शनिवार, 8 फ़रवरी 2025

मोक्ष के लिए मरना काफी है

 //व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

वे हैरान परेशान से रिजर्वेशन ऐप्स पर आ जा रहे थे, उन्होंने कई टिकट एजेंटों को भी फ़ोन लगा लिए कि उन्हें किसी तरह प्रयागराज का रिजर्वेशन मिल जाए तो कुंभ नहाँ लें और जीवन सफल हो जाए लेकिन रिजर्वेशन पाने में लगातार असफल रहने की मायूसी उनके चेहरे पर आसानी से देखी जा सकती थी। इस बीच उन्‍होंने सरकार को भी गालियाँ दे लीं कि उसकी लापरवाही की वजह से रेलवे रिजर्वेशन का ये हाल हुआ रखा है कि वह कभी आसानी से किसी को मिलता ही नहीं। मुझसे उनकी परेशानी देखी नहीं गई तो मैंने उनसे पूछा - क्या बात है, अभी इसी समय ही जाना क्यों ज़रूरी है कुंभ में? दो हफ़्ते बाद चले जाना।

वे बोले नहीं- अभी दो दिन बाद भगदड़ मचने का शुभ मुहूर्त है। तुमने सुना नहीं भगदड़ में कुचल कर मरने वालों को सीधे मोक्ष मिलता है। इसलिए मुझे तो किसी भी हालत में तुरंत कुंभ में पहुँचना है ।

मैंने कहाँ - मरने कि ऐसी ही जल्दी है तो फिर हवाई जहाज़ से चले जाओं। थोड़े पैसे ही तो ज्‍़यादा लगेंगे। आखिरी वक्‍त में भी अगर पैसे से मोह रखोगे तो फिर क्‍या फायदा ।  

वे बोले मरने की जल्‍दी नहीं, मोक्ष की चिंता है। फ्री-फंड में मोक्ष कहाँ मिलता है भाई आजकल। लेकिन समस्‍या ये है कि हवाई जहाज़ डायरेक्‍ट है नहीं । और जो घूम-फिर कर है भी उसके रेट आसमान छूने के बावजूद टिकट नहीं मिल रहा। सब मोक्ष की कामना से दौड़े पड़ रहे है प्रयागराज। हमें साली टिकट ही नहीं मिल रहीं।

मैंने कहाँ- जब मरने ही जाना है तो फिर रिजर्वेशन क्यों देख रहे हो। किसी भी गाड़ी के जनरल डिब्बे में घुस जाओ टॉयलेट के पास तो जगह मिल ही जाएगी। न हो तो किसी मालगाड़ी के डिब्‍बे पर लटक कर चले जाओ। बस-ट्रक कुछ तो मिल ही जाएगा टँग कर चले जाओ उसमें क्‍या।

वे बोले- तुम भी कमाल करते हो। जनरल बोगी में या मालगाड़ी बस-ट्रक पर लटक कर मरने से मोक्ष नहीं मिलता। कुंभ की भगदड़ में कुचलकर मरने से ही मोक्ष मिलता है। सुनी नहीं विद्वान संतों की बातें। तुम्हें कुछ पता-वता होता नहीं चले आते हो राय देने।

मैंने कहा- मोक्ष के लिए मरना ही काफ़ी है, कैसे भी मरो। बस कर्म तुम्हारे ठीक-ठाक होने चाहिए।

वे बोले- यही तो बात है। कर्म तो हमारे तुम जानते ही जो सब। सभी टाइप के पाप किए बैठे हैं अपन। मोक्ष मिलने की संभावना बिल्कुल भी नहीं है। इसीलिए इस कुंभ की भगदड़ में कुचल-मरने का शार्टकट अपनाने का मन बनाया है। भगवान ने साथ दिया तो कुछ न कुछ करके एसी फ़र्स्ट क्‍लास में नहीं तो सेकंड क्‍लास में तो टिकट मिल ही जाएगी। मोक्ष में तो फिर आनंद ही आनंद है।

मैंने पूछा - मोक्ष में क्‍या आनंद है बताइये न ज़रा।

वे बोले- पूछो मत। धरती से एकदम अलग होता है सब कुछ। कोई भागमभाग नहीं कोई दुख-दर्द नहीं। आनंद ही आनंद, सुख ही सुख। खाना-पीना और मस्‍त सोमरस का पान करते हुए सुंदर अप्‍सराओं को निहारना। देवताओं के साथ द्यूत क्रीडा का आनंद लेना। और भी बहुत कुछ होता होगा। अपने को पता नहीं है ज्‍़यादा कुछ। गए नहीं न कभी।

मैंने पूछा - द्यूत क्रीडा। यह तो जुआ हुआ। मोक्ष में जुआ ?

वे बोले - बेवकूफ हो तुम तो। द्यूत क्रीड़ा कोई पैसों से थोड़ी होती है। ऐसे ही टाइम पास के लिए होती है। पुण्‍यात्‍माओं का खेल है वो तो। वहाँ सभी खेलते हैं।

मैंने कहा - अरे यार, सोमरस, अप्‍सरा, द्यूत क्रीड़ा,  इन सबके लिए  भगदड़ में कुचलने जाना चाहते हो क्‍या? इससे तो यहीं किसी पब-डिस्‍कोथेक में जाकर सब कुछ कर लो कोई रोकता है क्‍या ? क्यों अपने प्राणों के दुश्‍मन बने हुए हो।

वे बोले - तुम बहुत ही भोले हो दोस्‍त। यहाँ यह सब करेंगे तो पैसे खर्च होंगे, वहाँ सब कुछ फ्री में है। बस कुंभ की भगदड़ में कुचल कर मर भर जाओ फिर बस आनंद ही आनंद है।   

मैंने उन्‍हें मोबाइल के साथ छोड़कर आगे बढ़ने में ही भलाई समझी। वे अब तक लगे हुए है भगदड़ के मुहूर्त के पहले का रिजर्वेशन तलाशने में।

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गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

