बुधवार, 12 जून 2013

फिक्सिंग और सट्टा ‘जायज़’ हो



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
देश को इतने बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों के ज्ञान, अनुभव एवं सेवाओं का लाभ मिल रहा है परन्तु लगता है कि ‘अक्ल’ सबकी घास चरने गई है। दना-दन धन कूट कर अर्थव्यवस्था की सारी समस्याएँ एक झटके में दूर करने में सक्षम क्रिकेट-फिक्सिंग और सट्टे को जिस तरह कोढ़, खाज-खुजली और कैंसर की नज़र से देखा जा रहा है, मुझे तो नीति-नियंताओं की अदूरदर्शिता पर तरस आ रहा है।
क्रिकेट में फिक्सिंग को ‘दल्लेगिरी’ और ‘सट्टे’ जैसी पारम्परिक खेल विधा को सड़क छाप जुआ-सट्टा, तीन पत्ती-मटका इत्यादि घटिया और निकृष्ठ, गैर-कानूनी गतिविधियों के रूप में देखा जाना अत्यंत खेद एवं असम्मानजनक है। अपने पूर्वाग्रहों से हम सोने के अंडों से भरे गोदामों और भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की हिलोरें मारती असीम संभावनाओं को नज़रअन्दाज कर रहे हैं।
इसे इस तरह समझा जाए। सरकार पैसे की उगाही के लिए एक इन्फ्रास्ट्रचर बाँड जारी करती है, ‘करोड़’ रुपया विज्ञापन में खर्च करने के बाद मुश्किल से ‘लाख’ रुपया सरकारी खजाने में आ पाता है। इंकमटैक्स, सेल्सटैक्स, वैटटैक्स, ये टैक्स, वो टैक्स इत्यादि-इत्यादि थोप-थोपकर भी सरकार इतना धन इकट्ठा नहीं कर पाती कि चार घोटाले ढंग से हो सकें। टैक्स के बोझ से दबी जनता काऊ-काऊ कर जान खा जाती है, विपक्ष अलग प्राण पी लेता है। जबकि इधर क्रिकेट में, बीस ओवरों की एक सौ बीस गैंदों पर हर बार अरबों-खरबों का सट्टा खिलाकर देश के महान सटोरिए नगदी का पहाड़ खड़ा कर लेते है। नो बॉल, वाइड बॉल भी बोनस के रूप में धन लेकर आती है। जनता तो पागल है ही क्रिकेट के पीछे, सरकारी स्तर पर अंदरूनी इच्छाशक्ति को जाग्रत कर यदि टूर्नामेंटों, मैचों की झड़ी सी लगाकर फिक्सिंग और सट्टे को राष्ट्रीय खेल के तौर पर प्रमोट किया जाए तो फिर देखिए किस तरह दना-दन धन बरसता है। सरकारी खजाना खचाखच भर जाएगा, खुशहाली आ जाएगी, देश को और क्या चाहिए।
इसलिए, वक्त का तकाज़ा है, जैसे बहुत से धंधों को किया गया है, क्रिकेट में फिक्सिंग और सट्टे को भी अगर कानूनी शिकंजे से मुक्त कर अर्थव्यवस्था के विकास के नए फार्मूले के तौर पर अपनाया जाए तो हमारे देश को इन्वेस्टमेंट के लिए दुनिया के सामने भीख माँगने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
क्रिकेटर हमारे सोने का अंडा देने वाली वे मुर्गियाँ हैं जो मैदान में ‘इशारेबाज़ी’ करके अर्थव्यवस्था पर अकूत धनवर्षा करवा सकती हैं। इन्हें जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया जाएगा तो अर्थव्यवस्था के विकास का एक क्रांतिकारी रास्ता ही बंद हो जाएगा। सरकार को तो फौरन से पेश्तर अर्थव्यवस्था और देश हित में एक नया कानून बनाकर क्रिकेट में फिक्सिंग और सट्टे की कला को ‘जायज़’ करार दे देना चाहिए। कोई नई बात तो है नहीं, पहले ‘सूदखोरी’ भी जुर्म होती थी, मगर अब तो सरकारी बैंकें भी ‘सूद’ वसूलती हैं, क्योंकि वह कानूनन जायज़ है। इसी तरह फिक्सिंग और सट्टे को भी जायज़ बना दिया जाए तो देश गरीबी-बेरोज़गारी के दलदल से बाहर निकल सकता है।
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बुधवार, 5 जून 2013

