शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

फर्ज़ी डिग्री के दम पर

//व्यंग्य -प्रमोद ताम्बट//

दुनिया के तमाम मुल्‍कों ने तमाम क्षेत्रों में तरक्‍की की है, हमने शिक्षा के क्षेत्र में झंडे गाड़े हैं। झंडे भी कोई ऐसे वैसे नहीं गाड़े, हमारे गाड़े झंडे दुनिया के किसी भी कोने से बड़ी आसानी से फरफराते नज़र आ सकते हैं, अगर बंद आँख से भी देखने की कोशिश की जाए। यहाँ तक कि ये झंडे धुर उत्‍तरी और दक्षिणी ध्रुवों से भी साफ-साफ दिखाई दे जाएँ, चाहे कितनी भी बर्फबारी हो रही हो।

अंग्रेजों के ज़माने में जब ‘लॉर्ड मैकाले’ ने भारतीय शिक्षा पद्धति को डिज़ाइन करने के लिए अपना सिर खपाया तब उसने ख्‍वाब में भी नहीं सोचा होगा कि कालान्‍तर में दुनिया भर की शिक्षा व्‍यवस्‍थाएँ उसकी डिजाइन की हुई भारतीय शिक्षा व्‍यवस्‍था से इस बुरी तरह पिछड़ जाएँगी कि कोई सपने में भी न सोच सके। बताइये भला, बिना किताबों का बोझ ढोए, बिना स्‍कूल-कॉलेज जाए, बिना पढ़े-लिखे, बिना परीक्षा दिए, बिना पास हुए, घर बैठे आदमी ग्रेजुएट-पोस्‍ट ग्रेजुएट, डाक्‍टर-इन्‍जीनियर की डिग्रियाँ हासिल कर ले, डाक्‍टरेट-वाक्‍टरेट भी कर मारे, इससे क्रांतिकारी उपलब्धि और क्‍या हो सकती है? दूसरा कोई बड़ा से बड़ा मुल्‍क हमारी इस अद्भुत उपलब्धि के आसपास भी नहीं फटक सकता।

एक बात तो सोलह आना सच है कि प्रिटिंग मशीन के अविष्‍कार ने दुनिया को बस मोटी-मोटी किताबों का बोझ ही दिया है जिस कारण टेढ़ी कमर वाले छात्रों की पीढ़ियाँ दर पीढ़ियाँ अस्तित्‍व में आती जा रही थी। मगर हमने उस प्रिटिंग मशीन पर फर्ज़ी डिग्रियों की बल्‍क छपाई करवाकर अपने छात्रों के सर पर उस बोझ का साया भी नहीं पड़ने दिया। फर्ज़ी डिग्रियों की छपाई के इस कौशल से हमने शिक्षा को तो स्‍तरीय बनाया ही बनाया है, छपाई की कला में भी हम इस कदर सिद्धहस्‍त हुए हैं कि एक बार असली डिग्री को आसानी से नकली डिग्री साबित किया जा सकता है परन्‍तु हमारी छापी गई नकली डिग्री को नकली डिग्री साबित करने में बड़े-बड़े विशेषज्ञों को भी नाकों चने चबाना पड़ जाता है। अब यही देखिए, हाल ही में कुछ बावले हमारे प्रिय प्रधानमंत्री की डिग्रियों को नकली साबित करने पर तुले हुए थे लेकिन शर्तिया यह पक्‍की बात है कि वे डिग्रियाँ शत-प्रतिशत असली हैं। असली हैं इसीलिए बावले उनमें दर्जनों मीनमेख निकाल पा रहे थे, अगरचे वे नकली होतीं तो कोई माई का लाल उनमें रत्‍ती भर का भी मीनमेख नहीं निकाल पाता।   

किताबी कीड़ों का दुनिया भर में हमेशा आतंक रहा है। कम्‍बखत सारी डिग्रियाँ खुद ही हड़प लिया करते रहे हैं। न केवल डिग्रियाँ बल्कि आई.ए.एस, आई.पी.एस से लेकर चपरासी तक की नौकरी पर इन्‍हीं का कब्‍ज़ा रहता आया है। हमने देश को इस कलंक से मुक्ति दिला दी। हमने नकल संस्‍कृति के तूफानी विकास और विस्‍तार के साथ-साथ देश के कोटि-कोटि ‘नालायकों’ तक फर्ज़ी डिग्रियों की सप्‍लाई सुलभ करवाई ताकि वे भी सम्‍मानजनक नौकरियों में जाकर देश सेवा करें और गौरवान्वित महसूस कर सकें। कुछ प्रतिभाशाली लोगों ने तो इन्‍हीं फर्ज़ी डिग्रियों के प्रताप से देश की राजनीति का मान बढ़ाने में प्रचंड सफलता पाई है। जबकि असली डिग्री वाले लाखों उल्‍लू के पट्ठे छात्र दर-दर भटक रहे हैं। वे भी अगर अपनी असली डिग्री को आग के हवाले कर के नकली डिग्री जुगाड लेते तो अब तक तो न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच जाते।  

एक ज़माना था जब लोग फर्ज़ी शब्‍द से थर-थर कॉपते थे और चुपचाप शराफत के लिबास में लिपटे स्‍कूल-कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ में पढ़-पढ़ कर चश्‍में वालों का धंधा चमकाया करते थे। फर्ज़ी डिग्रियाँ दूर की कौड़ी होती थीं लिहाज़ा हाड़ तोड़ मेहनत और मशक्‍कत करके असली डिग्री की भीख सी माँगनी पड़ती थी। हमने परिस्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया। डिग्रियों को चना जोर गरम और मुँफली के ढेर की तरह गली-गली में बेचने के लिए पहुँचवा दिया । जिसको जो विषय पसंद हो, आओ, पैसा फैको, डिग्री तुलवाओ और चलते बनो।

हमारा दृढ़ संकल्‍प है कि भविष्‍य में हम अपनी सेवाओं का व्‍यापक विस्‍तार करेंगे। हमारे आदमी साथ में डिग्रियों का कैटलॉग लेकर घर-घर जाकर लोगों की पसन्‍द की‍ डिग्रियाँ बेचेंगे। ऑन लाइन खरीदारी की सुविधा भी हम शीघ्र ही चालू करने वाले हैं। आप समुचित ऑफलाइन-ऑनलाइन भुगतान कर अपनी मन पसन्‍द डिग्री, अपनी सुविधा के वर्ष और कॉलेज-यूनिवर्सिटी के हिसाब से हमारी साइट से सीधे डाउनलोड कर सकेंगे।

सचमुच, शिक्षा के क्षेत्र में यह एक युगान्‍तरकारी पड़ाव है। हमने कसम खाई है कि मैकाले की शिक्षा पद्धति के पारम्‍परिक ढाँचे को चूर-चूर करके एक नई रोशनी का मार्ग प्रशस्‍त करेंगे। दुनिया की किसी भी यूनिवर्सिटी के किसी भी कोर्स की फर्ज़ी डिग्रियों के दम पर हम अपने इस देश को दुनिया का सिरमोर बना कर ही दम लेंगे।                  

