रविवार, 12 जुलाई 2020

निठल्‍लों के वाट्सअप ग्रुप


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

वाट्सअप ग्रुप आजकल इफरात में बढ़ चले हैं । इससे साबित होता है कि निठल्‍ले भी बड़ी तादात में बढ़ गए हैं। इन निठल्‍लों ने अपने-अपने वाट्सअप ग्रुप बना रखे हैं और अपनी सल्‍तनतों की तरह वे रात-दिन उन ग्रुपों की छाती पर सवार रहते हैं । एक ग्रुप से जी नहीं भरता तो चार-छ: और ग्रुप तो बनाते ही हैं साथ ही आठ-दस अन्‍य वाट्सअप ग्रुपों में भी अपनी आवाजाही बनाए रखते हैं ताकि निठल्‍लेपन के इस समय को हर ग्रुप में बराबर-बराबर काटा जा सके और वाट्सअप निठल्‍लेपन की समस्‍त गतिविधियों पर गिद्ध सी नज़र भी बनाई रखी जा सकें ।
ऐसे ही कुछ निठल्‍लों की वाट्सअप सल्‍तनत पर मैंने एक लघु शोध सा शुरू किया तो पता चला कि एक सल्‍तनत में तो एक निठल्‍ला रात तीन बजे से ही सक्रिय हो जाता है। जैसे उसे ग्रुप की चौकीदारी करने का महत्‍वपूर्ण कार्य सौंपा गया हो । तड़के 3 बजे उठकर अपने ग्रुप में आठ दस फूल-पत्तियों, देवी-देवताओं के चित्रों के साथ, गुडमार्निंग, सुप्रभात, सतश्री अकाल, चोरी की शेरों -शायरी, कविताएँ इत्‍यादि-इत्‍यादि का मलबा उढेलकर फि‍र एक-एक कर सारे ग्रुपों में चक्‍कर लगाना चालू करके यही कचरा सभी जगह छोड़ आने के बाद तब वह चैन की साँस लेता है । किसी सुंदर निठल्‍ली का जन्‍मदिन हो तो फिर तो पूछो ही मत। फूलों के गुच्‍छे, मिठाई के डिब्‍बे, चाकलेट, केक, पेस्‍ट्री इत्‍यादि-इत्‍यादि के वर्चुअल गिफ्ट ग्रुप की बजाय व्‍यक्तिगत मैसेज में भेजकर फिर रिटर्न गिफ्ट का इंतजार करने बैठ जाता था ।
एडमिन निठल्‍ला यू तो निठल्‍ला ही होता है मगर अपने वाट्सअप ग्रुपों के काम से इतना ओव्‍हर लोडेड होता है कि बाकी निठल्‍लों को आश्‍चर्य होता है कि इतना सारा काम वह पता नहीं क्‍या खाकर कर लेता है। इधर-उधर से सामग्री उड़ा-उड़ाकर ग्रुप में डालना और फिर बाकी निठल्‍लों के कमेन्‍ट्स का इंतजार करना । कमेन्‍ट आया नहीं कि उसका जवाब खेच कर मारना । जवाब न आए तो जूता फेंक के मारना। संवाद के साथ-साथ वाद-विवाद, प्रतिवाद, पैदा करना । गरम लोहे पर तुरंत चोट होना चाहिए । अगर किसी ने निठल्‍ला कह कर पुकारा है तो तुरंत तू निठल्‍ला, तेरा बाप निठल्‍ला का प्रत्‍युत्‍तर पहुँच ही जाना चाहिये । चाहे शौचालय में हों परंतु तब भी मोबाइल वहीं ले जाकर हमला- प्रतिहमला जारी रखना ज़रूरी है । ग्रुप के ऊपर पकड़ ढीली नहीं होना चाहिये, चाहे कुछ भी हो जाए ।
कुछ ग्रुपों में कड़े अनुशासन का पालन करना बेहद जरूरी होता है । जो निठल्‍ला अनुशासन भंग करने का प्रयास करता है उसको सजा दी जाती है। एडमिन निठल्‍ले का बस चले तो वो अनुशासन हीनता के लिए अन्‍य निठल्‍लों को देश निकाले की  सज़ा दे दे, परंतु वह दया करके मात्र 2-3 दिनों या हफ्ता भर के लिए उसे ग्रुप से बाहर निकलने की सजा देकर काम चला लेता है ।
ग्रुप के किसी निठल्‍ले को बुरा मानने का अधिकार नहीं है। अगर खुदा न खास्‍ता कोई बुरा मान ही जाए तो उसे मनाने के लिए एक हाई पावर कमेटी टाइप का विशेष दल गठित किया जाता है, जिसमें ग्रुप के कुछ सीनियर निठल्‍ले शामिल किये जाते हैं जो किसी भी सूरत में सदस्‍य को वापस लाने में माहिर होते हैं ।
एडमिन गलतियों खामियाँ करने के लिए स्‍वतंत्र होता है । किसी निठल्‍ले ने एडमिन की गलती निकाल दी तो समझो ग्रुप में 9 रिक्‍टर स्‍केल का भूकंप आ जाएगा। फिर तो इस भूकम्‍प के झटके कई दिन तक रूक-रूक कर ग्रुप में लगते रहने हैं । एडमिन निठल्‍ला आठ-पन्‍द्रह दिन तक बाकी सारे निठल्‍लों की गलतियाँ निकाल-निकाल कर उन्‍हें खरी-रोटी सुनाता रहता है । जब तक कि वह गरीब हर सम्‍भव प्‍लेटफार्म पर एडमिन से क्षमा याचना नहीं कर लेता।
ग्रुप के बाकी निठल्‍लों की भूमिका को भी कोई कम कर के आँका नहीं जा सकता । समय-समय पर हा हा, ही ही, ठी ठी, वाह-वाह, क्‍या बात-क्‍या बात, साधु-साधु करते रहकर ग्रुप का निठल्‍लापन बरकरार रखने का जि़म्‍मा उनका होता है। साहित्यिक-सांस्‍कृतिक ग्रुपों में इसकी बानगी देखी जा सकती है। सारे निठल्‍ले एक-दूसरे की रचनाओं को बिना पढ़े लहालोट हुए जाते हैं । उनका बस चले तो वे अपने मोबाइल से वाट्सअप में घुसकर जिसकी रचना छपी है उसके वाट्सअप से बाहर निकलकर उसे हार-फूल, मालाएँ, शाल-श्रीफल इत्‍यादि चढ़ा आएँ। लगे हाथ आरती करके प्रसाद वितरण भी कर दें ।
लॉकडाउन में निठल्‍लों के हजारों नए-नए वाट्सअप ग्रुप कुकरमुत्‍तों की तरह उग आए थे । उन्‍होंने अपना निठल्‍लापन एक दूसरे से बाँटने के लिए रात-दिन एक कर दिए । अब लॉकडाउन कुछ-कुछ खुलने लगा है । निठल्‍ले अपने-अपने काम में लगने लगे हैं । कई वाट्सअप ग्रुप अब ठंडे पड़ गए लगते हैं । मगर सदा के निठल्‍लों के वाट्सअप ग्रुपों में अब भी वही धमाचौकड़ी जारी है ।
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शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

