सोमवार, 17 अगस्त 2015

सड़क हैं तो गढ्ढे हैं


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
            विशेषज्ञता और शोध-अनुसंधान के मामले में हम चाहे कितने भी पिछड़े हुए हों, मगर ढाँचागत विकास में कोई माई का लाल हमारा सानी नहीं है। इन दिनों हमारी तकनीकी कुशाग्रता का जो नमूना हमारी ‘सड़कों’ पर नज़र आ रहा है, उसे देखकर दुनिया का कोई भी विकसित देश हमसे रश्क कर सकता है। हमारे लिए तो हमारे इंजीनियरों, ठेकेदारों का यह अद्भुत् ‘कौशल’ और ‘कृतित्व’ घर की मुर्गी के ‘कौशल’ और ‘कृतित्व’ की तरह है, मगर हमारी सड़कों की यह अनोखी ‘धज’ देखकर दुनिया भर के सड़क विशेषज्ञ और शोध अनुसंधानकर्ता अवश्‍य ही दाँतों तले अपनी उँगलियाँ चबा लेंगे।
      यह एक महान वैज्ञानिक चमत्कार है कि हमारी सड़कों पर कभी कोई हाथ में गैती-कुदाल लिये दिखाई नहीं देता, बावजूद इसके उनके सीने पर अलग ‘साइज़’ और ‘डिजाइनों’ के गढ्ढों की भरमार दिखाई देती है। यह एक विकट तकनीकी रहस्य है कि आखिर हम ऐसी अद्भुत ऊबड़-खाबड़ सड़कें बनाते कैसे हैं! कहाँ से हमारे हाथ यह गज़बनाक तकनीक लग गई है जिससे रातों-रात हमारी ताज़ातरीन नई-नवेली सड़कों पर ऐतिहासिक महत्व के दर्शनीय गढ्ढों का अविर्भाव हो जाता है, जिनमें दो-चार बार गिरे बगैर हम पर भारतीय नागरिक होने का ठप्पा लग ही नहीं सकता।
      विदेशों से घूमकर आने वाले भाग्यशाली लोग बताते हैं कि वहाँ की सड़कें कैसी चिकनी, चौड़ी-चकली और सपाट होती हैं। उन पर गाड़ी दौड़ाते हुए पेट का पानी तक नहीं हिलता। अर्थात दुनिया भर की खोजें करने वाले पश्चिमी वैज्ञानिक पेट का पानी हिलाने की मामूली तकनीक भी अब तक नहीं खोज पाए हैं। हमने भी शाणपंथी से अब तक अपनी वह स्वदेशी तकनीक किसी को नहीं दी है, जिससे हम सड़क में गढ्ढे और गढ्ढों में सड़क का परस्पर उलझा तानाबाना बुनते हैं। देखा जाए तो सड़क बनाने के पुराने फामूलों पर चल रहे तमाम विदेशी मुल्कों को यह गढ्ढा ज्ञान बेचने का सही समय अब आ गया है। गढ्ढों एवं गढ्ढेदार सड़कों के निर्माण की भारतीय टेक्‍नॉलॉजी का पेटेंट तुरंत करवाकर हमें उन मुल्कों से ‘बारगेनिंग’ शुरू कर देनी चाहिये जिन मुल्कों की जनता बिना हिचकोलों वाली सड़कों पर चल-चल कर अघा गई है। शीघ्रता की जाए, कहीं ऐसा ना हो कि हमारी इस अनोखी तकनीक का पेटेंट कोई और मुल्क करा ले और हम टापते रह जाएँ।
      सड़कों की दुर्दशा और उन पर कीचड़ और गंदगी से लबरेज़ गढ्ढों को देखकर हम लोग हमारे होनहार सड़क निर्माताओं, इंजीनियरों और ठेकेदारों के साथ गाली-गुफ्तार मारपीट तक करने पर उतारू हो जाते हैं, जबकि हमें चाहिए कि हम उनकी प्रतिभा को साष्टांग दण्डवत करें, जो न केवल हमें गढ्ढों में गिरने का सुखद अवसर प्रदान करते हैं बल्कि विदेशी पयर्टकों को आकर्षित कर देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी बढ़ाते हैं।
हमने समय रहते यदि हमारी इन राष्ट्रीय प्रतिभाओं को उचित मान-सम्‍मान नहीं दिया तो ये प्रतिभाएँ सुदूर विदेशों की ओर पलायन कर जाएँगी, और अपनी इस तकनीक से दूसरे मुल्कों की जनता के पेट का पानी हिलाएंगी। पलायन का नतीजा यह होगा कि विशेषज्ञों के अभाव में हम चिकनी-चुपड़ी सड़कें बनाने को मजबूर हो जाएंगे और उन्‍हीं सड़कों पर सर पटक-पटक कर मातम करते रह जाने के अलावा कुछ नहीं कर पाएंगे।
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सोमवार, 20 जुलाई 2015