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शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

कोरोना के खिलाफ वायरोनार

// व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

         कोरोना वायरस के बढ़ते प्रभुत्व से चिंतित होकर परंंपरागत रूप से हमारे साथ खेल-कूद कर बड़े हुए वायरसों में गहरा असंतोष एवं आतंक का वातावरण उत्पन्न हो गया था । उन्होंने व्यांपक लॉकडाउन में भी किसी तरह एक-दूसरे से सम्‍पर्क साधकर एक छोटा सा 'वायरोनार' आयोजित कर लि‍या और उसकी तैयारियों में जुट गए । तैयारियों के बीच नाना मुद्दों के साथ एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर वायरसों के बीच जमकर सर फुटव्वल हुई । हुआ यह कि एक पक्ष इस वायरोनार का अध्यूक्ष/मुख्यअथिति कोरोना वायरस को ही बनाना चाहता था जिसके खिलाफ यह सारी मुहीम थी । जबकि दूसरा पक्ष दुश्मन के साथ किसी भी प्रकार का मेलजोल रखने के सख्त  खिलाफ था । बहरहाल अंत में 'डेंगू' वायरस को अध्यक्ष/ मुख्य अतिथि बनाने पर सहमति बनती पाई गई और मामला शांत हुआ ही था कि पुन: बेेेक्टेरिया प्रजाति को वायरोनार में आमंत्रित करने के मुद्दे भर गर्मा-गर्मी होने लगी । कुछ वायरस जातिवाद के घोर समर्थक थे अत: बेेक्टेेरिया को वायरोनार में आमंत्रित करना नहीं चाहते थे लेकिन बड़े-बूढ़े सेकूलर वायरसों के समझाने पर कि उन्हें नहीं बुलाया तो भीड़ कहाँ से इकट्ठी होगी, जातिवादी वायरस मान गए परंतु इस बात पर फिर  भी अड़े रहे कि अव्वल तो वह लोग अपना मुँह सिल कर बैठे रहेंगे और दूसरे, कार्यक्रम का नाम किसी भी कीमत पर ‘वायरोनार’ ही होगा, ‘वायरो-बेेक्टे़रियोनार’ अथवा ‘बेेक्टोम-वायरोनार’ जैसा कुछ भी नहीं किया जा सकेगा । 

ऐसे ही छोटे-मोटे विचार मतभेदों के साथ आखिरकार वायरोनार का दिन आ गया । सुबह से ही गहमा-गहमी शुरू हो गई । कुछ वायरस मुख्य अतिथी को लेने साफ पानी की तलाश में निकल गए । बमुश्किल साफ पानी मिला तो उसमें आराम फर्मा रहे 'डेंगू' महाशय नखरा दिखाने लगे । जब उन्हें कोरोना वायरस के सार्वभौमिक खतरों से आगाह किया गया तब उनकी आँखें चौड़ी हुई और वे बाहर निकले मगर फिर अपनी सवारी मच्छंर के बिना कहीं जाने को वे हरगिज तैयार नहीं थे । मच्छर कहीं- फिनिट पीकर पड़ा हुआ था । आखिरकार एक मख्खी से लिफ्ट लेकर डेंगू वायरस महोदय को अध्य़क्षता/मुख्यन आतिथ्य कराने के लिए उठाकर लाया गया । 

वायरोनार प्रारंभ हुआ । प्रस्ताावना रखते हुए संयोजक वायरस ने बोलना शुरू किया- प्रिय वायरसों और समर्थन में उपस्थित बेेक्टेरिया जनों, आप सब जानते ही हैं कि इस युग का सबसे बड़ा संकट कोराना वायरस कोविड-19 इस धरती पर दस्तक दे चुका है और बहुत तेजी से दुनियाभर को अपने चुंगल में लेने की तैयारी में है । लेकिन यह दुनिया किसी की बपौती नहीं है, यह हम सबकी साझा दुनिया है । इस दुनिया में वायरसों के बीच शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का सिंद्धात हमेशा से माना जाता रहा है । हम में से किसी ने भी कभी एक दूसरे के हितों स्वार्थों की अनदेखी नहीं की है । मगर,जुम्मा-जुम्मा चार दिनों पहले पैदा हुए इस कोरोना वायरस ने, वायरस प्रजाति की घोर उपेक्षा करते हुए एक सिरे से सारी दुनिया पर कब्जा  करना शुरू कर दिया है । हमसे फूटे मुँह बात तक करना ज़रूरी नहीं समझा इस आततायी ने । नीति-नैतिकता नाम की चीज़ नहीं रह गई है हमारे समाज में। दोस्तों, हम सबके अस्तित्व पर संकट के गहरे बादल मंडरा रहे हैं । हमारी पूछ-परख कम होती जा रही है । मनुष्य  लोग हमसे डरना बंद कर रहे हैं । केवल करोना से ही सबकी घिग्घीं बंध रही है । हमारा खौफ इतना कम हो गया है कि ड्रग कम्पनियों ने हमें मारने वाली दवाइयाँ, प्रिवेंटिव मेडिसिन्स  तक बनाना बंद कर दिया है । सब कोरोना की दवा ढूँढ़ने में लगे हुए हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो दुनिया में हमारा कोई नाम लेवा तक नहीं बचेगा। हर जगह बस कोरोना का रोना ही रह जाएगा । इन सब गंभीर बिन्दुओं पर चर्चा करने के लिए अत्यंत शार्ट नोटिस पर आज इस वायरोनार का आयोजन किया गया है । अध्यक्ष/ मुख्‍य अतिथि महोदय की अनुमति की प्रत्याशा में (चूँकि वे सो रहे थे) आप सबसे अनुरोध है कि इस विषय पर जो कोई वायरस बंधु प्रकाश डालना चाहता है कृपया मंच पर उपस्थित होने का कष्ट करें ।

मंच पर तो कोई आया नहीं, सारे वायरस अपने-अपने स्थान से ही चिल्ला -चोट करने लगे । सबसे पहले ‘इन्फ्लूपएंजा’ वायरस खड़ा हुआ और बोला- इस कोरोना के बच्चे पर तो कॉपी राइट उल्लघंन का केस दायर किया जाना चाहिए । ये कमीना हूबहू हमारी आक्रमण शैली और गुण लक्षणों को चुराकर हमले कर रहा है । इनका ही बड़ा तोपचंद था तो अपनी अलग शैली क्योंं विकसित नहीं कर ली इसने ? 

