शनिवार, 11 मई 2013

यहाँ भी है छेड़छाड़

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
‘छेड़छाड़’ के मामलों पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कानूनों के बावजूद कोयला आवंटन घोटाले की रिपोर्ट से ‘छेडछाड़’ हो गई। ‘छेड़छाड’ भी सड़क छाप मजनुओं के हाथों नहीं बल्कि चोटी के अधिकारियों-मंत्रियों के कर-कमलों से। जो टुच्चाई अब तक गली-नुक्कड़ों और बाज़ारों में आवारा शोहदों द्वारा की जा रही थी, वह अब हाई प्रोफाइल लेवल से होने लगी है, क्या ज़माना आ गया है।

सारे देश की नज़रों के सामने ‘रिपोर्टों’ से ऐसी अहमकाना छेड़छाड़ की जाती रहीं तो इस देश में ‘रिपोर्टों’ का मान-सम्मान कैसे सुरक्षित रखा जा सकेगा। उनकी दशा भी देश की अबला नारियों की तरह होकर रह जाएगी जिसे चाहे जो, चाहे जहाँ छेड़ कर चलता बनता है।  

कुछ आदर्शवादियों का आरोप है कि ‘रिपोर्टें’ मजबूत फाइल-पैड, क्लाथिंग वाले लिफाफों में सुरक्षित होकर नहीं चलेंगी, फटे-टूटे, भौंडे-भड़काऊ लिबास में अंग प्रदर्शन करती फिरेंगी तो फिर ‘छेड़छाड़’ तो होगी ही। ‘रिपोर्टों’ को मर्यादा के आवरण में ‘लाख-चपड़ी’ से पैक होकर चाहरदिवारियों में दुबके रहना चाहिए। वे अगर यू ही यहाँ-वहाँ छुट्टी घूमती रहेंगी तो ‘छेड़छाड़’ तो क्या उनके साथ ‘बलात्कार’ भी हो सकता है। समय बहुत खराब चल रहा है, रिपोर्टों के माई-बाप, अभिभावकों को भी बेहद सावधानी एवं एहतियात बरतना चाहिए। कब कौन कहाँ से आकर उनकी प्यारी-दुलारी ‘रिपोर्ट’ का छेड़ जाए कोई भरोसा नहीं।

‘रिपोर्टों’ के साथ ‘छेड़ाछाड़ी’ की प्रथा तो हमारे देश में पुरानी है। छोटे बच्चे स्कूल के समय में ही एक्ज़ाम रिपोर्ट के साथ छेड़ाछाड़ी कर अपने आप को इस काम में दक्ष बना लेते हैं। कालान्तर में देश के बड़े-बड़े संस्थानों में बैठकर रिपोर्टों की व्यापक छेड़ाछाड़ी कर अपना और दूसरों का स्वार्थ साधते हैं। वैसे संसद में बैठकर की जाए या विधानसभा में सचिवालयों में बैठकर की जाए या डायरेक्टरेटों में, रिपोर्ट से छेड़छाड़ कहीं भी बैठकर की जाए छेड़छाड़ तब भी छेड़छाड़ ही रहेगी और इस घटिया हरकत पर सख्ती से अंकुश लगाने की ज़रूरत है। जब तक काननू पर्याप्त कड़े नहीं होते ये लुच्चे-लफंगे अपनी हरकतों से बाज आने वाले नहीं हैं। यू ही रिपोर्टों से छेडछाड़ करते रहेंगे।

इस मामले में पुलिस महकमें की भूमिका खासी महत्वपूर्ण है। यूँ तो पुलिस को देख कर अच्छे-अच्छे छेड़कों की हवा खिसकती है, मगर फिर भी यदि पुलिस विभाग ‘रिपोर्टों’ के हितों की रक्षा के लिए कमर कस ले तो फिर कोई अकेली देख ‘रिपोर्ट’ को छेड़ने की हिम्मत नहीं करेगा। मगर पुलिस का रवैया भी रिपोर्टों के प्रति यदि छेड़छाड़ करने वालों के समान ही असंवेदनशीलता भरा रहा तो बेचारी ‘रिपोर्ट’ के सामने आत्महत्या के अलावा दूसरा कोई चारा ही नही बचेगा।