स्‍मार्ट कबाड़ी की टेर

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//
स्मार्ट गजेट युग के स्मार्ट बच्चे इन दिनों अपने माँ-बाप को तिर्यक दृष्टि से तो दादा-दादी को खा जाने वाले दृष्टि से देख रहे हैं, क्योंकि टी.वी पर गा-गा कर उन्हें समझाया जा रहा है -‘‘नो चिपकोइंग, बेच दे बेच दे। पुराना जाएगा तब नया आएगा।’’ मगर मैयो-बाप हैं कि बीसियों साल पुराने टी.वी-फ्रिज से फेवीकॉल के जोड़ की तरह चिपके हुए हैं और दादा-दादी तो बाबा आदम के ज़माने के सामान को गले लगाए बैठे हैं, मानो साथ ले जाने की पूरी तैयारी हो।
स्मार्ट बच्चे चाहते हैं घर में मौजूद पुराना-धुराना सब कुछ बेच दिया जाए। उन्हें चाहिए नए ज़माने के डिज़ाइनर आयटम जो रोज़ाना दस-बीस की तादात में कंपनियों द्वारा मार्केट में उतारे जाते हैं और चित्त खेचू विज्ञापनों के ज़रिए उन्हें खरीदने के लिए लोगों को उकसाया जाता है।
दस-बीस साल तो बहुत ही लम्बी अवधि है, आजकल तो हफ्ते-पन्द्रह दिनों में ही खरीदी हुई चीज़ पुरानी हो जाती है। मुमकिन है एक दिन वो भी आए कि बंदा सुबह शोरूम से कुछ खरीदकर लाए और शाम होते तक उसे पुराना बताया जाकर बेच डालने के तकादे आने लगें। यही नहीं बल्कि आप शोरूम पर किसी लक्झरी आयटम का भुगतान करके पीछे मुड़ें तो बाहर बेचने-खरीदने वाली कंपनी भांगड़ा करती, गाती हुई मिले-‘‘पुराना हो गया, पुराना हो गया, बेच दे बेच दे।’’
क्या करें बेचारी लक्झरी सामान बनाने वाली कम्पनियाँ? बरसों तक घर-घर माल पहुँचा देने के बाद वह कारखाने में ताला डालकर तो बैठ सकती नहीं! रोज़ नए-नए हथकंडे अपनाकर अपना माल खपाना उनकी राष्ट्रीय मजबूरी है। किसी के घर में रोटी, कपड़ा, मकान, दवा-पानी हो न हो, टी.वी फ्रिज ज़रूर होना चाहिए। इसलिए पहले बैंकों, फायनेंस कम्पनियों से उधार दिलवा-दिलवाकर उन्होंने अपना माल ठिकाने लगाया, अब जब घर-घर में लक्झरी आयटमों के गोदाम बन गए हैं तो उसको ‘‘बेच दे बेच दे’’ की हाक लगाई जा रही है। पुराने कबाड़ को फटीचरों के घर में ट्रांसफर किया जाना जरूरी है, ताकि असल ग्राहक देवता के घर में नया सामान रखने के लिए जगह बनाई जा सके। फटीचर तो नया कभी खरीदेगा नहीं, और असल ग्राहक पुराने से चिपका रहेगा तो नया खरीदने कभी आएगा नहीं। हाँ एक बार उसने पुराना बेचने का प्रण कर लिया तो वह नया खरीदेगा ही खरीदेगा। तो, दरअसल राग ज़रूर ‘‘बेच दे बेच दे’’ का अलापा जा रहा है, उसका असल मतलब है-‘‘खरीद ले खरीद ले।’’    