भाँति भाँति के फेस मास्क


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

आ गए, आ गए, आ गए, मल्टी स्पेशियलिटी, मल्टीपरपज़ फेस मास्क आ गए । शानदार डिज़ाइनर मास्कों की बेहतरीन रेंज आकर्षक दामों में। हमारे फेस मास्कों को लगाने से कोरोना के नाक-मुँह में घुसने का खतरा तो खत्म हो ही जाता है, एक से एक बेहतरीन सुविधाएँ भी मिलती हैं।
रेंज का पहला मास्क मुँह में इनबिल्ट टाइप का होता है और हनुमान जी के मुँख की तरह प्रभाव उत्पन्न करता है जिससे आप खुद भी रामभक्त नज़र आते हैं और हनुमान भक्तों के पूज्य भी हो जाते हैं। इनबिल्ट होने के कारण इसके बाजू से कोरोना तो क्‍या कोरोना को छूकर आई हवा भी प्रवेश नहीं कर सकती।
दूसरे मास्क में यह सुविधा है कि आप जो कुछ भी खाते हैं, जैसे गुटखा-तमाकू या प्याज़-मूली, उसका स्वाद आपके मुँह के अन्दर ही सुरक्षित रहता है। दूसरों को उसकी खुशबू-बदबू का आनंद उठाने का मौका नहीं मिलता। पायरिया के मरीज़ों को इससे बहुत ही फायदा है। मुँह की बदबू मुँह में ही भ्रमण करती रहती है, बाहर नहीं आती। प्रेमिका वगैरह के सामने मास्क हटाने की ज़रूरत नहीं पड़ती क्योंकि हमारे इस मास्क में ज़िप भी लगी हुई है। मास्‍क के सेन्टेड होने के कारण पायरिया की बदबू का प्रेमिका को एहसास ही नहीं हो पाता। सबसे शानदार फीचर इस मास्क का यह है कि बीवी से छुपकर दारू पीने वालों के लिए यह एक वरदान की तरह है। पी कर बीवी के बगल में भी बैठ जाओंगे तब भी उसे पता नहीं चलेगा।
तीसरे टाइप का मास्क उधार खाकर बैठने वालों के लिए बेहद उपयोगी है, क्योंकि इस मास्क से नब्बे प्रतिशत चेहरा ढक जाता है। किसी के पहचानने का प्रश्‍न ही नहीं उठता है। उधारी माँगने वाले यदि ज़्यादा ही चतुर हों तो उनको चकमा देने के लिए हमने दाढ़ी वाले मास्क, मूँछ वाले मास्क, या अड़ोसी-पड़ोसी लोगों के जबड़े-बत्तीसी की डिज़ाइन के मास्क भी बना कर देने की स्कीम चलाई है।
चौथी किस्म के मास्क हैं लोकप्रिय हस्थियों के चेहरों के मास्क। जैसे मोदी-शाह मास्क, सोनिया-राहुल मास्क, शाहरुख-सलमान-बच्चन मास्क, दिपिका-कंगना मास्क इत्यादि। विशेष आर्डर पर हम ट्रम्प और जिनपिंग का मास्क भी उपलब्ध करा सकते हैं। परन्‍तु दोनों मास्‍क धारियों के लड़ पड़ने का खतरा देखकर ऐसा करते नहीं है।
राजनेताओं के लिए हमारा पाचवाँ मास्क बहुत उपयोगी हैं। लगाकर खुले आम घूमते रहो, जनता पहचानेगी ही नही तो विकास का हिसाब-किताब भी नहीं मांग पाएगी। पार्टी के किसी काम्पीटीटर का केरियर बरबाद करने के लिए हुबहु उसके चेहरे का मास्क भी तैयार कर दिया जाता है, ताकि उसे लगाकर, विरोधी पार्टी के दफ्तर में घुसने का विडियों बनाकर वायरल किया जा सके।
एक मास्क तो हमने ऐसा इन्ट्रोड्यूज़ किया है जिसे लगाकर किसी को भी मुँह पर ही गंदी-गंदी गालियाँ दी जा सकती हैं। उस मास्क में गालियाँ छनकर अन्दर ही रह जाती है और बाहर सिर्फ चापलूसी वाले अच्छे-अच्छे शब्द ही निकलते हैं। इससे सिर फुटव्वल का खतरा नहीं उत्पन्न होता और भड़ास भी निकल जाती है।
हमने इकोफ्रेंडली मास्क भी बनाया है जो कि पेड़ के पत्तों इत्यादि से बना हुआ है। सड़क पर फेंक देने से इसे गाय-बकरी खा लेती हैं और पर्यावरण की रक्षा हो जाती है। आने वाले समय में हमें न जाने कितने मास्‍क सड़कों पर फेंकना पड़ें, उस लिहाज़ से यह बहुत उपयोगी है।
एक मास्क तो हमने इतना ज़बरदस्त बनाया है मत पूछिए। इसे कोरोना के खतरे से बचाव के साथ-साथ खाया भी जा सकता है। भूख लगने पर मुँह पर बंधे-बंधे ही आप इसे खा ले सकते हैं और वेज-नानवेज फास्ट फूड के सैंकड़ों अलग-अलग टेस्टों में इसका लुत्फ उठाया जा सकता है। भूख की भूख मिटेगी और रोज़ नया मास्क लगाने का उत्साह रहेगा। एक ही मास्क धो-धोकर चढ़ा लेने के खतरों से सामना नहीं होगा।
एक अनोखा मास्क हमने बाज़ार में ऐसा भी उतारा है जिसमें सामने वाला अपनी शक्ल देखकर कंघी कर सकेगा। इसी को मोबाइल स्क्रीन की तरह विकसित करने की हम कोशिश कर रहे हैं ताकि कोई भी सामने बैठकर अपना फेसबुक वाट्सअप स्टेटस देख सके।
एक मास्क हमारे पास ऐसा है जो अपने आप आपके कपड़ों के मैच का बन जाता है। आप नीली शर्ट पहनोगे तो वह नीला बन जाएगा और लाल शर्ट पहनने से लाल। लड़कियों के लिए तो इसमें प्रिंट मैच का आप्‍शन भी मौजूद है और लिपिस्टिक दर्शन के लिए ट्रांसपिरेंट खिड़की का प्रबंध भी होगा।
आइये, आइये, आइये। एक से एक बढि़या फेस मास्क खरीदकर लगाइये, कोविड 19 के साथ-साथ अपने पड़ोसी को भी हराइये और महामारी को अवसर बनाइये।
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गुरुवार, 9 जुलाई 2020