‘हंता’ वायरस भी इस बीच चिल्ला कर बोला- मेरी स्टाइल को भी चुराया है इसने। पल्मोसनरी सिस्टम पर अटैक पर मेरा कॉपी राइट था मैं छोडूंगा नहीं इस करोना को । 

‘एच.आई.व्हीम’ का वायरस खड़ा हुआ और बोलने लगा – आज तक दुनिया भर पर मेरा राज था । लोग चूमा-चाटी, मैथून क्रिया और सुई-इंजेक्शन लगवाने से पहले मुझसे बचने की फिक्र करते थे । मगर यह कोरोना का बच्चा, इसके कारण तो इंसान हवा, पानी, सब्जीे-भाजी हर चीज से डरने लगा है । मेरे मरीज को कम से कम दूसरा कोई व्‍यक्ति छूकर सांत्वाना तो दे सकता है, कोरोना के मरीज से तो लोग कोसों दूर भाग रहे। मरे बाप को फूँकने मरघट तक नहीं जा रहे।  मेरा टेरर तो रहा ही नहीं। मेरी तो इर्म्पोनटेंस ही दुनिया में खत्म होती जा रही है। 

‘सार्स’ का वायरस उठकर खड़ा हुआ और चिल्लाया-अरे मेरा तो भाई बताया जा रहा है इस कम्बख्त को। लेकिन देखिए मुझे कोई कंसल्ट नहीं, कोई सलाह–मशविरा नहीं । दो कौड़ी की इज्जत नहीं दे रहा मुझे। बस उठकर चल दिया दुनिया पर कब्जा करने। रोक लो इसे तुरंत नहीं तो ये इंसानी प्रजाति को तो खत्मा करेगा ही हमारे अस्तित्व‍ की भी वाट लगवा देगा ।आखिर इंसानों से ही तो हमारा भी अस्तित्व है भाई । इंसान ही नहीं रहेगा तो हम कहाँ जाएंगे? 

‘इबोला’ का वायरस रोने लगा और मंच पर चढ़ कर गिड़गिड़ाता सा बोला- जान बचा लो भाइयों। हम सब शांति से इंसानों के साथ रह रहे हैं, मगर अब इस कोरोना के चक्कर में रोज साबुन, सेनेटाइजेशन, फागिंग और न जाने क्या-क्या अत्याचार सहन करना पड़ रहे है। आप लोगों से हाथ जोड़ कर विनती है, बचा लो हमें, नहीं तो हम सब बेमौत मारे जाएंगे।

वायरसों ने जबरदस्त कोहराम मचाना शुरू कर दिया । नारेबाजी होने लगी – नहीं चलेगी, नहीं चलेगी – इंसानी मनमानी नहीं चलेगी। किसी ने समझाया, भाइयों फिलवक्त इंसान हमारा दुश्मन नहीं है। दुश्मंन है कोरोना। तब फिर परिवर्तित होकर नारे लगने लगे- नहीं चलेगी, नहीं चलेगी- कोविड की मनमानी नहीं चलेगी । कोरोना हाय-हाय कोरोना हाय-हाय इत्यादि-इत्यादि । 

संयोजक ने हो हल्ला बढ़ता देख अध्यक्ष/मुख्य अतिथि महोदय ‘डेंगू’ को जगाकर स्थिति सम्हालने का निवेदन किया। डेंगू वायरस अपने स्थान पर ही लुढ़का हुआ सा माइक पकड़ कर बोलने लगा- देखो भाइयों, धैर्य खोने का नहीं । हम भी कभी एक दूसरे के बाप थे, मगर आज नहीं है । इंसानों ने हमसे डरना छोड़कर हम पर विजय पा ली ।  ऐसे ही 'कोविड उन्नीस' कोई अमृत पीकर नहीं आया है । आज नहीं तो कल इंसान उसकी काट निकाल ही लेगा । फिर दौड़ा-दौड़ा कर मारेगा उसको। उस दिन उस कोरोना को एहसास होगा कि बिरादरी की अवहेलना करके अलग से अपनी सत्ता  कायम करना कितनी बड़ी मूर्खता है । मैं भी कोई कम था क्या ? अच्छे-अच्छे काॅँँपते थे डेंगू के नाम से । लेकिन अब पड़ा रहता हूँ घोंघे की तरह साफ पानी में । 

डेंगू वायरस का भाषण आगे बढ़ता इसके पहले ही वायरोनार स्थल धड़-धड़-धड़ हिलने लगा, जैसे हजारों घोड़े दौड़े चले आ रहे हों । चारों ओर धूल-आंधी उड़ने लगी । कोई चिल्लाया- अरे, कोविड-19, कोविड-19, कोरोना का आक्रमण हुआ है । चारों ओर भगदड़ मच गई । शोर-गुल के बीच अचानक माइक पर आवाज़ गूंजी- बिरादाराने कौम, वायरस प्रजाति की आन-बान-शान, दुनिया के मालिकों, आप सब माननीय वरिष्ठों  को इस नाचीज़ कोराना वायरस कोविड-19 का सलाम । फालतू की हरकतें करने की ज़रूरत नहीं है। मैं आ गया हूँ और मेरी फौज ने पूरे वायरोनार पर कब्जां कर रखा है । किसी ने भी हिलने-डुलने की जुर्रत की तो भगवान कसम यहीं उसका किरियाकरम करवा दिया जाएगा । तुम लोगों की यह हिम्मत जो तुम लोग मुझे बताए बगैर यह वायरोनार कर रहे हो ? मेरा बहिष्कार कर रहे हो ? मेरे खिलाफ षड़यंत्र कर रहे हो ? कान खोलकर सुन लो तुम सब, होगे तुम पुराने, सीनियर और सम्मानित, प्रतिष्ठित टाइप के वायरस, यह मेरा जमाना है। कोविड-19 कोरोना वायरस का ज़माना। मैं अपनी स्टाइल से वायरस कुल को आगे ले जाऊॅगा। दुनिया फतह करूंगा। साथ दो तब भी और न दो तब भी इस काम में मुझे आप सबका साथ चाहिए। दुश्मनी नहीं करना है मुझे आप सबसे । मेरा सिद्धांत है सबका साथ सबका विकास। मेरी छत्रछाया में चुपचाप पड़े रहो। देखो, इंसान आज तक तो हम कोराना वायरसों का कुछ बिगाड़ नहीं पाया, न ही बिगाड़ पाएगा । हम इस दुनिया पर एकछत्र राज करने के लिए पैदा हुए है और इसी ध्येय से आगे बढ़ रहे हैं । हमें कोई रोक नहीं सकता। अरे जब इंसान नहीं रोक सकता, तो तुम दो कौड़ी के टुच्चे वायरस मुझे क्या रोकोगे? बेहतरी इसी में है कि मेरा साथ दो । हम सब मिलकर इंसानों की इस दुनिया को फतह करेंगे । 

तभी किसी ने नारा लगाया- लॉग लिव लॉग लिव- कोरोना वायरस लॉग लिव। कोरोना वायरस जिंदाबाद- जिंदाबाद जिंदाबाद ।