कबाड़ियों का तबका देश में शताब्दियों से ‘‘बेच दो बेच दो’’ की गुहार लगाता घूम रहा है । वह घर-घर से पुराना कबाड़ बटोरकर नया कबाड़ खरीदने की वस्‍तुस्थिति निर्मित करता है। ऐसे ही टी.वी पर ‘‘बेच दे बेच दे’’ की पुकार लगाने वाली कंपनियाँ स्मार्ट कबाडियों की भूमिका निभाते हुए हर पुरानी चीज़ बेच डालने की लिए लोगों का भड़का रही हैं। हमारे बच्चे भी इन कम्पनियों के एजेंट से बनकर दिन-रात माँ-बाप प्राण खाते रहते हैं, ‘‘ये बेच दो, वो बेच दो।’’ मतलब यही है ‘‘ये खरीद लो, वो खरीद लो।’’ इन कंपनियों का बस चले तो वे इन स्मार्ट बच्चों के पुराने हो गए ‘माँ-बाप’ और ‘दादा-दादी’ को भी बेच डालने का प्लान ले आएँ। मगर मजबूरी यह है कि कोई बड़ी से बड़ी कंपनी भी नए-नवेले डिजाइनर ‘माँ-बाप’ और ‘दादा-दादी’ नहीं बनाती न!

गुरुवार, 18 जून 2015

मैया मैं तो मैगी ही खायो

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//


बन्‍नेखाँ का लड़का फन्‍नेखाँ सुबह से बस एक ही रट लगाए हंगामा मचाए हुए है – मैगी दे दो, मैगी दे दो। फ्‍न्‍ने की अम्‍मा उसे समझाने की कोशिश कर रही है- “मान जा बेटा मान जा, कुछ और खा ले, मैगी में जाने क्‍या ‘बला’ मिली है, मर जाएगा तू मेरे लाल।”

फन्‍ने सुनने को तैयार नहीं है, बस चिल्‍ला रहा है- “मैगी दे दो, मैगी दे दो।”

अम्‍मा ने फिर समझाने की कोशिश की- “बेटा क्‍यों अपनी जान का दुश्‍मन बन रहा है? सारे समझदार लोग कह रहे हैं न कि मैगी में ‘ज़हर’ मिला हुआ है, तो क्‍यों ज़िद कर रहा है?”

फन्‍नेखाँ हाथ नचाता हुआ बोला- “और तू जिद करती है कि- दूध पी ले, दूध पी ले, तब कुछ नहीं? तुझे पता नहीं दूध में क्या-क्‍या मिलाते पकड़े गए हैं लोग। कोई चूने और खड़िया से दूध बना रहा है तो कोई डिटर्जेंट मिला रहा है। तब नहीं तू कहती कि मर जाएगा?”