अर्थव्‍यवस्‍था का अर्थ-अनर्थ


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था एक ऐसी व्‍यवस्‍था है जिसमें न कोई ‘अर्थ’ है और न कोई ‘व्‍यवस्‍था’। यह  एक ऐसी अर्थव्‍यवस्‍था है जिसका ‘अर्थ’ व्‍यवस्‍था के ऊपर और ‘व्‍यवस्‍था‘ अर्थ के ऊपर चढ़ कर बैठी हुई होती है। यह वैसा ही है जैसा कि यह सवाल- लाड़ी है कि साड़ी है, साड़ी है कि लाड़ी है। लाड़ी ऊपर साड़ी है, साड़ी ऊपर लाड़ी है।
बहरहाल, भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पूँजीपतियों की तिजोरी में नहीं बल्कि रेल की पटरियों पर रहती है। पटरियों पर रहती है इसीलिए तो अक्‍सर पटरी से उतरी रहती है। पटरियों से नीचे वह ज्‍यादातर खेतों को रोंदती हुई चलती है। इसीलिए भारतीय किसान हर वक्‍त इस भारी-भरकम अर्थव्‍यवस्‍था के बोझ तले आत्‍महत्‍या करता रहता है।
पटरियों पर रहती है लेकिन इसे आप रेल नहीं कह सकते। क्‍योंकि कभी-कभी तगड़ा सरकारी पैकेज पाकर अर्थव्‍यवस्‍था तो पटरी पर लौट आती है परन्‍तु रेल बेपटरी होकर कभी पटरी पर नहीं लौटती। सीधे कबाड़खाने पहुँचकर किलो के भाव में तुल जाती है।
अर्थव्‍यवस्‍था कभी-कभी आसमान में भी चलती है परन्‍तु वहाँ पटरियाँ न होने के कारण वह दिशाहीन होकर भटक जाती है और सीधे सड़क पर आ जाती है। न न, इसका यह मतलब नहीं है कि पी.डब्‍लू.डी. ने आसमान में भी सड़कें बनाई हैं। वह दरअसल हमारे देश की उबड़खाबड़ सड़कों पर आ गिरती है। उठाने जाओ तो बुरी तरह सड़क से चिपक जाती है, जैसे सड़क पर गिरा मोबिल ऑइल, जिस पर से आमजनता और अक्‍सर सरकार भी, दोनों फिसल-फिसल कर गिरते रहते हैं। उठते हैं फिर गिरते हैं।
सड़क पर आ गिरी अर्थव्‍यवस्‍था को वापस खींचकर पटरियों पर लाना बेहद दुष्‍कर और लगभग असंभव सा कार्य हो जाता है। बिना अनुभवी और सक्षम ड्रायवर के यह कतई संभव नहीं होता। ड्रायवर की जगह अगर भटियारे को यह काम सौंप दिया जाएगा तब तो स्‍वाभाविक है कि सड़क पर रायता ही फैला हुआ मिलेगा। जैसा कि इन दिनों फैला हुआ है।
अर्थव्‍यवस्‍था रायते सी फैली हुई ही नहीं बल्कि उस मिल्‍क आइसक्रीम केंडी की तरह भी होती है जो फ्रिजि़ंग तापमान से मुक्‍त होते ही पिघलकर लोंदे की शक्‍ल में बहने लगती है और बच्‍चे उसकी खाली डंडी हाथ में लिए घूमते रहते हैं। बीच-बीच में आइसक्रीम की सूनी डंडी को ही चाट लेते हैं। कुछ देर तक तो अर्थव्‍यवस्‍था स्‍वादिष्‍ट लगती रहती है, फिर आइसक्रीम की डंडी की फाँसें चीभ में चुभने लगती हैं।  
इन दिनों अर्थव्‍यवस्‍था चुसे हुए आम सी हो गई है। अर्थशास्‍त्री यह कयास लगाते रहते हैं कि इसे आखिर कौन चूस गया है। जनता चूस गई है या कोई और। सच्‍चाई यह है कि आम जनता तक तो आम कभी पहुँचता ही नहीं है, चूसना तो बहुत दूर की बात है। दरअसल आम को तो खुद आम का पेड़ ही चूस कर खा गया होता है। कह सकते हैं कि अर्थव्‍यवस्‍था उस भक्षक वृक्ष के समान है जिसके फूल पत्‍ते और फल खुद वह वृक्ष ही खा जाता है। बाकी एक ठूँट बचा रह जाता है जिसे देख-देखकर अर्थव्‍यवस्‍था के विद्वान लेक्‍चर झाड़ते रहते हैं।
अर्थव्‍यवस्‍था के ‘अर्थ’ का अर्थ है व्‍यापक अनर्थ और अर्थव्‍यवस्‍था के ‘व्‍यवस्‍था’ का अर्थ है व्‍यापक दुर्व्‍यवस्‍था। इस अनर्थ और दुर्व्‍यवस्‍था में अर्थव्‍यवस्‍था की व्‍यवस्‍था चौपट है। ऐसी व्‍यवस्‍था का आखिर क्‍या अर्थ है जो ‘अर्थ’ और ‘व्‍यवस्‍था’ विहीन हो।
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सोमवार, 29 जून 2020