ऐसे भी हो शादी के कार्ड

//व्यंग्य- प्रमोद ताम्बट//
सज-धज, आकार-प्रकार, रंग-रोगन, भार, क्षेत्रफल, लागत, एम.आर.पी., ग्राहक को टिपाने के मूल्य, शब्द संख्या और भाषा शैली के लिहाज़ से भारतीय विवाहों के निमन्त्रण-पत्रों में कई क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं, परन्तु विवाह से जुड़े अनेक अत्यावश्यक अ-वैवाहिक कार्यक्रमों एवं लोकाचारों के मद्देनज़र इन निमंत्रण-पत्रों को और भी ज़्यादा व्यापक किया जाना आवश्यक है।
जैसे, बारात प्रस्थान अथवा आगमन की सूचना के पूर्व दूल्हा-दुल्हन के ब्यूटीपार्लर जाने और आने का समय, दुल्हा-दुल्हन की ‘फेंसी-ड्रेसिंग’ एवं विशिष्ट ‘मेकओवर’ का समय इत्यादि भी निमन्त्रण-पत्र में उल्लेखित कर दिया जाए तो निमंत्रित लोग अपनी ‘ड्रेसिंग-मेकप’ का समय निर्धारित कर सकेंगे। होता यह है कि मेहमान तो तैयार होकर ‘भूखे-प्यासे’ सात बजे विवाह स्थल पर पहुँच जाते हैं मगर दूल्हा-दुल्हन रात दस बजे ‘ब्यूटीपार्लर’ से तशरीफ लाते हैं।
बारात प्रस्थान के पूर्व कितने बजे से कितने बजे तक ‘दारू’ पीने का समय होगा, कितने बजे से कितने बजे तक बारात सड़कों पर ‘भाँगड़ा’ करती रहेगी, बारातियों के जुलूस का निर्धारित ‘रूट’ क्‍या होगा, बारात कितने से कितने बजे तक सड़कों पर ‘ध्वनि’ एवं ‘वायू प्रदूषण’ करेगी, इसकी सूचना निमंत्रण पत्र में अग्रिम रूप से प्रकाशित कर दी जाए तो बारातियों के लिए काफी सुविधाजनक होगा।
दुल्हन के द्वार पर पहुँचने के बाद बारातियों का स्वागत ‘पान-पराग’ से किया जाएगा या ‘जूते-चप्पलों’ से यह स्पष्ट होना चाहिए। बारातियों का शराब पीकर लोट लगाने का समय, घरातियों-बारातियों की परस्पर गाली-गुफ्तार, झोंटा-झाँटी, उठापटक, वाकयुद्ध, लातयुद्ध एवं अस्त्र-शस्त्र युद्ध का निश्चित समय निमन्त्रण-पत्र में लिखा होना चाहिए और साथ ही साथ फुटनोट में यह भी मुद्रित किया जाना चाहिए कि लाठी-डंडे, तलवार, चाकू-छुरे, चैन-रॉड एवं हेलमेट इत्यादि की व्यवस्था बारातियों को स्वयं करना पड़ेगी या वर-वधू पक्ष यह सब ‘युद्ध सामग्री’ उपलब्ध कराएंगे।
निमन्त्रण-पत्र में स्पष्ट लिखा होना चाहिए-रात बारह बजे से एक बजे तक वर-वधू पक्ष के बीच ‘दहेज’ संबंधी मंत्रणाओं एवं शिखर सम्मेलनों के नए दौर होंगे, जिनमें नवीन परिस्थितियों व दूल्हें के नवीनतम बाज़ार भाव के अनुसार पुनरीक्षित माँग पत्र पर चर्चा, लात-घूसे इत्यादि कार्यक्रम होंगे। एक से दो बजे तक वर पक्ष नाटक-नौटंकी करेगा, उसके बाद उन्हें बारातियों समेत पीटा, खदेड़ा और दौड़ाया जाएगा। दो बजे से तीन बजे तक ‘थाना-पुलिस’ का समय होगा, उसके बाद यदि माहौल सौहार्दपूर्ण हो गया तो घराती-बाराती मेहमानों को ‘खाना’ दिया जाएगा और ‘भाँवरें’ पड़ेंगी। विदाई इत्यादि का कार्यक्रम तो निमंत्रण-पत्र में रहता ही है, थोड़ा और यथार्थ का पुट यदि निमन्त्रण-पत्र में डालना हो तो वर-वधु पक्ष ‘तलाक’ का दिन और समय भी निमन्त्रण-पत्र में अग्रिम तौर पर घोषित कर सकते हैं।
यह सब भारतीय विवाहों के साथ जुड़ी हुई महत्वपूर्ण परम्पराएँ हैं जो प्रत्येक विवाह में अनिवार्य रूप से निभाई जाती है। इसलिए, सारे कार्यक्रम पूर्व से ही समयबद्ध कर निमन्त्रण पत्र में प्रकाशित कर दिये जाएँ तो दोनों ही पक्षों के, ‘गिफ्ट’ और ‘लिफाफे’ लेकर मारे-मारे भटकने वाले मेहमानों के लिए काफी सुविधाजनक होगा।
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शनिवार, 11 मई 2013