यह तो महज़ एक ‘रिपोर्ट’ का मामला है जिसके साथ की गई छेड़छाड़ उजागर हो गई है। देश में अब तक कितने घोटालों की रिपोर्टें छेडी़-छाड़ी जाकर चलती कर दी गई होंगी कौन जानता है। रिपोर्टों से छेड़छाड़ के विरूद्ध आवाज़ उठाई जाना बेहद जरूरी है।

-0-

    

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

आईपीएल चालू आहे



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
आई. पी. एल. जिसके शताधिक फुलफार्म हैं, की ‘झंपिंग झपांग झंपक-झंपक’ जोर-शोर से चल रही है। जैसा की एक भद्र फिल्मी महिला ने टी.वी के माध्यम से कई दिनों तक इस अद्भुत बोलों वाले गीत के साथ यह महत्वपूर्ण संदेश जन-जन तक पहुँचाया कि शर्माने का नई, जेंटलमैन से मेंटलमैन बनने का, बहुत सारे लोग मेंटलमेन बनने लगे हैं। जैसे-जैसे यह मेंटलपना परवान चढ़ेगा, लोग कामकाज, नौकरी-धंधा पढ़ाई-लिखाई यहाँ तक कि खाना-पीना और शरीर की दूसरी अति महत्वपूर्ण जैविक क्रियाओं पर भी जबरिया रोक लगा कर बस ‘झंपिंग झपांग झंपक-झंपक, ढंपिंग ढपांग ढंपक-ढंपक’ में मशगूल हो जाएंगे। कोई मरे-जीए उनकी बला से।
जो लोग कभी जेंटलमन थे ही नहीं उनके लिए तो उस भद्र महिला की अपील बेमानी सी है, मगर इर्द-गिर्द मौजूद हज़ारों-लाखों मेंटलमेन आने वाले दो महीनों तक हम-आप जैसे सच्चे जेंटलमेनों का जीना हराम करने वाले हैं। सड़क चलते लोग आपको रोक-रोक कर पूछेंगे-क्या पोजीशन है ? आप पूछोगे-काहे की ? तो वे आपको ऐसी अजीब नज़रों से घूरेंगे जैसे आप अभी-अभी पागलखाने से छूट कर आ रहे हों। फिर आपको इस मामले में घोर अज्ञानी होने के जुर्म में एक झिड़की सी देते हुए कहा जाएगा-हद हो गई, उधर जंग छिड़ी हुई है और आपको खबर ही नहीं है! आप एक सेकंड के लिए हतप्रभ से हो जाओगे और सोचोगे कि अभी फिलहाल तो जंग जैसी कोई स्थिति है नहीं, पाकिस्तानियों ने ताज़ा कोई हरकत की ही नहीं है, ये कम्बख्त कौन सी जंग की पोजीशन पूछ रहा है! फिर खोजबीन करने पर आपको पता चलेगा कि किन्‍ही वारियरों और डेविलों नामक दो कट्टर दुश्मनों के बीच भिड़ंत है। आपको लगेगा शायद यह डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ. वाली मारामारी की बात हो रही है, मगर फिर वही व्यक्ति आपके ज्ञान में बढ़ोत्तरी करेगा कि भैया मैं ‘झंपिंग झपांग झंपक-झंपक’ अर्थात आई.पी.एल के मैच की बात कर रहा हूँ। और तब आपको ऐसा महसूस होगा जैसे आप बोर्ड की परीक्षा में फेल हो गए हों। 
एक ज़माना था क्रिकेट जेंटलमेन गेम हुआ करता था, मैदान में सिर्फ हाउज़दैट की आवाज भर सुनाई देतीं थी और दर्शक चिन्तनकारों की तरह गैलरियों में बैठकर चैके-छक्के पड़ने पर इस तरह होले-होले तालियाँ बजा दिया करते थे जैसे खिलाड़ियों पर एहसान कर रहे हों। खिलाड़ी घूमते-फिरते, खाते-पीते, टहलते हुए पाँच दिन का टेस्ट मैच निबटा लिया करते थे। मगर अब झंपिंग झपांग ढंपिंग ढपांग का ज़माना है। सीख दी जा रही है कि शराफत छोड़ो, कपड़े फाड़ पागलपन पर उतर आओ। घर-बार, नौकरी-चाकरी, स्कूल-कॉलेज, पढ़ाई-लिखाई छोड़कर मेंटलमैन बन जाओ। लिहाजा मैच में आठ-दस पागल किस्म की चीयरगर्ल्‍स का झुंड बिना थके नाच-नाचकर खिलाड़ियों व दर्शकों का मनोबल बढ़ाएगा, और उधर घर में बैठकर टी.वी. में घुसे पड़े तमाम लोग अपनी ‘झंपक-झंपक’ से अड़ौसियों-पड़ौसियों का मनोबल ध्वस्त करते रहेंगे। क्‍यों? अरे भई, आईपीएल जो चालू आहे।
-0-