चीन के पिट्ठू का यहाँ कोई काम नहीं, यह बासठ का हिन्दुस्तान नहीं


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
अगड़म-बगड़म चाइनीज़ सामान की दुकान का आधा शटर खुला हुआ है और चीन के साथ हो गए पंगे से बेखबर चार-छः लोग सस्ता चाइनीज़ सामान खरीद भी रहे हैं। अचानक राष्ट्रवादी नवयुवकों का एक झुंड दुकान पर आ धमकता है और उनका नेता दुकान के बाहर से ही दुकानदार को ललकार कर पूछता है-कौन है बे अन्दर? साले राष्ट्रद्रोही की औलाद। टीवी न्यूज़ नहीं देखता क्या? वो हरामज़ादा चीन हमारी भारतमाता की छाती पर चढ़ा चला आ रहा है और तू उसे फाइनेंशिल सपोर्ट कर रहा है? बाहर निकल राष्ट्रदोही कहीं के।
घबराया हुआ एक अधेड़ उम्र का दुकानदार आधे शटर से बाहर निकलता है और झुंड से मुखातिब होकर पूछता है-अरे क्या हुआ पप्पू भैया? अरे डंपू तुम भी हो? क्या हो गया यार?
पप्पू भैया बोले- यह देश के साथ सरासर गद्दारी है। चीन हमें कुचले दे रहा है और तुम खुलेआम उसका माल बेचकर उसे फायदा पहुँचा रहे हो। चलो बंद करो सब वर्ना दुकान को आग लगा देंगे।
दुकानदार गिड़गिड़ाता हुआ बोला- पप्पू भाईसाहब कैसी बात कर हो यार। हम और गद्दार? क्या बताएँ पप्पू भैया, लॉकडाउन के एकदम पहले ही उधार लेकर 20 लाख का माल सीधे चीन से लाए थे। चार महीने से एक पैसे का धंधा नहीं हुआ। यार पैसे न फँसे होते तो कसम से मैं भी तुम्हारे साथ गद्दारों को सबक सिखाने के लिए निकल पड़ता। डंपू यार समझाओं पप्पू भैया को। हम तो खुद पक्के राष्ट्रवादी है, मगर अपना पैसा तो नहीं डुबा सकते न भाई।
डंपू बगलें झाँकता हुआ बोला- अंकल मैं क्या करूँ? अभी तो चीन के खिलाफ लहर चल रही है। आपको दुकान नहीं खोलना चाहिए थी।
दुकानदार बोला-तुम्हारी बात एकदम सोला आना दुरुस्त है। मैं कहाँ मना कर रहा हूँ। बिल्कुल दुकान नहीं खोलना चाहिए थी। मगर भाई क्या करुँ, घर में फाँके पड़ने की नौबत आ गई है। पैसा रिकवर नहीं हुआ तो घर-दुकान सब बिक जाएगा। उधारी वापस करना है भाई समझा करो। वर्ना हम कोई राष्ट्रवादी से एक रत्ती भी कम नहीं। थोड़ा माल निकलने तक राष्ट्रवाद को साइड में रखते है न भाई। तुम्हारा सब खर्चा पानी मैं दूँगा, पक्का। बस थोड़ा माल बेच लेने दो, नहीं तो मैं पटियों पर आ जाऊँगा।
पप्पू भैया और उनके राष्ट्रवादी साथियों ने दुकान का पूरा शटर उठा दिया और पूरा टोल अन्दर घुस गया। अन्दर सामान खरीद रहे लोगों को हड़काते हुए पप्पू भैया बोले-क्यों बे चीन के पिट्ठुओं, चीन का सामान खरीदकर चीन के हाथ मजबूत कर रहे हो? तुम्हें पता नहीं चीन ने क्या हरकत की है। हमारे बीस बहादुर सैनिकों की जान ले ली है, और तुम लोग खुद तो गद्दारी कर ही रहे हो और ऊपर से दुकानदार को भी पाप का भागीदार बना रहे हो। चलो फुटो यहाँ से।