यहाँ भी है छेड़छाड़

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
‘छेड़छाड़’ के मामलों पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कानूनों के बावजूद कोयला आवंटन घोटाले की रिपोर्ट से ‘छेडछाड़’ हो गई। ‘छेड़छाड’ भी सड़क छाप मजनुओं के हाथों नहीं बल्कि चोटी के अधिकारियों-मंत्रियों के कर-कमलों से। जो टुच्चाई अब तक गली-नुक्कड़ों और बाज़ारों में आवारा शोहदों द्वारा की जा रही थी, वह अब हाई प्रोफाइल लेवल से होने लगी है, क्या ज़माना आ गया है।

सारे देश की नज़रों के सामने ‘रिपोर्टों’ से ऐसी अहमकाना छेड़छाड़ की जाती रहीं तो इस देश में ‘रिपोर्टों’ का मान-सम्मान कैसे सुरक्षित रखा जा सकेगा। उनकी दशा भी देश की अबला नारियों की तरह होकर रह जाएगी जिसे चाहे जो, चाहे जहाँ छेड़ कर चलता बनता है।  

कुछ आदर्शवादियों का आरोप है कि ‘रिपोर्टें’ मजबूत फाइल-पैड, क्लाथिंग वाले लिफाफों में सुरक्षित होकर नहीं चलेंगी, फटे-टूटे, भौंडे-भड़काऊ लिबास में अंग प्रदर्शन करती फिरेंगी तो फिर ‘छेड़छाड़’ तो होगी ही। ‘रिपोर्टों’ को मर्यादा के आवरण में ‘लाख-चपड़ी’ से पैक होकर चाहरदिवारियों में दुबके रहना चाहिए। वे अगर यू ही यहाँ-वहाँ छुट्टी घूमती रहेंगी तो ‘छेड़छाड़’ तो क्या उनके साथ ‘बलात्कार’ भी हो सकता है। समय बहुत खराब चल रहा है, रिपोर्टों के माई-बाप, अभिभावकों को भी बेहद सावधानी एवं एहतियात बरतना चाहिए। कब कौन कहाँ से आकर उनकी प्यारी-दुलारी ‘रिपोर्ट’ का छेड़ जाए कोई भरोसा नहीं।