भगदड़ से मोक्ष की ओर

 //व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्‍बट//

मोक्ष भारतीयों का जागते हुए देखा जाने वाला एकमात्र स्वप्न होता है । होश सम्‍हालते ही उसे अच्‍छी मौत मरने के लाभ के तौर पर मोक्ष का स्‍वप्‍न हाथ में थमा दिया जाता है जहाँ का जीवन अल्‍टीमेट टाइप का होता है । सो मोक्ष की आकांक्षा में आदमी अच्‍छी से अच्‍छी मौत मरना चाहता है। संतों ने मरने के स्‍थान काल के बारे में भी घोषणाएँ की हुई हैं जैसे गंगा की गोद में डूब मरना अथवा उत्‍तरायण काल की मौत बेहद शुभ होती है आदि-आदि । मौत अगर गंगा किनारे बारह साल के अन्‍तराल पर आने वाले कुंभ के पावन अवसर पर मची भगदड़ में बुरी तरह कुचल कर हुई हो तो कहना ही क्या। सीधे मोक्ष का वी.वी.आई.पी. सूइट मिलना तय है। और उस सूइट में संतों द्वारा घोषित सुख-सुविधाएँ अंगूर के गुच्छे, सुरा-सुंदरी और तमाम ऐयाशी तो फिर हैये ही हैये। एक आम भारतीय को और क्या चाहिए ।

इधर अमीर-गरीब सब लोग मोक्ष की आकांशा में लाखों रुपये खर्च करके ना जाने क्या-क्या कर्मकांड कराते हैं। तमाम पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन, ब्राह्मण भोज, दान-दक्षिणा आदि-आदि में पूरा जीवन व्‍यतीत कर देते हैं । उसके बाद भी मोक्ष की फ्लाइट मिले न मिले कोई भरोसा नहीं होता। लेकिन यदि कुंभ की भगदड़ में मौत हुई हो तो मोक्ष की फ्लाइट का टिकट लेने की भी कोई ज़रूरत नहीं । उस स्पेशल चार्टर्ड फ्लाइट में ऑटोमेटिक रिजर्वेशन होता है। भगदड़ में कुचले नहीं कि सीधे फ्लाइट की आरामदेह सीट पर और फ्लाइट के क्रू की सुन्‍दरियाँ भी बिना टिकट की पूछताछ किए सीधे मोक्ष के द्वार पर छोड़ आतीं हैं। मोक्ष के द्वार पर भी कोई पूछताछ नहीं सीधे वी.वी.आई.पी. सूइट के डबल बेड पर सुवासित गुलाब की पंखुड़ियों के बिस्तर पर। मैंने तो यहाँ तक भी सुना है कि ऐसे कुंभ में कुचल कर मरे लोगों को तो परमात्मा सर से मिलने के लिए भी इंतज़ार नहीं करना पड़ता। अक्सर वे उनके वी.वी.आई.पी. सूइट के सोफे पर ही भगदड़ में कुचली आत्मा का इंतज़ार करते मिलते हैं, और पहुँचते ही मिसमिसा कर गले लगा लेते हैं। वे एक ही वक्‍त में हर सुइट में विराजमान होकर आनेवाली आत्‍मा से‍ मिल लेते हैं।

हालिया कुंभ भगदड़ के बाद कई मोक्ष के आकांक्षिओं को बेहद अफ़सोस हुआ होगा कि हाय हम क्यों न हुए भगदड़ में कुचल कर मरने के लिए। फोकट में मोक्ष पहुँचने का सुनहरा अवसर हाथ से निकल गया। संतों ने जब से भगदड़ में कुचल कर मरने वालों की मोक्ष में जगह को कन्‍फर्म किया है लोग कुंभ में जाने के लिए मरने-खपने को तैयार हुए बैठे हैं। एक और समस्या सामने आने की संभावना है। लोग दस-बीस गुणे तादात में कुंभ की और कूच कर सकते हैं । क्या मालूम अगली भगदड़ कब मच जाए और मोक्ष की  फ्लाइट  में जगह मिल जाए।

कुंभ प्रबंधन को चाहिए की मोक्ष आकांक्षिओं के लिए कुंभ पहुँचने के लिए विशेष सुविधाओं का इंतज़ाम करे और उन्‍हें भगदड़ में मरने का पूरा मौका दे। यदि अपने-आप कोई भगदड़ नहीं मचती है तब भगदड़ मचाने का व्यापक इंतज़ाम करें बल्कि समय-समय पर भगदड़ मचाए और सुरक्षा के कोई इंतज़ाम रखने की गुस्‍ताखी न करें ताकि हम जैसे लाखों फोकटिये मोक्ष के आकांक्षी आसानी से भगदड़ में कुचलकर मोक्ष का सुख भोग सकें। कभी कभार ही तो ऐसा अद्भुत योग आ पाता है कि आदमी बिना किसी प्रयास के मोक्ष की ओर निकल जाए।

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ट्रम्‍प की घास

//व्‍यंग्‍य - प्रमोद ताम्‍बट//

ट्रम्प ने हमें घास नहीं डाली। कितनी बड़ी ट्रेजडी है। इतनी बड़ी ट्रेज़डी है कि इतिहास के गोदाम में इस साइज की दूसरी कोई ट्रेजडी हरगिज़ नहीं है। इतनी बड़ी ट्रेजडी तो ट्रम्प के जानी दुश्मनों के साथ भी नहीं हुई जिन्हें घास डलने की रत्‍ती भर भी उम्मीद नहीं थी, हम तो फिर भी उसके जिगरी दोस्त थे, और हमें पूरी उम्मीद थी कि हमारे सामने घास डलेगी, पक्‍का डलेगी । फिर भी ट्रम्प ने हमें बिल्‍कुल घास नहीं डाली।

हमने घास डलवाने की बहुत कोशिश की, बहुत हाथ-पैर मारे, बहुत मिन्नतें कीं ताकि किसी तरह हमें भी ट्रम्प की घास चरने का मौका मिल जाए । लेकिन ट्रम्प नहीं पसीजा। पता नहीं कौन सा पाप हमसे हो गया कि हम ट्रम्प की घास के पहले नेचुरल हकदार होने के बावजूद अमरीकी ओर से घास हमारे पास फटकने भी नहीं दी गई।

हालांकि ट्रम्प के पास बहुत सारी घास मौजूद है। घास के बड़े-बड़े खेत-खलिहान, बड़े बड़े गोड़ाउन है उसके पास। कोई कमी नहीं उसके पास घास की। लेकिन उसने हमें नहीं डाली। पता नहीं क्यों नहीं डाली। थोड़ी सी डाल देता तो कोई कम तो पड़ जाती नहीं उसे घास ? क्या बिगड़ जाता उसका अगर तनिक सी हमें भी डाल देता । हम कौन उसकी घास खाकर भाग रहे थे।