पहले तो सारे वायरस एक दूसरे का मुँह ताकते रहे, परंतु जब वायरोनार के  अध्यक्ष/ मुख्य  अतिथि डेंगू वायरस ने मंच पर कोरोना वायरस के सुर में सुर मिलाकर प्रचंड नारा लगाया- हमारा नेता कैसा हो, तो पूरा वायरोनार स्थल गॅूज उठा, कोरोना वायरस जैसा हो । 

बाहर नगर निगम की गाड़ी सेनेटाइजर की फुहार छोड़ कर क्षेत्र को सेनेटाइज कर रही थी । उस पर गाना बजा रहा था – हम सबने ठाना है, कोरोना को हराना है । गाड़ी से निकली एक प्रचंड फुहार ने वायरोनार स्थल को तरबतर कर दिया । सारे वायरसों में वह भगदड़ मची की पूछो मत । 

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शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

पॉजीटिव बने रहना है

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

          पॉजीटिव होना भी क्‍या ग़जब की बात है। घबराइये नहीं, मैं कोरोना पॉजीटिव होने की बात नहीं कर रहा। मैं तो जीवन की हज़ारों निगेटिविटियों के बीच रहते हुए भी घोर पॉजीटिव बने रहने की अद्भुत अतिमानवीय क्षमता की बात कर रहा हूँ। यह वैसा ही है जैसे किटाणुओं-जिवाणुओं सॉप-सपोलों और दूसरे खतरनाक जलचरों से भरे कीचड़युक्‍त तालाब में कमल का बेशर्मी और निरपेक्ष भाव से खिले, मुस्‍कुराते रहना। 

          कोरोना की बात चली है तो उसी से शुरू करते हैं। संक्रमितों की संख्‍या अठारह लाख से ज्‍़यादा हो चुकी है परन्‍तु निज़ाम के चेहरों पर अब भी अद्भुत पॉजिटिविटी है। दुनिया के मुकाबले हम बहुत ही कम संक्रमित हैं। खुशी की बात है। मौतों में भी हमने यह अनुपात सफलतापूर्वक कायम रखा है। निराश नहीं होने का। खुश रहने का। चाहे आधी आबादी चपेट में आ जाए लेकिन हमें बाकी आधी बचने वाली आबादी के लिए खुश रहना है। पॉजीटिव रहना है। बाकी कुछ करें न करें, पॉजीटिव रह लिए तो समझो बहुत कुछ कर लिया।

          महंगाई कमर तोड़ रही है। वह हाँथ-पैर भी तोड़ दे तब भी निराश नहीं होना है। पॉजीटिव रहना है। अमेरीका और योरोप की मंडियों में जाकर देखों ज़रा, कितनी महंगाई है। हम तो बहुत अच्‍छे हैं। फालतू हंगामा करने की क्‍या ज़रूरत है। पॉजीटिव रहो। पॉजीटिव रह कर महंगाई का सामना करोगे तो महंगाई, महंगाई नहीं रह जाएगी, फूलों का हार हो जाएगी। खुशी से गले में टांगे घूमते रहो। 

          बेरोज़गारी बेइंतहा बढ़ती जा रही है। सारे रिकार्ड टूट रहे हैं। टूटने दो, तुम पॉजीटिव होकर रिकार्ड का टूटना देखो। राजनीति में कार्यकर्ता कहाँ से आएगा? बेरोज़गारी के टूटे रिकार्ड ही से तो आएगा। बेरोज़गार हमारे दल में आएगा, नारा लगाएगा, जय-जयकार करेगा, जुलूस निकालेगा, तोड़फोड़ करेगा, धरना देगा, मस्जि़द तोड़ेगा, मंदिर बनाएगा, सत्‍ता दिलाएगा, कितनी पॉजीटिव ऊर्जा का संचार होगा। बेरोज़गार को रोज़गार दे दोगे तो क्‍या घंटा राजनीति करोगे।

          अर्थव्‍यवस्‍था संकट में है, अर्थव्‍यवस्‍था बीमार है, अर्थव्‍यवस्‍था चरमरा रही है, अर्थव्‍यवस्‍था बरबाद हो रही है, अर्थव्‍यवस्‍था गड्ढे में जा रही है, अर्थव्‍यवस्‍था जर्जर हो रही है, अर्थव्‍यवस्‍था पंगु हो रही है, अर्थव्‍यवस्‍था चौपट हो रही है, अर्थव्‍यवस्‍था तबाह हो रही है, अर्थव्‍यवस्‍था नेस्‍तोनाबूद हो रही है आदि आदि आदि। चुप रह न कम्‍बख्‍़त, कितनी निगेटिविटी भरी है तुझमें। पॉजीटिव पॉजीटिव बोल न यार। अर्थव्‍यवस्‍था बहुत अच्‍छा कर रही है। देखता नहीं एंटिलिया में मुनाफा आया है। पाँच ट्रिलियन इकॉनामी की ओर देख मूर्ख, फुल पॉजीटिव रह।

          पॉजीटिव रहना स्‍वास्‍थ के लिए लाभदायक है। दवाई न होगी, अस्‍पताल न होगा, डॉक्‍टर न होगा, दाल-रोटी न होगी, शिक्षा न होगी, रोज़गार न होगा, सुख-सुविधा, व्‍यवस्‍था कुछ भी न होगा तब भी प्‍यारे तू एक बारगी जी जाएगा, लेकिन अगर पॉजीटिविटी न हुई तो तू मर जाएगा बावले। न मरा तो कोरोना तूझे मार देगा। कोरोना नहीं तो हम कौन तुझे जीने देने वाले हैं।    