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

गरीब सब कुछ खा गए है


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

               
        एक नए रहस्य का पर्दाफाश हुआ है। ‘गरीबों’ की पोल खुल गई है। एक तरह से कहा जाए ‘रंगे हाथों’ की तर्ज पर वे ‘रंगे पेट’ पकड़े गये हैं। पैसठ सालों से हम हैरान-परेशान थे कि आखिर कम्बख्त यह महँगाई बढ़ती क्यों है? राजनीतिज्ञों ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए, अर्थशास्त्रियों ने एक से एक भारी-भरकम सिद्धांत पेले, मगर असली चोर अब पकड़ में आया है। ये साले गरीब देश का सारा अन्न भकोस-भकोस कर महँगाई को हवा दे रहे हैं।

            कुछ दिन पहले मैंने बाज़ार जाने की हिम्मत की थी। आलू-प्याज और दूसरी तमाम सब्जियों के दाम आसमान पर थे। माजरा अब समझ में आया है। गरीब आसमान में बैठकर दना-दन सब्जियाँ, आलू-प्याज खा रहे थे। कुछ समय बाद दाम कुछ कम हुए, जरूर गरीबों को अमीरों पर रहम आ गया होगा और उन्होंने अपने खाने की तादात और गति पर लगाम लगा ली होगी। अंडा, मटन-मच्छी की दुकान पर जाने में तो मेरी आज भी रूह काँपती है, गरीब-गुरबे इस कदर नानवेज खा रहे हैं कि उसकी कीमत हमेशा सातवे आसमान पर ही रहती है। ये गरीब जरूर लोगों को पूरी तौर पर वेजीटेरियन बनाकर छोड़ेंगे।

  एक दिन मैं रेडीमेड कपड़ों की दुकान पर गया, पैंट-कमीज़ खरीदने, लेकिन कमीज़ के भाव सुनकर मुझे गश आते-आते रह गया इसलिए मैंने पैंट की कीमत तो पूछी ही नहीं। पूछता तो शायद हार्ट अटैक का सामना करना पड़ता। अब तक मेरी खोपड़ी में यह सवाल घूम रहा है कि आखिर एक अदद कमीज़ की कीमत उस दुकान के सेल्समेन की तनख्वाह से दो-गुनी कैसे हो सकती है। सेल्समेन की तनख्वाह देढ़ हज़ार और कमीज़ की कीमत तीन हज़ार थी। अब पता चला देश के गरीब ब्रांडेड पैंट-कमीजे़ं पहन-पहनकर उनके दाम बढ़ा रहे हैं।