ट्रम्प के पास भाँति-भाँति की घास है। हरी-हरी चाहो तो हरी-हरी। सुनहरी चाहो तो सुनहरी, सूखी सट्ट, जिसे भूसा कहते हैं वह भी। और तो और रंग-बिरंगी बेहद आकर्षक डिज़ाइनर घास भी है उसके पास। कमबख़्त डालता तो हम कितने अच्छे से घास चरते। दुनिया देखती कि हमारी घास चराई भी क्या घास चराई है। लेकिन हमारी क़िस्मत में ही नहीं थी ट्रम्प की घास, इसलिए तो उसने ज़रा सी भी नहीं डाली ।  

इतनी सारी घास है ट्रम्प के पास कि वह बैठे-बैठे सारी दुनिया को चरा सकता है और उसने चराई भी । बस हमें चराना भूल गया। जाने कैसे भूल गया। बादाम तो हम बहुत एक्सपोर्ट कर रहे हैं अमेरिका को। फिर भी भूल गया। चराना भूल गया या जानबूझकर नहीं चराई यह तो वही जाने परंतु वह मेहरबानी करके हमें भी थोड़ी सी घास डाल देता तो उसके बाप का क्या कुछ चला जाता?

ट्रम्प घास डालता तो हम बड़ी शिद्दत से उसे चरते। तिनका-तिनका चर-चर कर हम घास को पूरा चर जाते। एक दाना भी ज़मीन पर नहीं छोड़ते कि कोई और आकर उसे चर जाए। हम घास के एक-एक तिनके का पूरा मान रखते और पूरे सम्मान के साथ उसे उदरस्‍त करते। हम घास को रबड़ी-मलाई की तरह चाट-चाटकर पूरा चट कर जाते। पूरी दुनिया को नाच-गाकर बताते कि हमें ट्रम्‍प की घास चरने का मौक़ा मिला है और हम उसे रबड़ी-मलाई की मानिंद चट कर गए हैं । दुनिया एक नये और मानीखेज़ मुहावरे का लुत्फ उठाती - ट्रम्प की घास चाटना। हिंदी के मुहावरा कोश में एक और मुहावरे की वृद्धि होती। हिंदी समृद्ध होती। कुछ लोग ज़रूर इस मुहावरे में से घासशब्द का लोप करके अर्थ का अनर्थ करते लेकिन हम उसकी कतई चिंता नहीं करते। हम चरते। पूरी घास को रबड़ी-मलाई की तरह चट कर जाते।

ट्रम्प की घास का स्वाद भी कोई काजू-किसमिस से कम नहीं । चरो तो ऐसा लगता है मानो ड्रायफ्रूट का भंडार चर रहें हो। लेकिन ट्रम्प की घास डलती हमारे सामने तब न हम ड्रायफ्रूट का लुत्फ उठा पाते । डाली ही नहीं घास कमबख्‍त ट्रम्प ने। हम मायूस हैं । बहुत मायूस हैं लेकिन बता दें कि हतोत्साहित बिल्‍कुल नहीं हैं। हम कोशिश करेंगे। निरंतर कोशिश करेंगे। मरते दम तक कोशिश करते रहेंगे की ट्रम्प हमें घास डाले और हमें भी उसकी घास चरने का स्‍वर्णिम अवसर मिल सके। देर-सवेर कभी न कभी तो वह अवसर मिल ही जाएगा।

देखो भैया, जब तक हमारा देश एक बड़ी चरागाह है, और हम उसके चरवाहे हैं, तब तक कोई हमें घास डाले या ना डाले, उसे झक मार कर हमारे यहाँ चरने तो आना ही पड़ेगा। हम भी देखेंगे कि यह ट्रम्‍प का बच्‍चा कब तक हमें घास नहीं डालता । हमारी चरागाह को चरने की अगर रत्‍ती भर भी साम्राज्‍यवादी तमन्‍ना है तो उस‍के तो बाप को भी हमें घास डालना पड़ेगी। देखते हैं कैसे नहीं डालता।

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शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

फर्ज़ी डिग्री के दम पर

//व्यंग्य -प्रमोद ताम्बट//

दुनिया के तमाम मुल्‍कों ने तमाम क्षेत्रों में तरक्‍की की है, हमने शिक्षा के क्षेत्र में झंडे गाड़े हैं। झंडे भी कोई ऐसे वैसे नहीं गाड़े, हमारे गाड़े झंडे दुनिया के किसी भी कोने से बड़ी आसानी से फरफराते नज़र आ सकते हैं, अगर बंद आँख से भी देखने की कोशिश की जाए। यहाँ तक कि ये झंडे धुर उत्‍तरी और दक्षिणी ध्रुवों से भी साफ-साफ दिखाई दे जाएँ, चाहे कितनी भी बर्फबारी हो रही हो।

अंग्रेजों के ज़माने में जब लॉर्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा पद्धति को डिज़ाइन करने के लिए अपना सिर खपाया तब उसने ख्‍वाब में भी नहीं सोचा होगा कि कालान्‍तर में दुनिया भर की शिक्षा व्‍यवस्‍थाएँ उसकी डिजाइन की हुई भारतीय शिक्षा व्‍यवस्‍था से इस बुरी तरह पिछड़ जाएँगी कि कोई सपने में भी न सोच सके। बताइये भला, बिना किताबों का बोझ ढोए, बिना स्‍कूल-कॉलेज जाए, बिना पढ़े-लिखे, बिना परीक्षा दिए, बिना पास हुए, घर बैठे आदमी ग्रेजुएट-पोस्‍ट ग्रेजुएट, डाक्‍टर-इन्‍जीनियर की डिग्रियाँ हासिल कर ले, डाक्‍टरेट-वाक्‍टरेट भी कर मारे, इससे क्रांतिकारी उपलब्धि और क्‍या हो सकती है? दूसरा कोई बड़ा से बड़ा मुल्‍क हमारी इस अद्भुत उपलब्धि के आसपास भी नहीं फटक सकता।

