से प्रस्तुत हूँ। मुझे कोई ऐसी इच्छा भी नहीं कि लोग मुझे ही खाएँ दाल-रोटी न खाएँ। मैं कौन खुद अपने पर शोध-अनुसंधान करने बैठ गई कि कौन सा केमिकल मुझे ज़्यादा से ज़्यादा स्वादिष्ट बनाएगा कौन सा नहीं। कौन ‘मैंने’ बच्चों की स्वाद ग्रंथियों को प्रभावित करने के लिए षड़यंत्र किया है! न मैं अमिताभ बच्चन के पास गई न माधुरी दीक्षित के पास, और न मैंने खुद अपने-आप को सेलेबल बनाने के लिए आकर्षक पैकेजिंग में पेश किया है। तो फिर सारा गुस्सा मुझपर क्यों उतारा जा रहा है? यह अच्छा है, करे कोई भरे कोई!
सच्चाई यह है कि आप सब लोग ही एक-दूसरे की जान के दुश्मन हो। लालच ने आप सबको अंधा बना दिया है। कार्पोरेट्स तो जैसे जनता का खून पीने के लिए ही पैदा हुए हैं, आप किसी को भी कार्पोरेटों की गुलामी के सामने मासूम इंसानियत का तकाज़ा नज़र नहीं आता। मिलावट करोगे, नकली खाद्य सामग्री बनाओगे, उसे बाज़ार में बेचने के लिए जिम्मेदार लोगों को रिश्वत दोगे, खुद अपने हाथों अपना गुलशन बरबाद करके रख दोगे। ये सब असमाजिक कुकृत्य तो तुम्ही सब मिलकर कर रहे हो न? ‘मैगी’ तो नहीं कर रही? मैगी को तो बदनाम मत करो दोस्तों।          
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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

आदमी नहीं मरता



 व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट
तम्‍बाकू की वकालत करने वालों के हौसले देखकर कई सौदाइयों की हौसला अफजाई हुई है और अब वे भी अपना-अपना धंधा चमकाने के लिए अपनी क्रांतिकारी दलीलों के साथ मैदान में कूँदने की तैयारी कर रहे हैं। सबसे पहले सीना फूलाने वालों में शराब लॉबी के सज्‍जन लोग होंगे। बयान आने ही वाला है कि-“ शराब पीने से कोई नहीं मरता। शराब पीकर आदमी जानवर नहीं बनता न अपनी बीवी को पीटता है। शराब पीने से कभी किसी का लीवर नहीं सड़ता। शराब से कभी किसी के घर के बरतन-भांडे़ नहीं बिकते। इसलिए इसे घर पहुँच व्‍यवस्‍था के अन्‍तर्गत लाया जाना चाहिए। पाउचों और बोतल बंद पानी की तरह इसे स्‍टॉल-स्‍टॉल पर उपलब्‍ध कराया जाना चाहिए और तो और मुन्‍सीपाल्‍टी के नलों के ज़रिए इसे घर-घर पहुँचाने का व्‍यापक प्रबंध किया जाना चाहिए।”