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गुरुवार, 6 अगस्त 2020

एक अधूरी साहित्य साधना


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
मैंने अक्सर देखा है कि जैसे ही साहित्य सृजन का मूढ़ मेरे अन्दर धनीभूत होता है, कोई न कोई आकर उसमें व्यवधान खड़ा कर देता है। उन्हें ज़रा भी इस बात का अन्दाज़ा नहीं होता कि उनके इस कुकृत्य से साहित्य का कितना भारी नुकसान होगा। साहित्य का गोदाम एक ऐसे महान साहित्यकार के कालजयी साहित्य से वंचित रह जाएगा जिसे साहित्य के क्षेत्र में शून्य योगदान का गौरव हासिल है।
अल्लसुबह जब मैं ताज़ा साहित्य लेखन के लिए नोट्स बनाने के लिए बैठा तो देखा फाइल पैड में सम्हाल कर रखे गए दो-तीन कोरे कागज़ों पर पड़ोसी का बच्चा, एबसर्ड शैली में चिड़िया-कौवे, कुत्ता-बिल्ली की आकृतियाँ उकेर गया था। उसे मेरे साहित्यकार बनने से पहले चित्रकार बनने की जल्दी थी। मजबूरन उपयोग किये गए कागज़ों के पीछे कोरे रह गए स्थान पर लिखकर साहित्य की लाज रखने के ख्याल से मैंने, बंद पडे़ चालीस-पचास बॉल पाइंट पेनों में से चल सकने वाले उस महान पैन की तलाश शुरू की जिससे इतिहास रचा जाने वाला था। पता चला कि पड़ोसी का बच्चा यह काम पहले ही कर चुका है। साहित्य साधना में दो बार आए इस नन्हें व्यवधान से गुस्सा तो बहुत आया मगर सोचा- चलो कोई बात नहीं, बच्चा है। उसे अभी उसकी की गई ऐतिहासिक गलती का बिल्कुल भी एहसास नहीं है, इसलिए उस पर नज़ला उतारने की बजाय मैंने पेन्सिल से साहित्य सृजन करने का निर्णय लेकर बरामदे में कुर्सी पर आसन जमा लिया।
अभी पहला शब्द दिमाग में आया ही था कि दरवाजे़ की घंटी बज उठी। घंटी की आवाज़ सुनते ही शब्द वापस वहीं चला गया जहाँ से आया था। उठकर दरवाज़ा खोला तो देखा सामने काम वाली बाई खड़ी थी। मैं झुंझला उठा, बोला- रात को सोती नहीं हो क्या जो इतनी सुबह-सुबह मुँह उठाकर चली आती हो? वह भी उत्तर फेंक कर मारने के लिए तैयार थी, चट से बोली-अपना कागज़ काला करो ना साब, कायको मेरे मुँह लग रहे हो?
मैं वापस अपनी जगह पर आकर बैठा ही था कि वह अन्दर से झाडू़ उठा लाई और बोली-चलो हटो यहाँ से। मैं अपने कागज़-पत्तर लेकर दूसरे कमरे में चला गया और बैठकर उस चले गए शब्द के वापस आने का इंतज़ार करने लगा। शब्द तो वापस नहीं आया लेकिन वह बाई बरामदा निबटाकर उस कमरे में भी चली आई जहाँ मैं बैठा था, और फिर बोली- चलो उठो। इस तरह यह साहित्य साधक इस कमरे से उस कमरे, उस कमरे से इस कमरे भटकता रहा और वह बाई मेरे पीछे-पीछे झाडू़-पोछा लिए घूमती मेरी साहित्य साधना में पलीता लगाती रही।
जैसे-तैसे वह गई और मैं फिर कागज़ पेन्सिल लिए बैठकर शब्दों का आव्हान करने लगा। पहला, दूसरा, तीसरा शब्द आया और चौथे शब्द पर फिर घंटी बज गई। मैंने पेन्सिल पटकी और दरवाज़ा खोला। सामने दूध वाला था। उसके हाथ से दूध के पैकेट लेकर मैंने फ्रिज़ में रखे और वापस बरामदे में आया तो देखा दूध वाला कम्बख़्त मेरे साहित्य साधना के सिंहासन पर जमा बैठा हुआ था। मैंने प्रश्‍नवाचक नज़रों से उसे घूरा तो वह अकड़ते हुए बोला- पैसे ! मेरा दिमाग फिर खराब हो गया। मुझे साहित्य साधना अधर में ही छोड़कर अब इस मनहूस के लिए पैसे ढूँढ़ने पड़ेंगे। घर में पैसे नहीं है यह छोटी सी बात दूध वाले को सीधे समझा देने की बजाय मैंने उसे गुस्‍से से डपट दिया- सुबह-सुबह पैसे माँगने क्यों चले आते हो? आजकल कोई घर में पैसे रखता है क्या? स्वेपिंग मशीन ले लो एक, एटीएम से पेमेंट कर दिया करेंगे। या फिर पेटीएम गूगल पे वगैरह पर अपना एकाउंट रखो, ऑनलाइन पेमेंट कर दिया करेंगे।
दूधवाला भी शायद घरवाली से लड़कर आया था, बोला-पैसे नहीं है तो ऐसा बोलो न, भाषण काहे दे रहे हो सुबह-सुबह? कल सुबह पैसा तैयार रखना, वर्ना कारड नहीं बनेगा। इस तरह एक दूधवाला भविष्य के एक कालजयी साहित्यकार की बेइज्ज़ती करके चला गया। मैं थोड़ी देर मुँह टापता सोचता रहा कि अच्‍छा हुआ मैं भाषणवीर नहीं बना, और फिर से अपने शब्द संधान में लग गया।
पेंन्सिल कागज़ को स्पर्श करने ही वाली थी कि बाहर सड़क पर कचरा बटोरने वाली गाड़ी अपने लाउडस्पीकर की कर्कश आवाज़ के साथ आ खड़ी हुई। इसकी यह संगीत सभा रोज़ सुबह बिलानागा होती है। 10-15 मिनट तक बारी-बारी से कोरोना और साफ-सफाई से संबंधित कोरस गान सुना-सुना कर वह मेरे साहित्य चिन्तन पर वज्रपात सा करती रही। मैं किंकर्त्वविमूढ सा वह वृंदगान सुनता रहा। मोहल्ले से कचरा बटोर कर फिर वह आसपास के मोहल्लों में घूमती रही और उसकी प्रात:कालीन संगीत सभा मेरे घर तक स्पष्टतः सुनाई देती रही। फिर तो एक घंटे तक बस कोरोना और कचरे के गीतों में ठसे सरकारी शब्द ही लौट-लौट कर दिमाग में आते रहे। मेरे अपने शब्द पता नहीं कहाँ फना हो चुके थे।
इससे पहले कि मैं फिर से साहित्य साधना में लीन हो पाता कि फिर से दरवाज़े की घंटी बजी। दरवाज़ा खोलकर देखा एक क्यूट सा बालक भगवा वस्त्र धारण किये हुए सामने मुस्कराता खड़ा है। उसने एक परचा मेरे हाथ में पकड़ा दिया और बोला-बच्चा, प्रभु राम के दरबार में अखंड रामायण का पाठ शुरू होने वाला है। अवश्‍य उपस्थित होवें। वह गया कि कुछ ही देर में सामने मंदिर के लाउड स्पीकर से बेसुरी-बेताली आवाज़ों में भक्ति रस की धारा बह निकली। मैंने अपने कागज़ और पेन्सिल को एक कोने में पटकते हुए साहित्य साधना चौबीस घंटों के लिए स्थगित कर दी। हिन्दी साहित्य मेरे अमूल्य योगदान से हमेश के लिए चौबीस घंटे पीछे रह गया।           
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सोमवार, 27 जुलाई 2020