एक बात तो सोलह आना सच है कि प्रिटिंग मशीन के अविष्‍कार ने दुनिया को बस मोटी-मोटी किताबों का बोझ ही दिया है जिस कारण टेढ़ी कमर वाले छात्रों की पीढ़ियाँ दर पीढ़ियाँ अस्तित्‍व में आती जा रही थी। मगर हमने उस प्रिटिंग मशीन पर फर्ज़ी डिग्रियों की बल्‍क छपाई करवाकर अपने छात्रों के सर पर उस बोझ का साया भी नहीं पड़ने दिया। फर्ज़ी डिग्रियों की छपाई के इस कौशल से हमने शिक्षा को तो स्‍तरीय बनाया ही बनाया है, छपाई की कला में भी हम इस कदर सिद्धहस्‍त हुए हैं कि एक बार असली डिग्री को आसानी से नकली डिग्री साबित किया जा सकता है परन्‍तु हमारी छापी गई नकली डिग्री को नकली डिग्री साबित करने में बड़े-बड़े विशेषज्ञों को भी नाकों चने चबाना पड़ जाता है। अब यही देखिए, हाल ही में कुछ बावले हमारे प्रिय प्रधानमंत्री की डिग्रियों को नकली साबित करने पर तुले हुए थे लेकिन शर्तिया यह पक्‍की बात है कि वे डिग्रियाँ शत-प्रतिशत असली हैं। असली हैं इसीलिए बावले उनमें दर्जनों मीनमेख निकाल पा रहे थे, अगरचे वे नकली होतीं तो कोई माई का लाल उनमें रत्‍ती भर का भी मीनमेख नहीं निकाल पाता।   

किताबी कीड़ों का दुनिया भर में हमेशा आतंक रहा है। कम्‍बखत सारी डिग्रियाँ खुद ही हड़प लिया करते रहे हैं। न केवल डिग्रियाँ बल्कि आई..एस, आई.पी.एस से लेकर चपरासी तक की नौकरी पर इन्‍हीं का कब्‍ज़ा रहता आया है। हमने देश को इस कलंक से मुक्ति दिला दी। हमने नकल संस्‍कृति के तूफानी विकास और विस्‍तार के साथ-साथ देश के कोटि-कोटि नालायकों तक फर्ज़ी डिग्रियों की सप्‍लाई सुलभ करवाई ताकि वे भी सम्‍मानजनक नौकरियों में जाकर देश सेवा करें और गौरवान्वित महसूस कर सकें। कुछ प्रतिभाशाली लोगों ने तो इन्‍हीं फर्ज़ी डिग्रियों के प्रताप से देश की राजनीति का मान बढ़ाने में प्रचंड सफलता पाई है। जबकि असली डिग्री वाले लाखों उल्‍लू के पट्ठे छात्र दर-दर भटक रहे हैं। वे भी अगर अपनी असली डिग्री को आग के हवाले कर के नकली डिग्री जुगाड लेते तो अब तक तो न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच जाते।  

एक ज़माना था जब लोग फर्ज़ी शब्‍द से थर-थर कॉपते थे और चुपचाप शराफत के लिबास में लिपटे स्‍कूल-कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ में पढ़-पढ़ कर चश्‍में वालों का धंधा चमकाया करते थे। फर्ज़ी डिग्रियाँ दूर की कौड़ी होती थीं लिहाज़ा हाड़ तोड़ मेहनत और मशक्‍कत करके असली डिग्री की भीख सी माँगनी पड़ती थी। हमने परिस्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया। डिग्रियों को चना जोर गरम और मुँफली के ढेर की तरह गली-गली में बेचने के लिए पहुँचवा दिया । जिसको जो विषय पसंद हो, आओ, पैसा फैको, डिग्री तुलवाओ और चलते बनो।

हमारा दृढ़ संकल्‍प है कि भविष्‍य में हम अपनी सेवाओं का व्‍यापक विस्‍तार करेंगे। हमारे आदमी साथ में डिग्रियों का कैटलॉग लेकर घर-घर जाकर लोगों की पसन्‍द की‍ डिग्रियाँ बेचेंगे। ऑन लाइन खरीदारी की सुविधा भी हम शीघ्र ही चालू करने वाले हैं। आप समुचित ऑफलाइन-ऑनलाइन भुगतान कर अपनी मन पसन्‍द डिग्री, अपनी सुविधा के वर्ष और कॉलेज-यूनिवर्सिटी के हिसाब से हमारी साइट से सीधे डाउनलोड कर सकेंगे।

सचमुच, शिक्षा के क्षेत्र में यह एक युगान्‍तरकारी पड़ाव है। हमने कसम खाई है कि मैकाले की शिक्षा पद्धति के पारम्‍परिक ढाँचे को चूर-चूर करके एक नई रोशनी का मार्ग प्रशस्‍त करेंगे। दुनिया की किसी भी यूनिवर्सिटी के किसी भी कोर्स की फर्ज़ी डिग्रियों के दम पर हम अपने इस देश को दुनिया का सिरमोर बना कर ही दम लेंगे।                  

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शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

कोरोना के खिलाफ वायरोनार

// व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

         कोरोना वायरस के बढ़ते प्रभुत्व से चिंतित होकर परंंपरागत रूप से हमारे साथ खेल-कूद कर बड़े हुए वायरसों में गहरा असंतोष एवं आतंक का वातावरण उत्पन्न हो गया था । उन्होंने व्यांपक लॉकडाउन में भी किसी तरह एक-दूसरे से सम्‍पर्क साधकर एक छोटा सा 'वायरोनार' आयोजित कर लि‍या और उसकी तैयारियों में जुट गए । तैयारियों के बीच नाना मुद्दों के साथ एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर वायरसों के बीच जमकर सर फुटव्वल हुई । हुआ यह कि एक पक्ष इस वायरोनार का अध्यूक्ष/मुख्यअथिति कोरोना वायरस को ही बनाना चाहता था जिसके खिलाफ यह सारी मुहीम थी । जबकि दूसरा पक्ष दुश्मन के साथ किसी भी प्रकार का मेलजोल रखने के सख्त  खिलाफ था । बहरहाल अंत में 'डेंगू' वायरस को अध्यक्ष/ मुख्य अतिथि बनाने पर सहमति बनती पाई गई और मामला शांत हुआ ही था कि पुन: बेेेक्टेरिया प्रजाति को वायरोनार में आमंत्रित करने के मुद्दे भर गर्मा-गर्मी होने लगी । कुछ वायरस जातिवाद के घोर समर्थक थे अत: बेेक्टेेरिया को वायरोनार में आमंत्रित करना नहीं चाहते थे लेकिन बड़े-बूढ़े सेकूलर वायरसों के समझाने पर कि उन्हें नहीं बुलाया तो भीड़ कहाँ से इकट्ठी होगी, जातिवादी वायरस मान गए परंतु इस बात पर फिर  भी अड़े रहे कि अव्वल तो वह लोग अपना मुँह सिल कर बैठे रहेंगे और दूसरे, कार्यक्रम का नाम किसी भी कीमत पर ‘वायरोनार’ ही होगा, ‘वायरो-बेेक्टे़रियोनार’ अथवा ‘बेेक्टोम-वायरोनार’ जैसा कुछ भी नहीं किया जा सकेगा । 