गाँजा, भाँग, चरस, कोकीन, हेरोइन आदि-आदि पदार्थों के समर्थक भी एकजुट होने की फिराक में हैं। इनका यह मत स्‍ट्रांग होने ही वाला है कि- “इन अमृत तुल्‍य पदार्थों के सेवन से कभी कोई नहीं मरता। ड्रग एडिक्‍शन एक भ्रम है। नशाखोरी एक दुष्‍प्रचार है। इससे कभी किसी का कुछ बुरा नहीं होता, बल्कि अर्थव्‍यवस्‍था और इंसान दोनों को पंख लग जाते हैं।
इनकी देखा-देखी मिलावट के क्षेञ के विद्वान भी अपनी बिरादरी को सपोर्ट करने वाले शक्तिशाली जन-प्रतिनिधि की तलाश में लग गए हैं। उन्‍हें भारी अफसोस है कि उन्‍होंने समय रहते चुनाव में अपना आदमी नहीं खड़ा किया। उनका भी सीना ठोककर कहना है कि-“मिलावट से कोई नहीं मरता। पिछले सढ़सठ सालों से हल्‍दी में पीली मिट्टी, मिर्च पाउडर में ईट का चूरा और धनिया में घोड़े की लीद मिलाई जाती आ रही है, आज तक किसी के मरने का कोई समाचार नहीं है। खान-पान की कौनसी सामग्री नकली नहीं बनती, कभी किसी की मौत हुई है? हमारे देश में तो मरीज़ लोग नकली दवाइयों से ही ठीक होते हैं और ह्रष्‍ट-पुष्‍ट बने रहते हैं। लिहाज़ा मिलावट और नकली उत्‍पादों के संरक्षण-संवर्धन के लिए शीध्र कुछ किया जाना चाहिए। अलग से एक मंञालय बना दिया जाए तो मिलावटी और नकली उत्‍पादों में इफरात वृद्धि की जा सकती है।“
फल-सब्जि़यों और तमाम तरह के कृषि उत्‍पादों में पेस्‍टीसाइड्स के इस्‍तेमाल से लोगों का स्‍वास्‍थ खराब होने की अफवाहें आम हैं, मगर इन्‍हें खाकर कभी किसी के मरने की खबर सुनी है? सुनी भी होगी तो वह सरासर झूठ है। बेवजह पेस्‍टीसाइट्स को ज़हर बताकर इन्‍हें बंद करवाने का षड़यंञ रचाया जाता है। यह लॉबी तो इस बात की भी सिफारिश करवाने की फिराक में है कि पेस्‍टीसाइट्स को नमक और चटनियों की तरह थाली में परोसकर खाने की प्रथा को प्रचलन में लाने के लिए कुछ कद्दावर जन-प्रतिनिधियों का समर्थन मिल जाए तो पेस्‍टीसाइट के उत्‍पादन के सारे रिकार्ड टूट पड़े।
इधर हाल ही में जयपुर में खून के नाम पर थैली में लाल रंग का पानी भरकर बेच देने की अद्भुत घटना सामने आई है। किधर हैं महान लोग, आओ और मुनादी करो कि शरीर में खून की जगह लाल रंग का पानी चढ़ाने से कभी कोई नहीं मरता, क्‍योंकि आदमी का खून वैसे ही पानी हो चुका है। आदमी यूँ ही नहीं मरता।  