‘रिपोर्टों’ के साथ ‘छेड़ाछाड़ी’ की प्रथा तो हमारे देश में पुरानी है। छोटे बच्चे स्कूल के समय में ही एक्ज़ाम रिपोर्ट के साथ छेड़ाछाड़ी कर अपने आप को इस काम में दक्ष बना लेते हैं। कालान्तर में देश के बड़े-बड़े संस्थानों में बैठकर रिपोर्टों की व्यापक छेड़ाछाड़ी कर अपना और दूसरों का स्वार्थ साधते हैं। वैसे संसद में बैठकर की जाए या विधानसभा में सचिवालयों में बैठकर की जाए या डायरेक्टरेटों में, रिपोर्ट से छेड़छाड़ कहीं भी बैठकर की जाए छेड़छाड़ तब भी छेड़छाड़ ही रहेगी और इस घटिया हरकत पर सख्ती से अंकुश लगाने की ज़रूरत है। जब तक काननू पर्याप्त कड़े नहीं होते ये लुच्चे-लफंगे अपनी हरकतों से बाज आने वाले नहीं हैं। यू ही रिपोर्टों से छेडछाड़ करते रहेंगे।

इस मामले में पुलिस महकमें की भूमिका खासी महत्वपूर्ण है। यूँ तो पुलिस को देख कर अच्छे-अच्छे छेड़कों की हवा खिसकती है, मगर फिर भी यदि पुलिस विभाग ‘रिपोर्टों’ के हितों की रक्षा के लिए कमर कस ले तो फिर कोई अकेली देख ‘रिपोर्ट’ को छेड़ने की हिम्मत नहीं करेगा। मगर पुलिस का रवैया भी रिपोर्टों के प्रति यदि छेड़छाड़ करने वालों के समान ही असंवेदनशीलता भरा रहा तो बेचारी ‘रिपोर्ट’ के सामने आत्महत्या के अलावा दूसरा कोई चारा ही नही बचेगा।

यह तो महज़ एक ‘रिपोर्ट’ का मामला है जिसके साथ की गई छेड़छाड़ उजागर हो गई है। देश में अब तक कितने घोटालों की रिपोर्टें छेडी़-छाड़ी जाकर चलती कर दी गई होंगी कौन जानता है। रिपोर्टों से छेड़छाड़ के विरूद्ध आवाज़ उठाई जाना बेहद जरूरी है।

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गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