ऐसे ही छोटे-मोटे विचार मतभेदों के साथ आखिरकार वायरोनार का दिन आ गया । सुबह से ही गहमा-गहमी शुरू हो गई । कुछ वायरस मुख्य अतिथी को लेने साफ पानी की तलाश में निकल गए । बमुश्किल साफ पानी मिला तो उसमें आराम फर्मा रहे 'डेंगू' महाशय नखरा दिखाने लगे । जब उन्हें कोरोना वायरस के सार्वभौमिक खतरों से आगाह किया गया तब उनकी आँखें चौड़ी हुई और वे बाहर निकले मगर फिर अपनी सवारी मच्छंर के बिना कहीं जाने को वे हरगिज तैयार नहीं थे । मच्छर कहीं- फिनिट पीकर पड़ा हुआ था । आखिरकार एक मख्खी से लिफ्ट लेकर डेंगू वायरस महोदय को अध्य़क्षता/मुख्यन आतिथ्य कराने के लिए उठाकर लाया गया । 

वायरोनार प्रारंभ हुआ । प्रस्ताावना रखते हुए संयोजक वायरस ने बोलना शुरू किया- प्रिय वायरसों और समर्थन में उपस्थित बेेक्टेरिया जनों, आप सब जानते ही हैं कि इस युग का सबसे बड़ा संकट कोराना वायरस कोविड-19 इस धरती पर दस्तक दे चुका है और बहुत तेजी से दुनियाभर को अपने चुंगल में लेने की तैयारी में है । लेकिन यह दुनिया किसी की बपौती नहीं है, यह हम सबकी साझा दुनिया है । इस दुनिया में वायरसों के बीच शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का सिंद्धात हमेशा से माना जाता रहा है । हम में से किसी ने भी कभी एक दूसरे के हितों स्वार्थों की अनदेखी नहीं की है । मगर,जुम्मा-जुम्मा चार दिनों पहले पैदा हुए इस कोरोना वायरस ने, वायरस प्रजाति की घोर उपेक्षा करते हुए एक सिरे से सारी दुनिया पर कब्जा  करना शुरू कर दिया है । हमसे फूटे मुँह बात तक करना ज़रूरी नहीं समझा इस आततायी ने । नीति-नैतिकता नाम की चीज़ नहीं रह गई है हमारे समाज में। दोस्तों, हम सबके अस्तित्व पर संकट के गहरे बादल मंडरा रहे हैं । हमारी पूछ-परख कम होती जा रही है । मनुष्य  लोग हमसे डरना बंद कर रहे हैं । केवल करोना से ही सबकी घिग्घीं बंध रही है । हमारा खौफ इतना कम हो गया है कि ड्रग कम्पनियों ने हमें मारने वाली दवाइयाँ, प्रिवेंटिव मेडिसिन्स  तक बनाना बंद कर दिया है । सब कोरोना की दवा ढूँढ़ने में लगे हुए हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो दुनिया में हमारा कोई नाम लेवा तक नहीं बचेगा। हर जगह बस कोरोना का रोना ही रह जाएगा । इन सब गंभीर बिन्दुओं पर चर्चा करने के लिए अत्यंत शार्ट नोटिस पर आज इस वायरोनार का आयोजन किया गया है । अध्यक्ष/ मुख्‍य अतिथि महोदय की अनुमति की प्रत्याशा में (चूँकि वे सो रहे थे) आप सबसे अनुरोध है कि इस विषय पर जो कोई वायरस बंधु प्रकाश डालना चाहता है कृपया मंच पर उपस्थित होने का कष्ट करें ।

मंच पर तो कोई आया नहीं, सारे वायरस अपने-अपने स्थान से ही चिल्ला -चोट करने लगे । सबसे पहले ‘इन्फ्लूपएंजा’ वायरस खड़ा हुआ और बोला- इस कोरोना के बच्चे पर तो कॉपी राइट उल्लघंन का केस दायर किया जाना चाहिए । ये कमीना हूबहू हमारी आक्रमण शैली और गुण लक्षणों को चुराकर हमले कर रहा है । इनका ही बड़ा तोपचंद था तो अपनी अलग शैली क्योंं विकसित नहीं कर ली इसने ? 

‘हंता’ वायरस भी इस बीच चिल्ला कर बोला- मेरी स्टाइल को भी चुराया है इसने। पल्मोसनरी सिस्टम पर अटैक पर मेरा कॉपी राइट था मैं छोडूंगा नहीं इस करोना को । 

‘एच.आई.व्हीम’ का वायरस खड़ा हुआ और बोलने लगा – आज तक दुनिया भर पर मेरा राज था । लोग चूमा-चाटी, मैथून क्रिया और सुई-इंजेक्शन लगवाने से पहले मुझसे बचने की फिक्र करते थे । मगर यह कोरोना का बच्चा, इसके कारण तो इंसान हवा, पानी, सब्जीे-भाजी हर चीज से डरने लगा है । मेरे मरीज को कम से कम दूसरा कोई व्‍यक्ति छूकर सांत्वाना तो दे सकता है, कोरोना के मरीज से तो लोग कोसों दूर भाग रहे। मरे बाप को फूँकने मरघट तक नहीं जा रहे।  मेरा टेरर तो रहा ही नहीं। मेरी तो इर्म्पोनटेंस ही दुनिया में खत्म होती जा रही है। 

‘सार्स’ का वायरस उठकर खड़ा हुआ और चिल्लाया-अरे मेरा तो भाई बताया जा रहा है इस कम्बख्त को। लेकिन देखिए मुझे कोई कंसल्ट नहीं, कोई सलाह–मशविरा नहीं । दो कौड़ी की इज्जत नहीं दे रहा मुझे। बस उठकर चल दिया दुनिया पर कब्जा करने। रोक लो इसे तुरंत नहीं तो ये इंसानी प्रजाति को तो खत्मा करेगा ही हमारे अस्तित्व‍ की भी वाट लगवा देगा ।आखिर इंसानों से ही तो हमारा भी अस्तित्व है भाई । इंसान ही नहीं रहेगा तो हम कहाँ जाएंगे? 