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

बजट का अनुमान

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//
कुछ ही घंटों में ‘आम’ बजट आने वाला है। इससे पहले कि टी.वी. वाले बजट पूर्व अनुमानों का कलरव शुरू करें, पेश-ए-खिदमत है आने वाले बजट की कुछ ऐतिहासिक घोषणाओं का पूर्व अनुमान। समझा जाता है कि इस बार ‘आम-बजट’ में सचमुच ‘आम’ लोगों के लिए ही सब कुछ होगा और खास लोग इसके आगमन से भारी ठगा हुआ महसूस कर उपद्रव करेंगे।
इसकी विशेषता होगी कि यह बजट हमेशा की तरह ‘घाटे’ का बजट न होकर बंफर ‘फायदे’ का बजट होगा, और बजट में दर्शाए जाने वाले ‘फायदे’ को आम जनता के बीच बराबर-बराबर बाँटने के लिए समुचित प्रावधान किये जाएंगे ताकि जनता के सिर पर लदे हुए राष्ट्रीय कर्ज़ का बोझ कुछ हलका हो सके और वह सुभीते से चल-फिर सके।
आम जनता को जबरदस्त झटका लगेगा कि इस बार आटा, दाल, चावल, नून, तेल सब कुछ बेहद सस्ता कर दिया जाएगा। रोटी कपड़ा मकान आम आदमी की इतनी पहुँच में आ जाएंगे कि ‘परोपकारी राज्य’ की संवैधानिक अवधारणा से भी ऊपर उठकर ‘समाजवादी समाज’ का भ्रम पैदा हो जाए। बजट की इस करतूत से बड़ी संख्या में आम जनता कुंठित होकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए प्रेरित हो जाएगी क्योंकि ज़ालिम बाज़ार से मुकाबले के लिए रात-दिन बस कमाई की जद्दोजहद में काले-पीले काम करने की मजबूरी के समाप्त होने से उनके सामने जो खालीपन आ खड़ा होगा, उसको भरने के लिए उनके पास कोई रचनात्मक रास्ता नहीं होगा।
शिक्षा-दीक्षा से संबंधित सारे खर्चों की जिम्मेदारी सरकार खुद अपने सिर पर ले लेगी, ऊँची से ऊँची पढ़ाई के लिए फीस की अनिवार्यता समाप्त हो जाएगी एवं पाठ्य पुस्तकें और तमाम शिक्षण सामग्री मुफ्त में उपलब्ध होगी। जरूरी हुआ तो नालायक बच्चों को फीस दे-देकर पढाया जाएगा।
बिड़ी-सिगरेट-तमाकू और देसी-विदेशी शराब, तमाम ड्रग्स, भांग, अफीम, चरस इत्यादि पर महँगाई कि जबरदस्त मार होगी और ये सिर्फ खास बड़े-बड़े रईस लोगों की पहुँच मात्र में ही रह सकेंगे। राजस्व के नुकसान से बचने के लिए कीमत को ऐसे अनुपात में बढ़ाया जाएगा कि आम जनता द्वारा मजबूर होकर इन लतों को छोड़ने से सरकारी खज़ाने पर कोई दुष्प्रभाव न पड़े और सरकार की कमर सही सलामत रहें। जीवन रक्षक दवाइयाँ, टानिक्स, ग्लूकोस, टिंचर, आयोडीन और तमाम सर्जिकल आयटम्स की कीमतें ज़मीन पर पटककर इन्हें घरेलू उद्योग के दायरे में लाया जाएगा ताकि पान-बिड़ी सिगरेट की दुकानों के प्रोपराइटरों को बेरोजगारी का सामना न करना पड़े।
पेट्रोल, डीजल, एल.पी.जी. की कीमतों में इस कदर कमी लाई जाएगी कि ओपेक कंट्रीज़ भी इनकी खरीद के लिए भारत के चक्कर लगाए और अमरीका को डीज़ल-पेट्रोल, गैस भरवाने के लिए यहाँ आना पड़े। देश के भीतर तो पाइप लाइन से घर पहुँच सप्लाई का व्यापक प्रबंध किया जाएगा ताकि हर भारतीय रोज़ सुबह चार बजे पेट्रोल-डीजल, गैस का नल आने पर अपनी सपनों की लक्झरी कार का टेंक फुल कर सके।
मोबाइल, कम्प्यूटर, आई-फोन, टी.वी. इत्यादि-इत्यादि इलेक्ट्रानिक गजेट्स इतने सस्ते कर दिये जाएंगे कि लोगों को खरीदने में शरम आए और वे इसके इस्तेमाल में खोटी होने वाले टाइम को बचाकर देश की दूसरी समस्याओं पर ध्यान देने के लिए खर्च कर सकें। 
इसके अतिरिक्त भी इस बार अनेक क्रांतिकारी प्रावधान बजट में किये जाने की पूर्ण संभावनाएँ हैं जो कि मेरा यह बजट अनुमान फेल न हो गए तो अवश्य ही बजट में नज़र आएंगे। अनुमान तो आखिर अनुमान हैं, फेल भी हो सकते हैं, उसमें क्या! दिल को समझाने के लिए गालिब ये बजट पूर्व अनुमान अच्छा है।