आईपीएल चालू आहे



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
आई. पी. एल. जिसके शताधिक फुलफार्म हैं, की ‘झंपिंग झपांग झंपक-झंपक’ जोर-शोर से चल रही है। जैसा की एक भद्र फिल्मी महिला ने टी.वी के माध्यम से कई दिनों तक इस अद्भुत बोलों वाले गीत के साथ यह महत्वपूर्ण संदेश जन-जन तक पहुँचाया कि शर्माने का नई, जेंटलमैन से मेंटलमैन बनने का, बहुत सारे लोग मेंटलमेन बनने लगे हैं। जैसे-जैसे यह मेंटलपना परवान चढ़ेगा, लोग कामकाज, नौकरी-धंधा पढ़ाई-लिखाई यहाँ तक कि खाना-पीना और शरीर की दूसरी अति महत्वपूर्ण जैविक क्रियाओं पर भी जबरिया रोक लगा कर बस ‘झंपिंग झपांग झंपक-झंपक, ढंपिंग ढपांग ढंपक-ढंपक’ में मशगूल हो जाएंगे। कोई मरे-जीए उनकी बला से।
जो लोग कभी जेंटलमन थे ही नहीं उनके लिए तो उस भद्र महिला की अपील बेमानी सी है, मगर इर्द-गिर्द मौजूद हज़ारों-लाखों मेंटलमेन आने वाले दो महीनों तक हम-आप जैसे सच्चे जेंटलमेनों का जीना हराम करने वाले हैं। सड़क चलते लोग आपको रोक-रोक कर पूछेंगे-क्या पोजीशन है ? आप पूछोगे-काहे की ? तो वे आपको ऐसी अजीब नज़रों से घूरेंगे जैसे आप अभी-अभी पागलखाने से छूट कर आ रहे हों। फिर आपको इस मामले में घोर अज्ञानी होने के जुर्म में एक झिड़की सी देते हुए कहा जाएगा-हद हो गई, उधर जंग छिड़ी हुई है और आपको खबर ही नहीं है! आप एक सेकंड के लिए हतप्रभ से हो जाओगे और सोचोगे कि अभी फिलहाल तो जंग जैसी कोई स्थिति है नहीं, पाकिस्तानियों ने ताज़ा कोई हरकत की ही नहीं है, ये कम्बख्त कौन सी जंग की पोजीशन पूछ रहा है! फिर खोजबीन करने पर आपको पता चलेगा कि किन्‍ही वारियरों और डेविलों नामक दो कट्टर दुश्मनों के बीच भिड़ंत है। आपको लगेगा शायद यह डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ. वाली मारामारी की बात हो रही है, मगर फिर वही व्यक्ति आपके ज्ञान में बढ़ोत्तरी करेगा कि भैया मैं ‘झंपिंग झपांग झंपक-झंपक’ अर्थात आई.पी.एल के मैच की बात कर रहा हूँ। और तब आपको ऐसा महसूस होगा जैसे आप बोर्ड की परीक्षा में फेल हो गए हों। 
एक ज़माना था क्रिकेट जेंटलमेन गेम हुआ करता था, मैदान में सिर्फ हाउज़दैट की आवाज भर सुनाई देतीं थी और दर्शक चिन्तनकारों की तरह गैलरियों में बैठकर चैके-छक्के पड़ने पर इस तरह होले-होले तालियाँ बजा दिया करते थे जैसे खिलाड़ियों पर एहसान कर रहे हों। खिलाड़ी घूमते-फिरते, खाते-पीते, टहलते हुए पाँच दिन का टेस्ट मैच निबटा लिया करते थे। मगर अब झंपिंग झपांग ढंपिंग ढपांग का ज़माना है। सीख दी जा रही है कि शराफत छोड़ो, कपड़े फाड़ पागलपन पर उतर आओ। घर-बार, नौकरी-चाकरी, स्कूल-कॉलेज, पढ़ाई-लिखाई छोड़कर मेंटलमैन बन जाओ। लिहाजा मैच में आठ-दस पागल किस्म की चीयरगर्ल्‍स का झुंड बिना थके नाच-नाचकर खिलाड़ियों व दर्शकों का मनोबल बढ़ाएगा, और उधर घर में बैठकर टी.वी. में घुसे पड़े तमाम लोग अपनी ‘झंपक-झंपक’ से अड़ौसियों-पड़ौसियों का मनोबल ध्वस्त करते रहेंगे। क्‍यों? अरे भई, आईपीएल जो चालू आहे।
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गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

गरीब सब कुछ खा गए है


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

               
        एक नए रहस्य का पर्दाफाश हुआ है। ‘गरीबों’ की पोल खुल गई है। एक तरह से कहा जाए ‘रंगे हाथों’ की तर्ज पर वे ‘रंगे पेट’ पकड़े गये हैं। पैसठ सालों से हम हैरान-परेशान थे कि आखिर कम्बख्त यह महँगाई बढ़ती क्यों है? राजनीतिज्ञों ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए, अर्थशास्त्रियों ने एक से एक भारी-भरकम सिद्धांत पेले, मगर असली चोर अब पकड़ में आया है। ये साले गरीब देश का सारा अन्न भकोस-भकोस कर महँगाई को हवा दे रहे हैं।