                इन गरीबों ने देश में महँगाई ही नहीं बहुत कुछ बढ़ाया है। जैसे गुरबकों ने गरीबी ही बढ़ा मारी। वे देश वासियों की क्रय शक्ति ही खाकर बैठ गए हैं, गरीबी तो बढ़ना ही है। उन्होंने बेरोज़गारी बढ़ाई है, क्योंकि वे रोजगार की संभावनाएँ खाए बैठे हैं। उन्होंने जमाखोरी-कालाबाज़ारी बढ़ाई है, क्योंकि वे कायदा-कानून पचा कर बैठे हैं। और तो और उन्होंने भ्रष्टाचार बढ़ाया है क्योंकि वे रात-दिन देशवासियों की ईमानदारी की कमाई खाते रहते हैं। भूखे मरने की नौबत न आ जाए इसलिए लोग रिश्वत और कमीशन खाकर अपनी जान बचाते हैं। किसी को यह बात मालूम नहीं है, मैं बता दूँ कि ये गरीब देश के पूँजीपतियों, नेता मंत्रियों, अधिकारियों-कर्मचारियों और ईमानदारी से मेहनत करके, खून-पसीना बहाकर कमाई गई धन-दौलत को अत्यंत चाव से खाने के शौकीन न होते, तो कसम से देश में इतना भ्रष्टाचार कभी नहीं होता।
                जब से महँगाई बढ़ने के अत्यंत गोपनीय राज का पर्दाफाश हुआ है, मेरी बेचैनी बढ़ गई है। मेरी हार्दिक इच्छा है कि जितनी जल्दी हो सके मुझे उस कमीशन का चेयरमैन बना दिया जाए, जो इस मामले में कम से कम दस बोरी कागज़ खर्च करने की ज़रूरत से गठित किया जाएगा। मैं अपनी रिपोर्ट मैं इन गरीबों का सूपड़ा साफ करने के प्रभावी तौर-तरीकों पर अपने अमूल्य सुझाव दे दूँगा। मगर मुझे मालूम है ऐसा नहीं होने वाला, क्योंकि ये गरीब शिखर पर बैठे नीति-नियंताओं का सारा ज़मीर तक खाकर हज़म कर चुके हैं, इसलिए देश में भाई-भतीजावाद और बहन-भाँजावाद बहुत बढ़ गया है। गरीब सब कुछ खा गए हैं इसलिए देश में हर कुछ अब चरम पर पहुँच गया है।

मंगलवार, 26 मार्च 2013

होली की छूट का फायदा (बुरा न मानो होली है)

//व्‍यंग्‍य-प्रमोद ताम्बट//

      होली के मौके पर वासंती फिज़ाओं में चारों ओर एक नारा डूबने-उतराते लगता है- ‘होली है भई होली है, बुरा न मानो होली है’। शहर भर के हुड़दंगीलाल हुरियारे दूसरे तमाम होली-भीरू नर-नारियों को खुली चेतावनी सी देते घूमते हैं कि- सुन लो भैया होली है, और भारतीय संस्कृति ने हमें जन्मसिद्ध अधिकार दिया हुआ है, हम तुम्हारे मुँह पर पान की पीक थूक सकते हैं, मूत्र त्याग कर सकते हैं, कालिख, कीचड़-गंदगी का मोटा पलस्तर चढ़ा सकते हैं, तुम्हारे कपड़े फाड़कर दिगम्बर अवस्था में बदबू और संडांध भरे गटर के मेनहोल में तुम्हें डुबकी लगवा सकते हैं, देसी ठर्रे की अख्खी बोतल चढ़ाकर तुम्हारी माँ-बहन एक कर सकते हैं, तुम साले क़तई बुरा नहीं मानना। जो तुमने बुरा मानने की जुर्रत की तो फिर किसी अच्छे अस्थि विशेषज्ञ का नाम-पता और फीस की पूछताछ भी लगे हाथों कर रखना, होली की पारम्परिक ‘छूट’ का फायदा उठाकर हम तुम्हारे हाँथ-पाँव तोड़ने की क्रिया भी अंजाम दे सकते हैं।

खान्दानी आशिक मिज़ाज हुरियारों को होली का विशेष इंतज़ार रहता है। उनकी पवित्र इच्छा रहा करती है कि उन्हें भँग की तरंग में दूसरों की बीवियों, बहन-बेटियों के तन पर रगड़-रगड़कर रंग-गुलाल लगाने की विशेष छूट दी जाए और इस कृत्य को देखकर कोई भी इज्ज़तदार इंसान क़तई बुरा न माने। कुछ टपोरी किस्म के अत्योत्साही बंदे साल भर होली का इंतजार ही इसलिए करते हैं कि ‘बुरा न मानो होली है’ की सार्वजनिक अपील की आड़ में अपने प्रिय सामाजिक शत्रुओं की जम कर लू उतारने का मौका मिले। किसी पर भयंकर कोटि के शाब्दिक भाले-बर्छियों की बौछार करने, किसी की छीछालेदर करने, या किसी की इज्ज़त का पंचनामा बनाने का इससे अच्छा मौका और कौन सा हो सकता है। बीच चैराहे पर किसी की भी पगड़ी हवा में उछाल दो और धीरे से यह नारा छोड़ कर चलते बनों -होली है भई होली है, बुरा न मानो होली है।