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

फैक्चर्ड मैनडेट



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
दिल्ली की जनता को ‘फैक्चर्ड मैनडेट’ देने की सज़ा मिली है-दोबारा चुनाव! इसके बाद भी यदि जनता न मानी तो दोबारा, तिबारा फिर चौबारा और पाँचवी बार भी हो सकते हैं चुनाव। जब तक किलियर कट मैजोरिटी नहीं दोगे बेटों, झेलते रहो चुनाव। सही हों-गलत हों, चोर हों-लुटेरी हों, भ्रष्ट हों-निकम्मी हों, कैसी भी हों राजनैतिक पार्टियाँ, मैनडेट तो तुम्हें किसी एक को देना ही पड़ेगा नासपिटों, यही लोकतंत्र का तकाज़ा है।
लेकिन मुझे लगता है कि अगर राजनैतिक पार्टियाँ आपस में तालमेल न बिठाकर यूँ ही बार-बार चुनाव-चुनाव खेलती रही तो कहीं ऐसा न हो कि जनता, तमाम पार्टियों को घर बैठने की सलाह देकर खुद ही सरकार बना ले और कुटिर उद्योग की तरह उसे चलाए। क्या कहा ? लोकतंत्र है! जनता ऐसा नहीं कर सकती! ऐसा करना तो सरासर देशद्रोह कहलाएगा। सरकार तो किसी न किसी पार्टी को ही चलाना पड़ेगी! जनता का फर्ज़ है कि वह चुपचाप किसी एक पार्टी को मैनडेट थमाकर सरकार चलाने का अधिकार दे और घर जाकर आराम करे। भूले से भी खुद उस अधिकार का इस्तेमाल करने की जुर्रत की तो समझ लेना, इतने डंडे पडेंगे कि नानी याद आ जाएगी।
फिर क्या करें? किसी को भी पकड़कर राज्याभिषेक कर दें? आ भई, तू फालतू बैठा है, आजा बैठ जा आकर गद्दी पर और फटाफट अपने नौरत्‍न एपाइंट कर ले। चलने दे नादिरशाही की तर्ज पर दिल्ली की सरकार। यह भी नहीं हो सकता, लोकतंत्र इसकी इजाज़त नहीं देता। लोकतंत्र इस बात की इजाज़त दे देता है कि जनता तीन-चौथाई तादात में नादिरशाहों को चुनकर क्लियर मेनडेट दे दे, बाकी सरकार चलाने का काम वे खुद कर लेंगे। जनता को तकलीफ उठाने की कोई ज़रूरत नहीं।
एक और आइडिया है। इधर सरकारी सेवकों की सुप्रसिद्ध मक्कारी की वजह से बहुत सारी सेवाएँ प्रायवेट सेक्टर को सौंपी जाने लगी हैं। क्यों न लगे हाथ यह एक्सपेरीमेंट भी कर लें, कि दिल्‍ली में सरकार चलाने का जिम्मा प्रायवेट सेक्टर को सौंप दिया जाए। शीर्ष कार्पोरेट घरानों को आमंत्रित कर दिल्ली सरकार बनाकर उसे चलाने के प्रस्ताव प्राप्त किये जाए। या फिर, सीधे ओपन टेंडर आमंत्रित कर सरकार बनाने और चलाने की दरें प्राप्त कर लें और लोएस्ट दर के आधार पर सरकार बनाने का ठेका किसी फर्म को देकर झंझट से छुटकारा पा लिया जाए। ठेके में स्पर्धा को और व्यापक बनाना है तो ग्लोबल टेंडरिंग की जा सकती है ताकि मल्टीनेशनल्स भी दिल्ली सरकार बनाने के प्रस्ताव पेश कर सके, और यदि किसी अपने वाले को उपकृत करना है तो कोटेशन कॉल कर पीसवर्क पर सरकार बनाने का ठेका दिया जा सकता है। अर्थात प्रत्येक डिपार्टमेंट अलग-अलग राजनैतिक पार्टी को देकर दिल्ली सरकार का कामकाज सुचारू रूप से चलाया जा सकता है।
देखो भई, पुरानी कहावत है जैसा देस वैसा भेस । नहीं मान रहे बापड़े और हर बार फैक्चर्ड टूटा-फूटा, बेमतलब का मैनडेट देते रहेंगे तो अपन को तो भई देश चलाना है। कम्बख्त इस जनता का क्या, जहाँ मर्ज़ी वहाँ अपना वोट पटक कर लोकतंत्र के सामने मुसीबत खड़ी कर देती है। अब फिर अगर जनता ने वही हरकत की तो मैं तो दूसरी स्टेट से जनता बुलवाकर दिल्ली में चुनाव करवाने तक के पक्ष में हूँ, किसी को अच्‍छा लगे या बुरा। जैसे भी हो भाई लोकतांत्रिक ढॉचे की सुरक्षा तो होना ही चाहिए।   
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