दुकानदार फिर गिड़गिड़ाने लगा-पप्पू भैया क्या कर रहे हो यार। ग्राहक देवता होता है, उसे ही भगा दोगे तो मेरी रिकवरी कैसे होगी? भाई शटर इसीलिए तो डाल रखा है कि न हमें शर्मिंदगी हो न ग्राहक को, और माल भी ठिकाने लग जाए। भाई अपने ग्राहक भी कम राष्ट्रवादी नहीं है, कसम से। मेरा माल खत्म हो जाने दो, यही ग्राहक अपने बुलावे पर इसी खरीदे हुए चाइनीज़ माल की होली जलाने के लिए बाहर न निकलें तो मेरा नाम बदल देना। मैं चलूँगा भाई आपके साथ चीनी सामान की होली जलवाने। आप प्रोग्राम तो बनाओ। बस मेरा माल बिक जाने दो।
पप्पू भैया बोले-यह अच्छा आइडिया दिया सेठ तूने। यहीं दुकान में ही चीनी माल की होली जला दें तो कैसा रहेगा? प्रेस वालों से कह देंगे कि दुकानदार ने देशभक्ति में खुद अपना बीस लाख का माल फूँक लिया।
दुकानदार बुरी तरह घबरा गया। हाँथ-पाँव जोड़ता हुआ बोला-अरे नहीं नहीं नहीं नहीं पप्पू भाई साहब। अरे डंपू तेरा पापा तो मेरे साथ रोज़ की बैठक वाला है। समझा न यार इसे। देख भाई राष्ट्रवाद हमारी रग-रग में है। हम कभी देश के खिलाफ कोई काम नहीं करते। पाकिस्तान के खिलाफ हम कभी पीछे नहीं रहते। चीन के खिलाफ भी कोई मनाही नहीं है। मगर बीस लाख कोई कम नहीं होते यार। मर जाऊँगा मैं। अपन करेंगे न बाद में, अभी थोड़े दिन राष्ट्रवाद स्थगित रख लो न। राष्ट्रवाद कहीं भागा थोडे ही जा रहा है। न चीन अपनी हरकतों से बाज आने वाला हैं। भाई जित्ते की कहोगे उत्ते की रसीद कटवा लूँगा। खर्चे पानी का वादा मैं पहले ही कर चुका हूँ। और क्या चाहिए बोलो?
पप्पू भाई जेब से बीड़ी माचिस निकालते हुए बोले- देखो सेठ, यह देश की इज्‍ज़त का सवाल है। हमने चीनी माल का बहिष्कार करने का प्रोग्राम हाथ में लेकर भारत माता की इज्‍ज़त को बचाने का प्रण लिया है। और तुम भारतमाता की इज्‍ज़त की धज्जियाँ उड़ा रहे हो। ऐसा बिल्कुल नहीं चलेगा। फिर धीरे से दुकानदार के कान में फुसफुसाते हुए बोले- बीस लाख का माल है, चालीस लाख तो बनाओगे ही। फिफ्टी-फिफ्टी कर लेते हैं।
दुकानदार ने पप्पू भैया के चरणों में लोट लगा दी। वह एक कुशल अभिनेता की तरह रोने गिड़गिड़ाने की एक्टिंग करता हुआ बोला-क्या बोल रहे हो पप्पू भैया, दोगुना? बीस का चालीस? भैया, बड़ी मुश्किल से खरीद के रेट में निकाल रहे हैं माल, आपको कहाँ से दें? ए डंपू समझा न भाई इनको। मैं तो जीते जी मर जाउँगा। आत्महत्या के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा मेरे पास भाई, दया करो।
पप्पू भाई अपने सपाट चेहरे को और सपाट बनाते हुए बोले- राष्ट्रद्रोहियों के साथ कोई दया नहीं। गद्दारों के साथ कोई मुरव्वत नहीं। चीन के पिट्ठू का यहाँ कोई काम नहीं, यह बासठ का हिन्दुस्तान नहीं। नारेबाजी ज़ोर पकड़ने लगी। राष्ट्रभक्तों की भीड़ दुकान के अन्दर घुस गई जिसमें डंपू सबसे आगे था। देखते ही देखते दुकान का सारा सामान बाहर सड़क पर फेंक दिया गया और आसपास मौजूद सैंकड़ों तमाशबीन चीनी सामान उठा-उठाकर भागने लगे।            
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बुधवार, 17 जून 2020