‘इबोला’ का वायरस रोने लगा और मंच पर चढ़ कर गिड़गिड़ाता सा बोला- जान बचा लो भाइयों। हम सब शांति से इंसानों के साथ रह रहे हैं, मगर अब इस कोरोना के चक्कर में रोज साबुन, सेनेटाइजेशन, फागिंग और न जाने क्या-क्या अत्याचार सहन करना पड़ रहे है। आप लोगों से हाथ जोड़ कर विनती है, बचा लो हमें, नहीं तो हम सब बेमौत मारे जाएंगे।

वायरसों ने जबरदस्त कोहराम मचाना शुरू कर दिया । नारेबाजी होने लगी – नहीं चलेगी, नहीं चलेगी – इंसानी मनमानी नहीं चलेगी। किसी ने समझाया, भाइयों फिलवक्त इंसान हमारा दुश्मन नहीं है। दुश्मंन है कोरोना। तब फिर परिवर्तित होकर नारे लगने लगे- नहीं चलेगी, नहीं चलेगी- कोविड की मनमानी नहीं चलेगी । कोरोना हाय-हाय कोरोना हाय-हाय इत्यादि-इत्यादि । 

संयोजक ने हो हल्ला बढ़ता देख अध्यक्ष/मुख्य अतिथि महोदय ‘डेंगू’ को जगाकर स्थिति सम्हालने का निवेदन किया। डेंगू वायरस अपने स्थान पर ही लुढ़का हुआ सा माइक पकड़ कर बोलने लगा- देखो भाइयों, धैर्य खोने का नहीं । हम भी कभी एक दूसरे के बाप थे, मगर आज नहीं है । इंसानों ने हमसे डरना छोड़कर हम पर विजय पा ली ।  ऐसे ही 'कोविड उन्नीस' कोई अमृत पीकर नहीं आया है । आज नहीं तो कल इंसान उसकी काट निकाल ही लेगा । फिर दौड़ा-दौड़ा कर मारेगा उसको। उस दिन उस कोरोना को एहसास होगा कि बिरादरी की अवहेलना करके अलग से अपनी सत्ता  कायम करना कितनी बड़ी मूर्खता है । मैं भी कोई कम था क्या ? अच्छे-अच्छे काॅँँपते थे डेंगू के नाम से । लेकिन अब पड़ा रहता हूँ घोंघे की तरह साफ पानी में । 

डेंगू वायरस का भाषण आगे बढ़ता इसके पहले ही वायरोनार स्थल धड़-धड़-धड़ हिलने लगा, जैसे हजारों घोड़े दौड़े चले आ रहे हों । चारों ओर धूल-आंधी उड़ने लगी । कोई चिल्लाया- अरे, कोविड-19, कोविड-19, कोरोना का आक्रमण हुआ है । चारों ओर भगदड़ मच गई । शोर-गुल के बीच अचानक माइक पर आवाज़ गूंजी- बिरादाराने कौम, वायरस प्रजाति की आन-बान-शान, दुनिया के मालिकों, आप सब माननीय वरिष्ठों  को इस नाचीज़ कोराना वायरस कोविड-19 का सलाम । फालतू की हरकतें करने की ज़रूरत नहीं है। मैं आ गया हूँ और मेरी फौज ने पूरे वायरोनार पर कब्जां कर रखा है । किसी ने भी हिलने-डुलने की जुर्रत की तो भगवान कसम यहीं उसका किरियाकरम करवा दिया जाएगा । तुम लोगों की यह हिम्मत जो तुम लोग मुझे बताए बगैर यह वायरोनार कर रहे हो ? मेरा बहिष्कार कर रहे हो ? मेरे खिलाफ षड़यंत्र कर रहे हो ? कान खोलकर सुन लो तुम सब, होगे तुम पुराने, सीनियर और सम्मानित, प्रतिष्ठित टाइप के वायरस, यह मेरा जमाना है। कोविड-19 कोरोना वायरस का ज़माना। मैं अपनी स्टाइल से वायरस कुल को आगे ले जाऊॅगा। दुनिया फतह करूंगा। साथ दो तब भी और न दो तब भी इस काम में मुझे आप सबका साथ चाहिए। दुश्मनी नहीं करना है मुझे आप सबसे । मेरा सिद्धांत है सबका साथ सबका विकास। मेरी छत्रछाया में चुपचाप पड़े रहो। देखो, इंसान आज तक तो हम कोराना वायरसों का कुछ बिगाड़ नहीं पाया, न ही बिगाड़ पाएगा । हम इस दुनिया पर एकछत्र राज करने के लिए पैदा हुए है और इसी ध्येय से आगे बढ़ रहे हैं । हमें कोई रोक नहीं सकता। अरे जब इंसान नहीं रोक सकता, तो तुम दो कौड़ी के टुच्चे वायरस मुझे क्या रोकोगे? बेहतरी इसी में है कि मेरा साथ दो । हम सब मिलकर इंसानों की इस दुनिया को फतह करेंगे । 

तभी किसी ने नारा लगाया- लॉग लिव लॉग लिव- कोरोना वायरस लॉग लिव। कोरोना वायरस जिंदाबाद- जिंदाबाद जिंदाबाद ।

पहले तो सारे वायरस एक दूसरे का मुँह ताकते रहे, परंतु जब वायरोनार के  अध्यक्ष/ मुख्य  अतिथि डेंगू वायरस ने मंच पर कोरोना वायरस के सुर में सुर मिलाकर प्रचंड नारा लगाया- हमारा नेता कैसा हो, तो पूरा वायरोनार स्थल गॅूज उठा, कोरोना वायरस जैसा हो । 

बाहर नगर निगम की गाड़ी सेनेटाइजर की फुहार छोड़ कर क्षेत्र को सेनेटाइज कर रही थी । उस पर गाना बजा रहा था – हम सबने ठाना है, कोरोना को हराना है । गाड़ी से निकली एक प्रचंड फुहार ने वायरोनार स्थल को तरबतर कर दिया । सारे वायरसों में वह भगदड़ मची की पूछो मत । 