            कुछ दिन पहले मैंने बाज़ार जाने की हिम्मत की थी। आलू-प्याज और दूसरी तमाम सब्जियों के दाम आसमान पर थे। माजरा अब समझ में आया है। गरीब आसमान में बैठकर दना-दन सब्जियाँ, आलू-प्याज खा रहे थे। कुछ समय बाद दाम कुछ कम हुए, जरूर गरीबों को अमीरों पर रहम आ गया होगा और उन्होंने अपने खाने की तादात और गति पर लगाम लगा ली होगी। अंडा, मटन-मच्छी की दुकान पर जाने में तो मेरी आज भी रूह काँपती है, गरीब-गुरबे इस कदर नानवेज खा रहे हैं कि उसकी कीमत हमेशा सातवे आसमान पर ही रहती है। ये गरीब जरूर लोगों को पूरी तौर पर वेजीटेरियन बनाकर छोड़ेंगे।

  एक दिन मैं रेडीमेड कपड़ों की दुकान पर गया, पैंट-कमीज़ खरीदने, लेकिन कमीज़ के भाव सुनकर मुझे गश आते-आते रह गया इसलिए मैंने पैंट की कीमत तो पूछी ही नहीं। पूछता तो शायद हार्ट अटैक का सामना करना पड़ता। अब तक मेरी खोपड़ी में यह सवाल घूम रहा है कि आखिर एक अदद कमीज़ की कीमत उस दुकान के सेल्समेन की तनख्वाह से दो-गुनी कैसे हो सकती है। सेल्समेन की तनख्वाह देढ़ हज़ार और कमीज़ की कीमत तीन हज़ार थी। अब पता चला देश के गरीब ब्रांडेड पैंट-कमीजे़ं पहन-पहनकर उनके दाम बढ़ा रहे हैं।

                इन गरीबों ने देश में महँगाई ही नहीं बहुत कुछ बढ़ाया है। जैसे गुरबकों ने गरीबी ही बढ़ा मारी। वे देश वासियों की क्रय शक्ति ही खाकर बैठ गए हैं, गरीबी तो बढ़ना ही है। उन्होंने बेरोज़गारी बढ़ाई है, क्योंकि वे रोजगार की संभावनाएँ खाए बैठे हैं। उन्होंने जमाखोरी-कालाबाज़ारी बढ़ाई है, क्योंकि वे कायदा-कानून पचा कर बैठे हैं। और तो और उन्होंने भ्रष्टाचार बढ़ाया है क्योंकि वे रात-दिन देशवासियों की ईमानदारी की कमाई खाते रहते हैं। भूखे मरने की नौबत न आ जाए इसलिए लोग रिश्वत और कमीशन खाकर अपनी जान बचाते हैं। किसी को यह बात मालूम नहीं है, मैं बता दूँ कि ये गरीब देश के पूँजीपतियों, नेता मंत्रियों, अधिकारियों-कर्मचारियों और ईमानदारी से मेहनत करके, खून-पसीना बहाकर कमाई गई धन-दौलत को अत्यंत चाव से खाने के शौकीन न होते, तो कसम से देश में इतना भ्रष्टाचार कभी नहीं होता।
                जब से महँगाई बढ़ने के अत्यंत गोपनीय राज का पर्दाफाश हुआ है, मेरी बेचैनी बढ़ गई है। मेरी हार्दिक इच्छा है कि जितनी जल्दी हो सके मुझे उस कमीशन का चेयरमैन बना दिया जाए, जो इस मामले में कम से कम दस बोरी कागज़ खर्च करने की ज़रूरत से गठित किया जाएगा। मैं अपनी रिपोर्ट मैं इन गरीबों का सूपड़ा साफ करने के प्रभावी तौर-तरीकों पर अपने अमूल्य सुझाव दे दूँगा। मगर मुझे मालूम है ऐसा नहीं होने वाला, क्योंकि ये गरीब शिखर पर बैठे नीति-नियंताओं का सारा ज़मीर तक खाकर हज़म कर चुके हैं, इसलिए देश में भाई-भतीजावाद और बहन-भाँजावाद बहुत बढ़ गया है। गरीब सब कुछ खा गए हैं इसलिए देश में हर कुछ अब चरम पर पहुँच गया है।