चोटी का आत्मनिर्भर बन जाऊँ


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
आत्मनिर्भरता अपने-आप में बहुत ही ज़बरदस्त किस्म की फिलॉसफी है। पुराने ज़माने के सभी बाप लोग यह फिलॉसफी जम कर झाड़ा करते थे। मूछों के रुएँ फूटने से पहले ही ‘‘आत्मनिर्भर बनो-आत्मनिर्भर बनो’’ का राग अलापते हुए वे हाथ धोकर अपने बच्चों के पीछे पड़ जाते थे और कुछ धनकुबेरों के, खंभे के नीचे लालटेन की रोशनी में पढ़ाई से लेकर बड़ा कार्पोरेट हाउस खड़ा करने तक की कहानियाँ सुना-सुना कर बोर किया करते थे। दरअसल इसके पीछे उनका मकसद यह स्पष्ट कर देना होता था कि-भैया, बहुत बड़े ढोर हो गए हो अब तुम, तुम्हारे खर्चे उठाना हमारे बस की बात नहीं है। अपना इंतज़ाम खुद कर लिया करो। सिर्फ खर्चे ही नहीं, युवा अवस्था के लफड़े-झपड़े, समस्याएँ-झँझटें, सिरदर्द इत्यादि से तंग आकर बाप लोग आते-जाते आत्मनिर्भरता की यह फिलॉसफी बच्चे पर जगह-जगह चिपका दिया करते थे।
यूँ तो आत्मनिर्भरता की कहानी काफी पुरानी है। पूँजीवाद के पाँव पसारने से पहले लोग आत्मनिर्भर ही हुआ करते थे। अपना आटा खुद अपनी घट्टी पर पीसकर रोटी बनाते और खाते थे। अब तो आटा पीसने की ज़िम्मेदारी भी बड़े-बड़े कार्पोरेट घरानों ने ले रखी है। वे आधुनिक प्लांटों-मशीनों में आटा पीसकर बढ़िया लुभावनी पेकिंग में लपेटकर हमें बेच देते हैं। हमारी आत्मनिर्भरता उनकी तिजोरी में जाकर बैठ जाती है।
आज़ादी आन्दोलन के समय गाँधीजी ने चरखे का काफी प्रचार किया था। उनकी मंशा थी कि घर-घर में चर्खा स्थापित हो, जैसे कि घट्टी स्थापित थी। वे चाहते थे कि जनता-जनार्दन अपना कुर्ता-पजामा, साड़ी-ब्लाउज खुद बनाकर पहने, बिड़ला के भरोसे न रहें। आत्मनिर्भर बने। लेकिन उन्हें पता ही नहीं था कि उनका करीबी वह आदमी उन्हीं की नाक के नीचे बैठा उनके आत्मनिर्भरता के सपने में पलीता लगा रहा है। बिड़ला जी ने मौका मिलते ही देश भर में अपनी कपड़ा मिलें खोल ली और कपड़ा बना कर बेचने लगे। बापू का सपना और लोगों की आत्मनिर्भरता बिड़ला मंदिर की देहरी पर पड़ी रह गई। 
   आत्मनिर्भरता की फिलॉसफी पिछले सत्तर सालों में कई बार सुनी गई। अब फिर पलट कर आई है। पहले उस वक्त आई थी जब कुछ नहीं था, अब तब आई है जब सब कुछ होने के साथ-साथ गजब की सक्षम सरकार भी है। सरकार चाहती हैं कि हम आत्मनिर्भर बनें, उन्हें कोई तकलीफ न दें। हम रोज़गार न माँगें आत्मनिर्भर बनें, हम अच्छी शिक्षा न माँगें आत्मनिर्भर बनें, अच्छा और सस्ता इलाज न माँगें आत्मनिर्भर बनें। कुछ लोग तो हैं भी इन सब मामलों में प्रचंड आत्मनिर्भर। रोज़गार का मसला चोरी-चकारी करके सुलझा लेते हैं या छोटी-मोटी कोई रहेड़ी-ठेली लगा लेते हैं। शिक्षा का मामला फर्ज़ी सर्टिफिकेट बनवाकर निबटा लेते हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में तो लम्बे समय से आत्मनिर्भरता है। मुँह से हवा अन्दर-बाहर करो या आस-पास लगी कोई भी जड़-पत्ती पीसकर, उबालकर पी लो।
मैं भी अब सोच रहा हूँ कि चोटी का आत्मनिर्भर बन जाऊँ। अपना गेहूँ खुद उगाऊँ, आटा खुद पीसूँ और खाऊँ। अपना कपास उगाऊँ, कपड़ा बुनूँ, कपड़े सिलूँ और पहनूँ। बस, ट्रेन, रिक्‍शा पर चढ़ना बंद कर दूँ, पैदल रास्ता नापूँ। बीमार पड़ने पर सरपट डॉक्टर के पास भागता हूँ, यह छिछोरी आदत बंद कर दूँ। अपना डाइग्नोसिस, पैथोलॉजी टेस्‍ट और इलाज खुद कर लिया करूँ। छोटा-मोटा आपरेशन खुद ही निबटा लूँ, फाइव स्टार अस्पतालों को कोई तकलीफ न दूँ। होटल, रेस्टोरेंट का खाना न खाऊँ, जीभ लपलपाए तो खुद बनाऊ खुद खाऊँ। अपने हाथ से कपड़े फचीटूँ वाशिंग मशीन के भरोसे न रहूँ। कपड़ों पर इस्तरी भी खुद कर लूँ रामसिंह को परेशान न करूँ।
मेरा बस चले तो मैं तो भैया अपना बजट खुद ही बना लूँ, एलोकेट करूँ, और अपना विकास खुद ही कर लूँ। विकास के नाम पर चुनाव जीतने वालों के भरोसे कुछ न छोड़ूँ। अपनी सड़क खुद खोदूँ खुद बना लूँ। अपना मकान खुद ही तामीर कर लूँ। अपना पुल, अपना बाँध, अपना तालाब खुद बनाऊँ और सरकार के भरोसे बिल्कुल न बैठूँ । अपना कच्चा तेल मैं खुद निकाल लूँ, अपना पेट्रोल अपनी गैस खुद बना लूँ, अंबानी-अडानी को कोई कष्ट न दूँ। और कितना आत्मनिर्भर हो जाऊँ बताओ आप?
मैं तो हर उस चीज़ में आत्मनिर्भर होने को तैयार हूँ जिसकी जवाबदेही लेने से जवाबदार लोग कतराते हैं। चलो मैं अर्थव्यवस्था, जी,डी,पी, और महँगाई सूचकांक में भी आत्मनिर्भर हो लूँगा, ताकि अपनी बरबादी का मातम खुद मना लूँ, तुम पर कोई आँच न आए।
मैं तो यहाँ तक आत्मनिर्भर होने को तैयार हूँ कि अपनी मौत को भी आत्मनिर्भरता से मर लूँ। चाहे रेल के नीचे आ कर मरूँ, चाहे बस के नीचे, चाहे भूखा-प्यासा तड़फ-तड़फ कर मर जाऊँ। चाहे कोरोना वायरस से या सार्स-इबोला किसी से भी मरूँ, पूरी आत्मनिर्भरता बरतते हुए मरूँ। तुम पर कोई दोष न आने दूँ। यहाँ तक कि खुद मरघट में जाकर अपनी मृत्‍युशैया खुद ही बना लूँ, खुद ही उसपर लेट जाऊँ और खुद ही अग्नि लेकर भस्म हो जाऊँ। अब इससे ज्यादा आत्मनिर्भर और किस देश की जनता हो सकती है, बताओ भला?
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सोमवार, 8 जून 2020