फन्‍ने की अम्‍मा बोली-“नहीं बेटा अपने यहाँ तो सरकारी अच्‍छा दूध आता है।”

फन्‍ने चिल्‍लाया- क्‍या खाक अच्‍छा दूध आता है! दूध-मावे की मिठाई खिलाती है न जो तू मसक के, उसमें न जाने क्‍या-क्‍या मिला होता है। क्‍यों खिलाती है बुला-बुलाकर? तब तुझे मेरी जान की परवाह नहीं होती।”

अम्‍मा बोली-“अरे बेटा खुशी में कभी-कभी नकली मावे की मिठाई भी खा लो तो कुछ नहीं होता। पर तू तो रोज सिर्फ मैगी खाता है, और कुछ खाता ही नहीं। मर जायेगा मेरे लाल, मर जाएगा तू।”

“अच्‍छा!  और ये जो तू नाहर मुँह उठकर ज़र्दे की फक्‍की मारती आ रही है बरसों से, वो ज़हर नहीं है। अब्‍बाखाँ रोज़ाना सैकड़ा भर गुटखा के पाउच चबा कर पेट में तो पेट में घर भर में गंदगी फैलाते रहते हैं, वो ज़हर नहीं है? मुझे नहीं मालूम, ज्‍़यादा बहाने मत बनाओं मुझे तो बस मैगी चाहिए अभी के अभी” फन्‍ने पैर पटकता हुआ बोला।

अम्‍मा को गुस्‍सा आ गया। वह डपट कर बोली-“चुप रहता है कि नहीं कम्‍बखत, बैठा है मैगी-मैगी की रट लगाए। पुलिस बुलवाकर बंद करवा दूँगी अभी तुझे।”

फन्‍नेखाँ का गुस्‍सा फूट पड़ा। वो चिल्‍लाने लगा- “मुझे पता है, अपन जो भी खाते हैं सब नकली और मिलावटी होता हैं। लाल मिर्च में ईंट मिली होती है, धनिया में लीद और हल्‍दी में पीली मिट्टी। खाने के तेल में मोबिल आइल मिला होता है, घी में चर्बी। सब्ज़ियों को इंजेक्‍शन लगा कर बड़ा करते हैं और फिर ज़हरीले रंगों से रंग कर बेचते हैं। फलों में सेकरीन का इंजेक्‍शन लगाते हैं। कोल्‍डड्रिंक में इतना एसिट होता है कि उससे पाखाने की सीट साफ कर लो। बीमार होकर डाक्‍टर को दिखाने जाओ तो बाज़ार में दवाइयाँ नकली मिलती हैं। सब कुछ अपन बड़े आराम से खा जाते हैं। तब तू नहीं कहती कि मर जाएगा तू! और मुझे क्‍यों पुलिस में बंद करवा रही है तू? मैगी ही तो माँग रहा हूँ, जान है मेरी वो। बिना माँगे तो तू रोज़ाना इतना ज़हर मुझे खिला देती है मुझे, जरा सी मैगी खिलाने में तेरा क्‍या जा रहा है अम्‍मा?”

अम्‍मा दीदे फाड़े अपने लाड़ले को देखती रही और‍ चुपचाप किचन में जाकर मैगी बनाने लगी। फन्‍नेखाँ तो फन्‍नेखाँ उनके बाप बन्‍नेखाँ ने भी डटकर मैगी खाई और जा बैठे टीवी पर मैगी मुहीम देखने।               

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बुधवार, 17 जून 2015

फर्जी डिग्री के दम पर


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
दुनिया के तमाम मुल्‍कों ने तमाम क्षेञों में तरक्‍की की है, हमने शिक्षा के क्षेञ में झंडे गाड़े हैं। अंग्रेजों के ज़माने में जब लॉर्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा पद्धति को बनाने के लिए अपना सिर खपाया तब उसने ख्‍याब में भी नहीं सोचा होगा कि कालान्‍तर में दुनिया भर की शिक्षा व्‍यवस्‍थाएँ उसकी बनाई भारतीय शिक्षा व्‍यवस्‍था से बुरी तरह पिछड़ जाएंगी। बताइये भला, बिना पढ़े-लिखे, बिना स्‍कूल-कॉलेज जाए आदमी ग्रेजुएट-पोस्‍ट ग्रेजुएट, डाक्‍टर-इन्‍जीनियर की डिग्रियाँ हासिल कर ले, इससे क्रांतिकारी उपलब्धि और क्‍या हो सकती है? दूसरा कोई बड़ा से बड़ा मुल्‍क हमारी इस अभिन्‍न उपलब्धि के आसपास भी नहीं फटक सकता।