लैंडलाइन में कोरोना वार्तालाप

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
          महानगर की एक खूबसूरत कोरोना पॉजीटिव दोशीज़ा ने किसी दूसरे शहर में अपने रिश्ते दार को लैंडलाइन फोन से सम्पर्क किया तो उसके अन्दर बैठा हुआ कोरोना वायरस खुशी से झूम उठा। उसे भी अपने रिश्ते्दार से बातचीत करने का मौका मिल गया, क्योंकि उधर फोन उठाने वाला आदमी खुद भी करोना पॉजीटिव होने का सिग्नल दे रहा था। सिग्नल से सिग्नल मिला और इधर वाले ने उधर वाले से चहकते हुए पूछा - क्यों बंधु, क्या चल रहा है।
          उधर वाला लापरवाही से बोला- और क्या, फॉग चल रहा है। हो कौन तुम?
          इधर वाला हँसता हुआ बोला – फॉग? टीवी बहुत देखते हो लगता है। अरे मैं तुम्हारा जाति भाई बोल रहा हूँ कोविड-19।
          उधर वाला प्रसन्न हो गया, बोला -अच्छा भैया तुम हो। क्या करें भैया ये साला बुढढा घर से निकलता ही नहीं, दिन-रात टीवी के सामने जमा बैठा रहता है। मैं भी मजबूरी में इसके आँख कान नाक में से झाँक-झाँक कर टीवी देखता रहता हूँ। वैसे बताएँ भैया, अभी टीवी के विज्ञापन वाला फॉग नहीं था, मुंसीपाल्टी वालों का दिखावे का फॉग था घर के बाहर। फालतू धुँआ छोड़ते रहते हैं कम्बख्त। उनके धुँए से मामूली अनलोडेड मच्छर तो मरता नहीं, हम तो सम्पूर्ण वायरस प्रजाति के बाप कोरोना वायरस हैं, कैसे मरेंगे भला? वैसे कहाँ से हो आप भैया?
          इधर वाला ठसक के साथ बोला-चीन से, एकदम ओरीजनल। फिलहाल मुम्बई में पड़े हुए हैं।
उधर वाले को लगा कि उसे कोई इंफीरियरिटी काम्प्लेक्स दिया जा रहा है। वह भी दम-दाटी के साथ बोला- हैं तो हम भी चीन ही से, ग्लोबलाईजेशन के कारण ईरान, दुबई घूमते-घामते यहाँ झूमरीतलैया में आ पहुँचे। अब यहाँ से आगे किस्मत में कहीं जाना लिखा लगता नहीं है। 
          इधर वाला थोड़ा डपटियाता हुआ बोला- क्यों बे, एक ही जगह जम कर बैठ जाओगे क्या? भूल गए अपनी परम्परा और संस्कृति? विश्व गुरू बनना है हमें विश्वगुरू। पूरी दुनिया पर राज करना है।
          उधर वाला बोला-भैया में तो अपना काम ईमानदारी से कर रहा हूँ। इस बुढ्ढे पर से होते हुए इसके सारे परिवार को चपेट में लेने ही वाला था कि यह बुढढा खाँसने लगा। सब के सब इसे अकेला छोड़कर भाग गए। बस एक बरतन वाली और दूध वाले पर ही हमला कर पाया हूँ। अब वे दोनोंं कहाँ हैं पता नहीं। अपने कुल का विस्तार हो भी रहा है या नहीं, आई डोंट नो। अगर कहीं क्वारेन्टाइन हो गए हों तो मेरा तो बर्थ कंट्रोल शुरू समझो। यह बुढढा भी आखिरी साँसें ले रहा है। पता नहीं कब चटक जाए। आपकी क्या हिस्ट्री है भैया? बताओ न।
          इधर वाला लम्बी साँस लेते हुए बोला- अपन तो थेट चीन से है भाई। माँ तो अपनी होती नहीं, बाप वुहान से है। एक घटिया चीनी इलेक्ट्रानिक आयटम के व्यापारी की मूँछ पर सवार होकर अपन इंडिया आ गए। अब तक हवाई जहाज, लोकल ट्रेन, बस, ऑटो में सैकड़ों लोगों के ऊपर फुदकते हुए अब इस महानगर में एक खूबसूरत हीरोइनी के ऊपर बैठे हुए है आजकल। 
          उधर वाला जलन के एहसास को दबाता हुआ बोला- वाह भैया, आप तो बड़े मज़े में हो। बढिया इंपोर्टेड परफ्यूम पाउडर की खुशबू में डूब उतरा रहे हो। 
          इधर वाला मायूसी से बोला- नहीं रे, सारा स्टॉक खत्म कर दिया इस बन्दरिया ने। घर के बाहर क्वारेन्टाइन का बोर्ड लगा है तो बाहर जा नहीं पाती और ऑन लाइन वाले भी इधर फटकते नहीं। बस साबुन की खुशबू से ही काम चलाना पड़ रहा है, क्या करें। वो भी पता नहीं कपड़ा धोने के साबुन से नहा लेती है, क्या करती है, क्या पता। उल्टी सी आने लगती है। बहुत छुप-छुपा कर बैठना पड़ता है।
          उधर वाला बोला- अच्छा तो क्वारेन्टाइन का मज़ा ले रहे हो। खुशकिस्मत हो भैया आप। यहाँ तो ये बुढ्ढा पता नहीं क्या तो गोमूत्र वगैरा पीता रहता है। बदन पर गोबर नामक पदार्थ चुपड़ लेता है और दवा की तरह कभी-कभी खा भी लेता है गुनगने पानी से। रात-दिन घर में हवन करता रहता है ताकि हम सब धुए से खाँस-खाँस कर मर जाए। घर की सारी किताब-कॉपी हवन कुंड में जला मारी। मुझे पहले पता होता यह संकट तो कभी इस बुढढे की गली में झाँकता तक नहीं। 
          इधर वाला लम्बी आह भरता हुए बोला- यार सुखी तो इतने अपन भी नहीं। यह लड़की रात दिन सिगरेट पीती रहती है। दारू पीकर टुन्न हो जाती है। तुम्हें तो पता है दारू अपने लिए कितनी खतरनाक साबित हो सकती है। प्राण भी जा सकते हैं। जैसे ही वो पैग बनाती है मैं तो उसकी नाक में घुसकर बैठ जाता हूँ। 
          उधर वाला सहानुभूति प्रकट करता हुए बोला- सम्हल कर रहना भैया, ये लोग नाक से गोमूत्र तक पी जाते हैं, वो लड़की नाक से दारू न पी ले कभी।
          इधर वाला ठठाकर हँस पड़ा फिर बोला- और बताओ उधर अपने खिलाफ क्या-क्या षड़यंत्र चल रहे हैं?
          उधर वाला उदास सा बोला- काहे का षड़यंत्र\  लॉकडाउन उठा लिया है पब्लिक को खुला छोड़ दिया है। लोग लगे हुए हैं अपने मन से अपना इलाज करने में। कोई काढ़े पी रहा है तो कोई सेनेटाइज़र से हाथ धो-धोकर खाल उधड़वा रहा है। आयुर्वेद वालों की चांदी कट रही है। कोई अल्लाह के भरोसे है कोई भगवान के। मंदिर बनाने में लगे हैं। अस्पतालों की चिंता किसी को नहीं। उस पर तुर्रा यह कि मन्दिर बनते ही हमारी कोरोना प्रजाति का अस्तित्व नष्ट हो जाएगा।  
          इधर वाला बोला- चिन्ता मत करो भाई, मन्दिर-मस्जि़द से कुछ नहीं होने वाला। अपना कुल अजर-अमर हैं। अपन विश्व  विजेता बन कर रहेंगे। सब कुछ ठीक-ठाक रहा न तो अपन तीनों लोक, सकल ब्रम्हांड पर विजयश्री हासिल कर लेंगे। 
          उधर वाला जिज्ञासा से बोला- अपन कब विश्व विजेता बनेंगे भैया, मुझे अमेरिका जाना है। व्हाइट हाउस में घुसकर ट्रंप को मजा चखाना है। बहुत गरिया रहा है आजकल वो अपनी मातृ भूमि चीन को। 
          इधर वाला वायरस आशा एवं विश्वांस के मिले जुले स्वर में बोला- यदि हिन्दुस्तान की जनता ज्ञान-विज्ञान को ताक पर रख कर यूँ ही मूर्खतापूर्ण हरकतें करती रहीं तो अपन पूरे हिन्दुस्तान को लपेटते हुए दुनिया भर में घूम मचा देंगे। कोविड-19 से आगे बढ़ कर कोविड-20, कोविड-22, कोविड-25, कोविड-40, प्रगति करते चले जाएंगे।
          तभी टू टू टू टू की आवाज के साथ अचानक फोन कट गया। दोनों कोरोना वायरस बिल-बिलाकर रह गए। किसी तरल पदार्थ के ढाले जाने की आवाज के साथ इधर वाला कोरोना फुर्ती से हीरोइनी के मुँह से वापस नाक में घुस गया, क्योंकि हीरोइनी ने फिर से दारू का गिलास भर लिया था।