                अर्सा पहले शर्म लिहाज के युग में, भारतीयों के किसी भी छोटी-मोटी बात पर बुरा मानकर चुल्लू भर पानी में डूब मरने के लिए दौड़ पड़ने का बड़ा जबरदस्त भय हुआ करता था, इसलिये ‘चोर’ को मुँह पर ‘चोर’ शब्द फेंककर मारने की बजाए लोग सब्र से साल भर होली की प्रतीक्षा करते थे और चोर को अच्छी तरह से आगाह करने के बाद कि भई बुरा न मानना, होली है, उसे ‘चोर’ कह लिया करते थे। इतने में ही अगला शर्म के मारे पानी-पानी हो जाता था और आत्महत्या करने पर उतारू हो पड़ता था। मगर आजकल जमाना बदल गया है। प्रोफेशनल बेशर्मो से भरी इस दुनिया में सचमुच बुरा मानने वालों का जबरदस्त टोटा है, आरोपों की भारी से भारी चार्जशीट पाकर भी कोई बुरा मानने का नाम नहीं लेता। वक्त के तकाज़े का हवाला देकर किसी को बुरा मानने का मात्र अभिनय भर करने के लिए कहा जाए तब भी वह बुरा नहीं मानेगा। बिजली के खंभों पर लाउड स्पीकर के चैंगे लगाकर भी यदि आप ऐलानिया तौर पर चोर को ‘चोर’ सम्बोधित कर चिल्लाएंगे तब भी वह बुरा नहीं मानेगा। ‘होली’ का खास मौका हो या रोज़मर्रा का कोई साधारण दिन, डाकू को डाकू कहिये, ठग को ठग कहिये, जालसाज़-घोटालेबाज़ को जालसाज़-घोटालेबाज़ कहिये, कातिल को कातिल, बलात्कारी को बलात्कारी कह दीजिए, वह बुरा मानने से रहा। बोल-बोल आपका मुँह दुख जाएगा, आप मानसिक रूप से थक कर चूर हो जाएंगे मगर फिर भी वह दाँत निपोरता आपके सामने खड़ा मुस्कुराता रहेगा। इतना ही नहीं, वह पूरी शिद्दत से अपनी और भी दो-चार महान खूबियाँ का बखान आपके सामने करके फिर आपसे कहेगा, हाँ अब मेरी बुराई करो, मैं बिल्कुल बुरा नहीं मानूँगा।

चरम भ्रष्टाचार के रंग में रंगे इस युग में आप रात-दिन भ्रष्टों के कान में भ्रष्टाचार के भारी-भरकम आरोपों का पारायण करते रहिये मगर उनके कानों पर जूँ भी रेंग जाए तो मजाल है। हाँ, यदि आप किसी राह चलते आदमी को धोके से ‘ईमानदार’ कह दें तो बहुत संभव है कि वह आपके पीछे जूता लेकर दौड़ पड़े और मार-मार कर आपकी टाट गंजी कर दे। इतना ही नहीं, हो सकता है अपनी इस बेइज्जती के लिये वह आपको माननीय अदालत तक घसीट कर ले जाए और आप पर पाँच-दस लाख का मानहानी का मुकदमा ठोक दे। 

                भारत जैसे प्रचंड लोकतांत्रिक देश में अगर कोई यूँ ही बैठेठाले बुरा मानने लग पड़े तो उसे पागल कुत्ते का काटा मानकर तुरंत कुत्तों के डाक्टर के पास ले जाया जाना चाहिए। जब हिस्ट्रीशीटर चोर-डाकू, ठग-धोखेबाज़ माफिया-बलात्कारी का तमगा छाती पर लटका होने के बावजूद समाज में, घर-बाहर, राजनैतिक अखाड़ों, देश के शिखर संस्थानों में बेशर्मों के लिए प्रचंड मान-सम्मान पाने की प्रचूर संभावनाएँ सामने हिलोरें लेती रहतीं हों, तो फिर आखिर क्यों कर कोई बिना मतलब बुरा मानता फिरेगा, फिर चाहे होली हो या और कोई दूसरा दिन!  