प्रिटिंग प्रेस के अविष्‍कार ने दुनिया को बस मोटी-मोटी किताबों का बोझ दिया, मगर हमने उस पर फर्जी डिग्रियों की छपाई करवाकर अपने छाञों के सर पर उस बोझ का साया भी नहीं पड़ने दिया। फर्जी डिग्रियों की छपाई के इस कौशल से हमने शिक्षा को तो स्‍तरीय बनाया ही बनाया है, छपाई की कला में भी हम इस कदर सिद्धहस्‍त हुए हैं कि एक बार असली डिग्री को आसानी से नकली डिग्री साबित किया जा सकता है परन्‍तु नकली डिग्री को नकली डिग्री साबिल करने में विशेषज्ञों को भी नाको चने चबाना पड़ जाता है।

किताबी कीड़ों का दुनिया में हमेशा आतंक रहा है। कम्‍बखत सारी डिग्रियाँ खुद ही हड़प लिया करते रहे हैं। न केवल डिग्रियाँ बल्कि आई.ए.एस, आई.पी.एस से लेकर चपरासी तक की नौकरी पर इन्‍हीं का कब्‍ज़ा रहता आया है। हमने देश को इस कलंक से मुक्ति दिला दी। हमने नकल संस्‍कृति का तूफानी विकास और विस्‍तार कर देश के कोटि-कोटि ‘नालायकों’ तक डिग्रियों की सप्‍लाई सुलभ करवाई ताकि वे भी सम्‍मानजनक नौकरियों में जाकर देश सेवा करे और गौरवान्वित महसूस कर सकें। कुछ प्रतिभाशाली लोगों ने तो अपने पुरुषार्थ के दम पर देश की संसदीय राजनीति का मान बढ़ाने में सफलता पाई है। साधु-साधु।

एक ज़माना था लोग फर्जी शब्‍द से थर-थर कॉपते थे और चुपचाप शराफत के लिबास में लिपटे स्‍कूल-कॉलेज और यूनीवर्सिटीज़ में पढ़-पढ़ कर चश्‍में वालों का धंधा चमकाया करते थे। फर्जी डिग्रियाँ एक दूर की कौड़ी थी लिहाज़ा हाड़ तोड़ मेहनत और मशक्‍कत करके असली डिग्री की भीख सी माँगनी पड़ती थी। हमने परिस्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया। डिग्रियों को चना जोर गरम और मुँफली के ढेर की तरह गली-गली में बेचने के लिए पहुँचवा दिया । जिसको जो विषय पसन्‍द हो, आओ, पैसा फैको, डिग्री तुलवाओ और चलते बनो।

हमारा दृढ़ संकल्‍प है कि भविष्‍य में हम अपनी सेवाओं का व्‍यापक विस्‍तार करेंगे। हमारे आदमी साथ में डिग्रियों का कैटलॉग लेकर घर-घर जाकर लोगों की पसन्‍द की‍ डिग्रियाँ बेचेंगे। ऑन लाइन खरीदारी की सुविधा भी हम शीघ्र ही चालू करने वाले हैं। आप समुचित भुगतान कर अपनी मन पसन्‍द डिग्री, अपनी सुविधा के वर्ष और कॉलेज-यूनीवर्सिटी के हिसाब से हमारी साइट से सीधे डाउनलोड कर सकेंगे।

सचमुच, शिक्षा के क्षेञ में यह एक युगान्‍तरकारी पड़ाव है। हमने कसम खाई है कि देश में शिक्षा के पारम्‍परिक ढाँचे को नेस्‍तोनाबूद करके एक नई रोशनी का मार्ग प्रशस्‍त करेंगे। फर्जी डिग्रियों के दम पर हम अपने इस देश को दुनिया का सिरमोर बना कर ही दम लेंगे।                

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