शनिवार, 18 जुलाई 2020

आवश्‍यकता है कहानीकार की


//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

पुलिस विभाग को कांट्रेक्ट बेसिस पर प्रखर कल्‍पनाशील कहानीकारों की आवश्‍यकता है जो कि उपलब्ध कराए गए मौका-ए-वारदात पर फौरन उपस्थित होकर विभागीय एनकाउन्टर्स, हवालात में मारपीट के बाद मृत्यु, दबिश, पब्लिक पर किये गए ज़ुल्‍मों इत्‍यादि पर शीघ्रातिशीघ्र एक प्रभावी और विश्‍वसनीय कहानी एवं चित्‍तलोचक पटकथा लिखकर प्रस्तुत करने में माहिर हो।
अभ्यर्थी का अनुभवी एवं लोकप्रिय कहानीकार होना अत्यंत आवश्‍यक है। कहानी विधा के साथ-साथ वकालत की पढ़ाई के असली प्रमाण-पत्र धारी ऐसे अभ्यर्थियों को चयन में प्राथमिकता दी जाएगी जो कूटरचित कहानी में कानूनी पहलू से पुलिस का पक्ष बेहद मजबूती से प्रस्तुत कर सकें, जिसमें बचाव पक्ष का वकील अथवा जज साहेबान और प्रेस-मीडिया के जासूस भी लूपहोल न ढूँढ़ सके।
अभ्यर्थी यदि कहानीकार के साथ-साथ मनोविज्ञान का विद्यार्थी भी रह चुका हो तो उसे प्राथमिकता दी जाएगी। ध्येय है आमजनता, प्रेस-मीडिया, प्रबुद्धजन, राजनीतिकों के मनोविज्ञान के हिसाब से कहानी में इन्सटंट मनोवैज्ञानिक प्रभाव उत्पन्न किये जा सकें और अच्छे-अच्छों की सिट्टी-पिट्टी गुम की जा सके।
अभ्यर्थी यदि युवा अवस्‍था में कर्नल रंजीत, सुरेन्‍द्र मोहन, ओमप्रकाश शर्मा के उपन्‍यासों का अध्येता रहा है एवं स्‍वयं अपराध कथाओं का लेखक एवं अपराध पत्रिकाओं में लेखन-सम्पादन का अनुभवी रहा हो तो उसे प्राथमिकता दी जाएगी। इससे अपराधियों की सम्पूर्ण आपराधिक पृष्ठभूमि के त्वरित अध्ययन एवं विष्लेषण पश्‍चात कहानी का आकल्‍पन सुनिश्चित होगा एवं विश्‍वसनीयता का फर्जी वातावरण निर्मित करने में सहायता होगी।
अभ्यर्थी यदि बी ग्रेड की हिट अपराध फिल्मों की कहानी एवं पटकथा लेखन से जुड़े रहने का अनुभव रखता है तो उसे प्राथमिकता दी जाएगी। पुलिस विभाग की कहानियों के घिसे-पिटे शिल्प और शैली से मुक्ति पाने के लिए कहानी में कहानी, ड्रामा, सस्‍पेंस के साथ-साथ थ्रिल भी होना आवश्‍यक है जिससे बच्चे भी पेश की गई कहानी के धुर्रे न उड़ा सकें एवं आँख बंद कर के उसे सच मान लें।
फोटोग्राफर जर्नलिस्‍टों को सर्वोच्‍च प्राथमिकता दी जावेगी, उन्‍हें कूटरचित कहानी की पुष्टि हेतु फोटो खींचकर प्रस्‍तुत करना होगा ।
ऐसे आदर्शवादी अभ्यर्थी जिन्हें यथार्थवादी लेखन का चस्का है अथवा जो नई-पुरानी कहानी के छूत रोग से ग्रस्त हो या जो उद्देश्‍यपरक साहित्यिक पत्रिकाओं, प्रगतिशील-जनवादी लघु पत्रिकाओं में लेखन कार्य करते हों, जिनकी कहानियाँ सच्‍चाई से साक्षात्‍कार कराने की फ़र्ज़ी क्रांतिकारिता से ग्रस्‍त हों या जो कहानीकार स्‍थानीय पुलिस थाने में संदिग्‍ध बुद्धिजीवी के तौर पर निगरानी शुदा  हों, उन्हें पुलिस कहानीकार के इस प्रतिष्‍ठापूर्ण पद हेतु आवेदन करने की ज़हमत उठाने की कतई आवश्‍यकता नहीं है।
महत्वपूर्ण सूचना - अभ्यर्थी अभी हाल ही में घटित दो अथवा तीन पुलिस एनकांउटरों में प्रचारित की गई कहानियों में की गई गंभीर त्रृटियों-खामियों के ऊपर अपना विस्तृत लेख तैयार कर प्रस्तुत करेंगे जिसके लिए उन्‍हें पृथक से नम्बर दिये जाएंगे। मेरिट में आने वाले अभ्‍यर्थियों को तत्‍काल पुलिस मुख्‍यालय में उपस्थित होकर अपनी ज्‍वाइनिंग देना होगी।   
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मंगलवार, 14 जुलाई 2020