स्‍थानांतरण मस्तिष्‍क का

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

          मानव शरीर के सबसे कीमती ऊतकों के समूह ‘मस्तिष्‍क’ को सुरक्षित एवं चलायमान बनाए रखने के लिए प्रकृति ने मनुष्‍य के शरीर में मात्र एक जगह बनाई है, ‘खोपड़ी’, परन्‍तु कुछ महान लोगों ने अथक परिश्रम, दीर्घकालीन प्रयासों एवं अपने आस्‍था व विश्‍वास के बल पर प्रकृति की इस स्‍थायी व्‍यवस्‍था के विरुद्ध जाकर मस्तिष्‍क को रखने के लिए दूसरा ही ठीकाना विकसित कर लिया है, वह है ‘घुटना’। खोपड़ी के साइज़ के मस्तिष्‍क को घुटने के साइज़ में लाने के लिए उन्‍होंने क्‍या किया होगा पता नहीं। मगर जब किसी ज्‍़यादा आयतन वाली वस्‍तु को उसके आयतन से बनिस्‍पत कम जगह में ठूँस-ठूँस कर घूसेड़ा जाए तो निश्चित ही उसकी कार्य-क्षमता सदियों नीचे जाकर गिर सकती है, और तो और उसकी अकाल मृत्‍यु भी हो सकती है। 
          इन दिनों हो यही रहा है कि अक्‍़ल और सोच-विचार संबंधी सभी कार्य उसी ज़बरदस्‍ती घुटने में ठुँसे हुए मस्तिष्‍क से कराया जा रहा है जो या तो कार्य-क्षमता विहीन है या मरणासन्‍न अथवा मृत अवस्‍था को पा चुका है। 
          खोपड़ी वाला रिक्‍त स्‍थान अधिकतर खाली मकान की तरह खाली पड़ा-पड़ा धूल-धक्‍कड़ और मकड़ी के जालों का उत्‍पादन करता रहता है। अन्‍दर यहाँ-वहाँ तंत्रिका तंत्र के केबल उखड़े हुए बिजली के तारों की तरह तटके हुए, हवा में झूलते देखे जा सकते हैं। इन केबलों की कोई उपयोगिता नहीं रह गई है क्‍योंकि जिस मस्तिष्क को वे सूचनाएँ पहुँचाने का काम करते थे वह तो घुटने में शिफ्ट कर दिया गया है। दाएँ या बाएँ किस घुटने में यह भी अज्ञात है। खोपड़ी मालिक ने वे कीमती केबल शायद इसलिए लटके छोड़ दिए हैं क्‍योंकि क्‍या पता निज़ाम बदलने पर शायद फिर मस्तिष्‍क को घुटने से निकालकर खोपड़ी में स्‍थापित करना पड़ जाए। या हो सकता है बुरे वक्‍त में उन केबलों को निकाल कर कबाड़ी को बेचने का भी इरादा हो। 
          मस्तिष्‍क विहीन खाली पड़ी खोपड़ी में किसी-किसी के द्वारा कूढ़ा-करकट इकट्ठा करने की बातें सुनी जाती हैं। बाहर कचरा फेंकना मना जो है। जुर्माना हो सकता है। कूढ़े से कम्‍पोस्‍ट अच्‍छा बनता है। देशभक्‍त शोहदों के बालों की बढ़वार शायद इसीलिए आजकल ऊफान पर है क्‍योंकि कूढ़े की खाद जो प्रचूर मात्रा में उपलब्‍ध है। कुछ लोग खाली पड़ी खोपड़ी में भूसा स्‍टॉक कर के रखते हैं। जैसे आमतौर पर गाँवों में दबंग लोग अपने जानवरों के लिए स्‍कूल के कमरे में भूसा भर कर रखते हैं। हालाँकि खोपड़ी में भूसा भरा होना खासा खतरे का काम है। देश में आग लगाने वालों की कमी तो है नहीं। तभी तो आजकल लोग भड़की हुई खोपड़ी लिए दनदनाते फिरते हैं। ऐसा कोई हाई वोल्‍टेज सीन देखकर लोग आसानी से समझ जाते हैं कि अगले का दिमाग उसके घुटने में है। 
          जबसे गो और गो-उत्‍पादों की महत्‍ता बढ़ी है, लोग खाली खोपड़ी में गोबर भी भर के रखने लगे हैं। वक्‍त-ज़रूरत के हिसाब से उसे बाहर निकाल कर उपयोग में लाते रहते हैं। वैचारिक रूप से नापसंद लोगों के मुँह पर पोतने के लिए गोबर सबसे मुफीद रहता है। या फिर यूँ ही अपनी बातों-भाषणों के साथ मुँह से फुर्र-फुर्र उड़ाते रहो। नेता लोग यही करते हैं। गीला होने से गोबर में आग लगने का खतरा कम रहता है मगर यदि वह पड़ा-पड़ा सूख गया हो तो उसमें थोड़ी सी हवा के साथ आग दे दो, बस, वह आग भीतर ही भीतर सुलगती रहेगी और दशकों सदियों तक सुलगती रह सकती है। कब वहाँ से निकल कर निरीह मानव समाज को राख कर दे कह नहीं सकते। ऐसी काफी सारी राख हम अपने चेहरों पर पहले ही से पोते घूम रहे हैं। 
          मेरा मानना है कि भविष्‍य में मानव घुटने के अलावा भी मस्तिष्‍क को रखने के लिए कोई न कोई जगह अवश्‍य खोज लेगा। जैसे पिंडली या टखने में भी दिमाग को ठूँसकर रखा जा सकता है। हो सकता है घुटने में गठिया का प्रकोप हो जाने की दशा में लोग ऐसा करते भी हों। जो लोग दिन-रात खाने में लगे रहते हैं वे शायद पेट में मस्तिष्‍क रखने लगें। खाने से मेरा मतलब छप्‍पन भोग से नहीं बल्कि रिश्‍वत, सरकारी धन-संपत्ति, जनता की गाढ़ी कमाई खाने से है। उनके मस्तिष्‍क को सोच-विचार से क्‍या काम, पड़ा रहेगा पेट में। 
          बात निहायत ही अवैज्ञानिक है मगर मेरा बस चले तो मैं सबका मस्तिष्‍क उनके दिलों में स्‍थानांतरित करवा दूँ ताकि फिर वे अपने दिल से सोचने को मजबूर हो जाएँ। कहते हैं न दिल से सोचने वाले ज्‍़यादा भावुक होते हैं। शायद, दिल में रहकर आदमी का मस्तिष्‍क प्‍यार-मोहब्‍बत, भावनाओें, रिश्‍तों की खूबसूरती को समझने लगे। बेशकीमती इन्‍सानी जि़न्‍दगी की कद्र करने लगे, नफरतों की जुगाली करना भूल जाए, शायद ? ऐसा हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता।
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रविवार, 31 मई 2020