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शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

पॉजीटिव बने रहना है

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

          पॉजीटिव होना भी क्‍या ग़जब की बात है। घबराइये नहीं, मैं कोरोना पॉजीटिव होने की बात नहीं कर रहा। मैं तो जीवन की हज़ारों निगेटिविटियों के बीच रहते हुए भी घोर पॉजीटिव बने रहने की अद्भुत अतिमानवीय क्षमता की बात कर रहा हूँ। यह वैसा ही है जैसे किटाणुओं-जिवाणुओं सॉप-सपोलों और दूसरे खतरनाक जलचरों से भरे कीचड़युक्‍त तालाब में कमल का बेशर्मी और निरपेक्ष भाव से खिले, मुस्‍कुराते रहना। 

          कोरोना की बात चली है तो उसी से शुरू करते हैं। संक्रमितों की संख्‍या अठारह लाख से ज्‍़यादा हो चुकी है परन्‍तु निज़ाम के चेहरों पर अब भी अद्भुत पॉजिटिविटी है। दुनिया के मुकाबले हम बहुत ही कम संक्रमित हैं। खुशी की बात है। मौतों में भी हमने यह अनुपात सफलतापूर्वक कायम रखा है। निराश नहीं होने का। खुश रहने का। चाहे आधी आबादी चपेट में आ जाए लेकिन हमें बाकी आधी बचने वाली आबादी के लिए खुश रहना है। पॉजीटिव रहना है। बाकी कुछ करें न करें, पॉजीटिव रह लिए तो समझो बहुत कुछ कर लिया।

          महंगाई कमर तोड़ रही है। वह हाँथ-पैर भी तोड़ दे तब भी निराश नहीं होना है। पॉजीटिव रहना है। अमेरीका और योरोप की मंडियों में जाकर देखों ज़रा, कितनी महंगाई है। हम तो बहुत अच्‍छे हैं। फालतू हंगामा करने की क्‍या ज़रूरत है। पॉजीटिव रहो। पॉजीटिव रह कर महंगाई का सामना करोगे तो महंगाई, महंगाई नहीं रह जाएगी, फूलों का हार हो जाएगी। खुशी से गले में टांगे घूमते रहो। 

          बेरोज़गारी बेइंतहा बढ़ती जा रही है। सारे रिकार्ड टूट रहे हैं। टूटने दो, तुम पॉजीटिव होकर रिकार्ड का टूटना देखो। राजनीति में कार्यकर्ता कहाँ से आएगा? बेरोज़गारी के टूटे रिकार्ड ही से तो आएगा। बेरोज़गार हमारे दल में आएगा, नारा लगाएगा, जय-जयकार करेगा, जुलूस निकालेगा, तोड़फोड़ करेगा, धरना देगा, मस्जि़द तोड़ेगा, मंदिर बनाएगा, सत्‍ता दिलाएगा, कितनी पॉजीटिव ऊर्जा का संचार होगा। बेरोज़गार को रोज़गार दे दोगे तो क्‍या घंटा राजनीति करोगे।

          अर्थव्‍यवस्‍था संकट में है, अर्थव्‍यवस्‍था बीमार है, अर्थव्‍यवस्‍था चरमरा रही है, अर्थव्‍यवस्‍था बरबाद हो रही है, अर्थव्‍यवस्‍था गड्ढे में जा रही है, अर्थव्‍यवस्‍था जर्जर हो रही है, अर्थव्‍यवस्‍था पंगु हो रही है, अर्थव्‍यवस्‍था चौपट हो रही है, अर्थव्‍यवस्‍था तबाह हो रही है, अर्थव्‍यवस्‍था नेस्‍तोनाबूद हो रही है आदि आदि आदि। चुप रह न कम्‍बख्‍़त, कितनी निगेटिविटी भरी है तुझमें। पॉजीटिव पॉजीटिव बोल न यार। अर्थव्‍यवस्‍था बहुत अच्‍छा कर रही है। देखता नहीं एंटिलिया में मुनाफा आया है। पाँच ट्रिलियन इकॉनामी की ओर देख मूर्ख, फुल पॉजीटिव रह।

          पॉजीटिव रहना स्‍वास्‍थ के लिए लाभदायक है। दवाई न होगी, अस्‍पताल न होगा, डॉक्‍टर न होगा, दाल-रोटी न होगी, शिक्षा न होगी, रोज़गार न होगा, सुख-सुविधा, व्‍यवस्‍था कुछ भी न होगा तब भी प्‍यारे तू एक बारगी जी जाएगा, लेकिन अगर पॉजीटिविटी न हुई तो तू मर जाएगा बावले। न मरा तो कोरोना तूझे मार देगा। कोरोना नहीं तो हम कौन तुझे जीने देने वाले हैं।    