कांग्रेस भ्रम फैलाती है


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
 कांग्रेस जब देखो तब भ्रम फैलाती है। वैसे कांग्रेस भ्रम की जगह कुछ और भी फैला सकती है मगर कांग्रेस को भी देखिए आजकल और कोई काम-धाम ही नहीं है, वो सिर्फ और सिर्फ भ्रम ही फैलाती रहती है। एक दिन तो मैं भारी चिंता में पड़ गया कि कांग्रेस अगर भ्रम न फैलाती तो फिर क्या फैलाती? बहुत चिंता करने के बाद यही निष्कर्ष निकला कि कांग्रेस अगर भ्रम न फैलाती तब भी भ्रम ही फैलाती।
कांग्रेस चाहे तो भ्रम के स्थान पर काफी कुछ फैला सकती है। जैसे उदाहरण के लिए वह मूर्खता फैला सकती है, वह धूर्तता फैला सकती है, यहाँ तक कि कांग्रेस घूर्तता भी फैला सकती है जिससे घूरने का काम आसानी से हो सके। लेकिन नहीं, कांग्रेस को पता नहीं किस पागल कुत्ते ने काट रखा है। मौका लगते ही वह बस भ्रम ही फैलाती है।
कितनी पुरानी है कांग्रेस, अपने लम्बे अुनभवों के दम पर वह चाहे तो साम्प्रदायिकता फैला सकती है, जातिवाद फैला सकती है, धार्मिक उन्माद फैला सकती है। लेकिन नहीं वह तो बस सिर्फ और सिर्फ भ्रम फैलाने पर ही तुली रहती है।
वैसे, भ्रम फैलाना अपने आप में एक लोकप्रिय कला है और कांग्रेस आज़ादी के बाद से ही यह कलाकारी दिखाती आ रही है। लेकिन कम से कम अब तो उसे यह भ्रम फैलाने की कलाकारी दिखाना बंद करके कुछ और फैलाना चालू कर देना चाहिए। परन्तु कांग्रेस है कि बिल्कुल मानती ही नहीं है रात-दिन बस भ्रम फैलाती रहती है। भ्रम फैला फैलाकर कांग्रेस ने पूरी धरती को पाट दिया है। यही नहीं बल्कि अब कांग्रेस आसमान को भी भ्रम से पाटने में लगी है। पता नहीं कांग्रेस को इस काम में ऐसा क्या मज़ा आता है कि और कुछ फैलाने की बजाए कांग्रेस बस भ्रम फैलाने में ही अपनी शान समझती है।
कांग्रेस को भ्रम फैलाना छोड़कर अब थोड़ा रायता भी फैलाना चाहिए। वैसे भी कांग्रेस के महत्वपूर्ण सिपाही लोग रायता फैलाने में बहुत माहिर होते ही है। अगर कांग्रेस से यदि रायता फैलाते नहीं बनता तो वह कढ़ी भी फैला सकती है। रायता और कढ़ी की फैलने की गति एवं विस्तार क्षमता भ्रम के फैलने की गति एवं विस्तार क्षमता से कई गुना अधिक होती है, यह एक वैज्ञानिक सत्‍य है, फिर भी पता नहीं क्यों कांग्रेस भ्रम फैलाने में ही ज़्यादा रुचि लेती है।
कभी-कभी मुझे भ्रम होता है कि जिसने भी कांग्रेस को बनाया भ्रम फैलाने के लिए ही बनाया है। देखिए न, आज़ादी के पहले उसने आज़ादी की लड़ाई का भ्रम फैलाया और अंग्रेज़ों से समझौता करके, सत्ता पर काबिज़ होकर, सत्तर सालों तक भ्रम फैलाती रही। और अब देखिए जब छः साल से सत्ता से महरूम हैं तब भी भ्रम फैलाती रहने से बाज नहीं आती। ऐसा लगता है इस कांग्रेस को न भ्रम फैलाने की कोई असाध्य बीमारी वगैरह है। बिना बात किसी भी मुद्दे पर बस भ्रम फैलाने बैठ जाती है।
अब देखिए, 2014 में कांग्रेस सत्ता में बने रहने के लिए तरह-तरह के खतरनाक भ्रम फैलाती रही। फिर 2019 में सत्ता में वापसी के लिए भ्रम फैलाने की कोशिश की और अब आगे 2024 में फिर से सत्ता हथियाने के लिए कांग्रेस भ्रम फैलने का षड़यंत्र करने को उतावली है। यही भ्रम फैलाने का प्रयास वह आगे 2029 में भी करेगी हम अच्छी तरह जानते हैं। लेकिन हमने भी कोई कच्ची गोलियाँ नहीं खेली हैं, भ्रम फैला-फैलाकर ही तो आज हम इस मुकाम पर पहुँचे हैं। हम आने वाले पचास-सौ सालों तक कांग्रेस के इन भ्रम फैलाने के प्रयासों को विफल करते रहेंगे, बाकी कुछ चाहे करे या न करें।
हमें लगता है, कांग्रेस ने जल्दी ही अगर अपना यह भ्रम फैलाने का राष्ट्रीय कार्यक्रम बंद नहीं किया तो फिर हमें भी कांग्रेस के इस भ्रम फैलाने के कार्यक्रम के खिलाफ भ्रम फैलाना शुरू करना पड़ेगा।
हम भ्रम फैलाने के लिए जगह-जगह थानों में कांग्रेस के खिलाफ एफ.आई.आर दर्ज कराने का भ्रम फैलाएंगे। हम विधानसभाओं में कांग्रेस की भ्रम फैलाने की राजनीति के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित करने का भ्रम फैलाएंगे। हम पार्लियामेंट में अध्यादेश लाने का भ्रम फैलाकर भ्रम फैलाने की भ्रामक कांग्रेसी राजनीति को गैर जमानती अपराध घोषित कर देंगे। फिर देखते हैं कांग्रेस किस मुँह से भ्रम फैलाने का दुष्टतापूर्ण और गैर कानूनी काम कर पाएगी।
लेकिन हम कांग्रेस  की रग-रग से वाकिफ हैं। हम जानते हैं कि इतने भर से कांग्रेस  भ्रम फैलाने की अपनी यह पुरानी आदत छोड़ने वाली नहीं है। फिर वह विदेशों में जाकर भ्रम फैलाने का अपना यह कुकृत्य अवश्‍य करेगी। इसलिए हमने कांग्रेस की विदेशों में भ्रम फैलाने की कोशिश के जवाब में न केवल भारतीय समुदाय को भ्रमित करने की ठान ली है बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हर राजनैतिक प्लेटफार्म पर भ्रम फैलाने की इस राजनैतिक साजिश का जवाब भ्रम फैलाने की कूटनीतिक पद्धति से दिया जा सके इसकी भी पूरी तैयारी कर रखी है।
कांग्रेस  को फिर कभी भी, कहीं भी, किसी भी प्लेटफार्म पर किसी भी स्तर पर, किसी भी तरह का भ्रम फैलाने नहीं दिया जाएगा। जो भी फैलाना है वह सिर्फ और सिर्फ हम फैलाएंगे। आमीन।
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