आत्‍मनिर्भर बनो ट्रेन बनो


//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//
 
स्टेशन पर एनाउन्समेंट गूँजा- मुंबई से चलकर इंदौर, हैदराबाद, जयपुर, बिलासपुर के रास्ते छपरा जाने वाली धारवाड़-गोरखपुर एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से एक पखवाड़ा विलंब से चल रही है। यात्रियों से निवेदन है कि वे रेल प्रशासन का सहयोग करें। यात्रियों की सुविधा के लिए रेल विभाग दृढ़संकल्पित है। धन्यवाद। टिंग-टाँग।
मैंने एनाउंसमेंट में बताए गए रूट का खाका अपने दिमाग में खींचने की असफल कोशिश की एवं लपककर पास खड़े टीसी को पकड़ लिया और पूछा- भाईसाहब, मुझे लखनऊ  जाना है, जिस गाड़ी का अभी-अभी एनाउंसमेंट हुआ उसमें बैठ जाऊँ क्या?
टीसी बोला- एनाउंसमेंट में लखनऊ  का नाम आया क्या?
मैने कहा- नहीं, सुना तो नहीं।
वह बोला-तो कैसे बैठ जाओगे? पिताजी की ट्रेन है क्या?
मैने कहा- सर नाम तो भोपाल का भी नहीं सुना, तो फिर वह गाड़ी भोपाल क्यों आ रही है?
वह बोला-ससुराल है उसकी। तुमसे पूछकर भोपाल आएगी क्या गाड़ी?
मैंने कहा- मगर एनाउंसमेंट ......
वह बात काटता हुआ बोला-ऐसा कहीं लिखा हुआ है क्या कि गाड़ी जिस स्टेशन पर नहीं आ रहीं है वहाँ एनाउंसमेंट नहीं किया जा सकता?
मैं निरुत्तर हो गया। मैंने याचना पूर्वक कहा-साहब कोई तरकीब बताइये। मुझे किसी भी हालत में लखनऊ  पहुँचना है। दूसरा कोई साधन नहीं है। क्या करूँ बताइये।
वह बोला- आत्मनिर्भर बनो। जैसे हज़ारों मजदूर, औरतें, बच्चे रेल के भरोसे न बैठकर पैदल ही अपने गणतव्य की और कूच कर गए हैं। तुम भी निकल लो। भगवान ने चाहा तो ट्रेन से पहले लखनऊ  पहुँच जाओगे। ट्रेन का कोई भरोसा नहीं है। आत्मनिर्भर हो गई है न, तुम भी आत्मनिर्भर बन जाओ। निकल लो।
मैंने कहा-मज़ाक मत करिये साहब। मुझे तो लखनऊ  का रास्ता भी नहीं पता।
वह बोला- भाई गूगल कर ले। ट्रेनें भी आजकल गूगल से ही चल रही हैं। आ गई, आ गई- नहीं आई, नहीं आई। और नहीं तो ये सामने रही पटरी, पकड़ले, और निकल जा।
मैंने कहा- नहीं नहीं, मैं इतना लम्बा रास्ता पैदल नहीं चल सकता। मैं तो ट्रेन से ही जाऊँगा। मुझे भारतीय ट्रेनों पर पूरा भरोसा है। परन्तु ऐसा तो नहीं होगा न कि ट्रेन मुझे लखनऊ  की बजाय अहमदाबाद पहुँचा दे? गूगल का कोई भरोसा तो है नहीं।
वह बोला- बिल्कुल हो सकता है। क्या फर्क पड़ता है। वैसे भी लॉकडाउन में सारे शहर एक जैसे होते हैं।
मैंने कहा- आप मज़ाक बहुत अच्छा कर लेते हो। मगर मेरी समस्या को समझिये। मुझे किसी भी कीमत पर लखनऊ  पहुँचना है।
वह रुष्ठ हो गया। झल्लाकर बोला- अरे यार, रेल्वे ने क्या हरेक को यहाँ-वहाँ पहुँचाने का ठेका ले रखा है? चले आए मुँह उठाकर, लखनऊ  जाना है, लखनऊ  जाना है।
मैंने कहा- साहब टिकट है मेरे पास। दस गुना ज्यादा पैसा देकर खरीदा है। अब आप कह रहे हैं कि ठेका ले रखा है क्या? क्या मतलब है। अरे जब पहुँचाना ही नहीं था तो टिकट दिया क्यों?
वह बोला- अबे तो टिकट तो बहुतों को मिलता है। सब लखनऊ पहुँच जाते हैं क्या? मेरा माथा मत खाओ। जिसने टिकट दिया है उससे बात करो।
मैंने कहा- माथा न खाऊँ तो क्या खाऊँ? मज़ाक बना रखा है आप लोगों ने। एक तो ट्रेन एक पखवाड़ा विलम्ब से चल रही है, ऊपर से पता ही नहीं है कि लखनऊ  जाएगी या नहीं जाएगी।
वह बोला- यार तो जहाँ जाएगी वहाँ चले जाओ। बाद में एडजस्ट कर लेना।
मैंने कहा- अरे तो भोपाल आएगी कि नहीं इसकी क्या गारंटी है?
वह बोला- भोपाल में एनाउंसमेंट हो रहा है न?
मैंने कहा- हाँ, सो तो है।
वह बोला- तो क्या हमें पागल कुत्ते ने काटा है जो उसे यहाँ आना नहीं है और हम गला फाड़-फाड़कर एनाउंसमेंट कर रहे हैं?
मैं फिर निरुत्तर हो गया। थोड़ी देर पहले कह रहे थे, कहीं लिखा है क्या कि जहाँ ट्रेन नहीं आएगी वहाँ एनाउंसमेंट नहीं कर सकते, अब कह रहे है पागल कुत्ते ने काटा है क्या।
अचानक फिर टिंग-टाँग का स्वर गूँज उठा और एनाउंसमेंट होने लगा- मुंबई से चलकर हावड़ा, झारसुगड़ा, त्रिवेंदम के रास्ते छपरा जाने वाली धारवाड़-गोरखपुर एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से अनिश्चितकालीन विलंब से चल रही है। यात्रियों से निवेदन है कि वे रेल प्रशासन का सहयोग करें। यात्रियों की सुविधा के लिए रेल विभाग दृढ़संकल्पित है। धन्यवाद। टिंग-टाँग।
मैंने पास की बैंच पर आड़े हो गए उसी टीसी को घूर कर देखा। टीसी कंधे उचकाता हुआ बोला- बोल तो रहे हैं, आत्मनिर्भर बनो, पैदल निकल लो। हमारी ट्रेन भी अब आत्मनिर्भर हो गईं हैं। या फिर एक काम करो, खुद ही ट्रेन बन जाओ। आत्‍मनिर्भर बनो, ट्रेन बनो, एक ही बात है।
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