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गुरुवार, 6 अगस्त 2020

एक अधूरी साहित्य साधना


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
मैंने अक्सर देखा है कि जैसे ही साहित्य सृजन का मूढ़ मेरे अन्दर धनीभूत होता है, कोई न कोई आकर उसमें व्यवधान खड़ा कर देता है। उन्हें ज़रा भी इस बात का अन्दाज़ा नहीं होता कि उनके इस कुकृत्य से साहित्य का कितना भारी नुकसान होगा। साहित्य का गोदाम एक ऐसे महान साहित्यकार के कालजयी साहित्य से वंचित रह जाएगा जिसे साहित्य के क्षेत्र में शून्य योगदान का गौरव हासिल है।
अल्लसुबह जब मैं ताज़ा साहित्य लेखन के लिए नोट्स बनाने के लिए बैठा तो देखा फाइल पैड में सम्हाल कर रखे गए दो-तीन कोरे कागज़ों पर पड़ोसी का बच्चा, एबसर्ड शैली में चिड़िया-कौवे, कुत्ता-बिल्ली की आकृतियाँ उकेर गया था। उसे मेरे साहित्यकार बनने से पहले चित्रकार बनने की जल्दी थी। मजबूरन उपयोग किये गए कागज़ों के पीछे कोरे रह गए स्थान पर लिखकर साहित्य की लाज रखने के ख्याल से मैंने, बंद पडे़ चालीस-पचास बॉल पाइंट पेनों में से चल सकने वाले उस महान पैन की तलाश शुरू की जिससे इतिहास रचा जाने वाला था। पता चला कि पड़ोसी का बच्चा यह काम पहले ही कर चुका है। साहित्य साधना में दो बार आए इस नन्हें व्यवधान से गुस्सा तो बहुत आया मगर सोचा- चलो कोई बात नहीं, बच्चा है। उसे अभी उसकी की गई ऐतिहासिक गलती का बिल्कुल भी एहसास नहीं है, इसलिए उस पर नज़ला उतारने की बजाय मैंने पेन्सिल से साहित्य सृजन करने का निर्णय लेकर बरामदे में कुर्सी पर आसन जमा लिया।
अभी पहला शब्द दिमाग में आया ही था कि दरवाजे़ की घंटी बज उठी। घंटी की आवाज़ सुनते ही शब्द वापस वहीं चला गया जहाँ से आया था। उठकर दरवाज़ा खोला तो देखा सामने काम वाली बाई खड़ी थी। मैं झुंझला उठा, बोला- रात को सोती नहीं हो क्या जो इतनी सुबह-सुबह मुँह उठाकर चली आती हो? वह भी उत्तर फेंक कर मारने के लिए तैयार थी, चट से बोली-अपना कागज़ काला करो ना साब, कायको मेरे मुँह लग रहे हो?
मैं वापस अपनी जगह पर आकर बैठा ही था कि वह अन्दर से झाडू़ उठा लाई और बोली-चलो हटो यहाँ से। मैं अपने कागज़-पत्तर लेकर दूसरे कमरे में चला गया और बैठकर उस चले गए शब्द के वापस आने का इंतज़ार करने लगा। शब्द तो वापस नहीं आया लेकिन वह बाई बरामदा निबटाकर उस कमरे में भी चली आई जहाँ मैं बैठा था, और फिर बोली- चलो उठो। इस तरह यह साहित्य साधक इस कमरे से उस कमरे, उस कमरे से इस कमरे भटकता रहा और वह बाई मेरे पीछे-पीछे झाडू़-पोछा लिए घूमती मेरी साहित्य साधना में पलीता लगाती रही।
जैसे-तैसे वह गई और मैं फिर कागज़ पेन्सिल लिए बैठकर शब्दों का आव्हान करने लगा। पहला, दूसरा, तीसरा शब्द आया और चौथे शब्द पर फिर घंटी बज गई। मैंने पेन्सिल पटकी और दरवाज़ा खोला। सामने दूध वाला था। उसके हाथ से दूध के पैकेट लेकर मैंने फ्रिज़ में रखे और वापस बरामदे में आया तो देखा दूध वाला कम्बख़्त मेरे साहित्य साधना के सिंहासन पर जमा बैठा हुआ था। मैंने प्रश्‍नवाचक नज़रों से उसे घूरा तो वह अकड़ते हुए बोला- पैसे ! मेरा दिमाग फिर खराब हो गया। मुझे साहित्य साधना अधर में ही छोड़कर अब इस मनहूस के लिए पैसे ढूँढ़ने पड़ेंगे। घर में पैसे नहीं है यह छोटी सी बात दूध वाले को सीधे समझा देने की बजाय मैंने उसे गुस्‍से से डपट दिया- सुबह-सुबह पैसे माँगने क्यों चले आते हो? आजकल कोई घर में पैसे रखता है क्या? स्वेपिंग मशीन ले लो एक, एटीएम से पेमेंट कर दिया करेंगे। या फिर पेटीएम गूगल पे वगैरह पर अपना एकाउंट रखो, ऑनलाइन पेमेंट कर दिया करेंगे।
दूधवाला भी शायद घरवाली से लड़कर आया था, बोला-पैसे नहीं है तो ऐसा बोलो न, भाषण काहे दे रहे हो सुबह-सुबह? कल सुबह पैसा तैयार रखना, वर्ना कारड नहीं बनेगा। इस तरह एक दूधवाला भविष्य के एक कालजयी साहित्यकार की बेइज्ज़ती करके चला गया। मैं थोड़ी देर मुँह टापता सोचता रहा कि अच्‍छा हुआ मैं भाषणवीर नहीं बना, और फिर से अपने शब्द संधान में लग गया।
पेंन्सिल कागज़ को स्पर्श करने ही वाली थी कि बाहर सड़क पर कचरा बटोरने वाली गाड़ी अपने लाउडस्पीकर की कर्कश आवाज़ के साथ आ खड़ी हुई। इसकी यह संगीत सभा रोज़ सुबह बिलानागा होती है। 10-15 मिनट तक बारी-बारी से कोरोना और साफ-सफाई से संबंधित कोरस गान सुना-सुना कर वह मेरे साहित्य चिन्तन पर वज्रपात सा करती रही। मैं किंकर्त्वविमूढ सा वह वृंदगान सुनता रहा। मोहल्ले से कचरा बटोर कर फिर वह आसपास के मोहल्लों में घूमती रही और उसकी प्रात:कालीन संगीत सभा मेरे घर तक स्पष्टतः सुनाई देती रही। फिर तो एक घंटे तक बस कोरोना और कचरे के गीतों में ठसे सरकारी शब्द ही लौट-लौट कर दिमाग में आते रहे। मेरे अपने शब्द पता नहीं कहाँ फना हो चुके थे।
इससे पहले कि मैं फिर से साहित्य साधना में लीन हो पाता कि फिर से दरवाज़े की घंटी बजी। दरवाज़ा खोलकर देखा एक क्यूट सा बालक भगवा वस्त्र धारण किये हुए सामने मुस्कराता खड़ा है। उसने एक परचा मेरे हाथ में पकड़ा दिया और बोला-बच्चा, प्रभु राम के दरबार में अखंड रामायण का पाठ शुरू होने वाला है। अवश्‍य उपस्थित होवें। वह गया कि कुछ ही देर में सामने मंदिर के लाउड स्पीकर से बेसुरी-बेताली आवाज़ों में भक्ति रस की धारा बह निकली। मैंने अपने कागज़ और पेन्सिल को एक कोने में पटकते हुए साहित्य साधना चौबीस घंटों के लिए स्थगित कर दी। हिन्दी साहित्य मेरे अमूल्य योगदान से हमेश के लिए चौबीस घंटे पीछे रह गया।           
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