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

आओ घर में दुबक कर वेलेन्टाइन डे मनाएँ


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

माई डियर वेलेन्टाइन,
फिर वो मनहूस दिन आ गया है जिस दिन लाख एहतियात बरतने, लुकने-छुपने के बावजूद पिछले आठ बरस से बिलानागा हम भारतीय संस्कृति के हाथों पिटते आ रहे हैं। तुम्हें याद होगा जानेमन, कि पिछले उन आठ वेलेन्टाइन डेज़ में हमने तीन बार सार्वजनिक पार्कों में थप्पड़ खाए, दो बार महँगे रेस्टोरेंट से (आधा फास्ट फूड और कोक छोड़) मुँह छुपाकर भागे, दो बार कोतवाली में कान पकड़कर उठक-बैठक लगाने के बावजूद दो-दो सौ रुपये की रिश्वत देकर छूटे और एक बार बिरला मंदिर की सीढ़ियों पर आधा घंटे तक मुर्गा-मुर्गी बनाकर खड़े किये गए। मोहल्ले के बच्चे कम्बख़्त अब तक कुकुड़-कू, कुकुड़-कू की आवाज़ निकाल कर चिढ़ाते हैं। प्रिये, इसलिए अब हमने कसम खा ली है कि भले ही सरकार हमें बन्दूक का लायसेन्स बनवा दे, या मिलेट्री की सुरक्षा मुहैया करा दे, भले ही अपोजिट पार्टी के गुंडे हाथों में डंडे-झंडे लेकर हमारी रक्षा के लिए सड़कों पर उतर पड़ें, या अपने मम्मी-पापा ही पीछे खड़े होकर अपन को आशीर्वाद दें, कि मनाओं बेटा ‘वेलेन्टाइन डे’, मगर हम वेलेन्टाइन डे पर किसी सूरत में घर से बाहर नहीं निकलने वाले।


प्रिये, उस महान संत को क्या पता था कि वे जिस ‘डे’ को दुनिया की सबसे खूबसूरत नेमत के लिए मुकर्रर कर रहे हैं, भारतभूमि पर उसकी कैसी छिछालेदर होने वाली है। उन्हें अगर ज़रा भी अन्दाज़ होता कि इस पवित्र दिन हमारे देश में प्रेमी जोड़ों को जगह-जगह अपनी इज्ज़त का फालूदा करवाना पडे़गा और पार्कों-उद्यानों नदी-तालाबों के मनोरम किनारों से चप्पल-जूते छोड़कर भागना पड़ेगा तो वे वेलेन्टाइन डे को भारतभूमि पर न मनाने का उपदेश भी साथ ही साथ दिये जाते। पता नहीं संत वेलेन्टाइन पहले हुए थे या मथुरा-वृन्दावन के ग्वाले, मगर राधा-कृष्ण इस मामले में बड़े सौभाग्यशाली कहे जा सकते हैं जो द्वापर में ही रासलीला रचाकर चले गए, इधर कलयुग तक अगर निकल आते तो मुन्सीपाल्टी के बाग-बगीचों में उन बेचारों की क्या गत होती हम ही समझ सकते हैं।


प्रियतमें, तुम समझ रही हो ना कि आजकल का माहौल कितना उजड्ड हो गया है। देश के पार्कों में लड़कियों के साथ खुले-आम छेड़-छाड़, गुंडागर्दी बलात्कार की तो खुली छूट है, परन्तु प्रेम-विरहियों को मिलने की इजाज़त नहीं है। भारतीय संस्कृति के रखवाले तब डंडा लेकर नहीं घूमते जब सड़क पर किसी अबला की इज्ज़त लुट रही होती है, मगर तब वे कुकरमुत्तों की तरह निकल आते हैं जब वेलेन्टाइन डे करीब आने लगता है।


      प्रियतमा, आशा है तुम्हारा ब्लडप्रेशर नार्मल होगा, मेरे हाथ-पाँव भी अभी काँपना शुरू नहीं हुए हैं। फिर भी तुम कहो तो वेलेन्टाइन डे के दिन हम कहीं चोरी-छुपे मिलने की बजाय किसी अच्छे डाक्टर का एपाइंटमेंट लेकर कम्पलीट चेकप करा लेते हैं। दवा-गोली साथ में रहेगी तो हौसला रहेगा। आओ इस बार हम घर में ही दुबक कर वेलेन्टाइन डे मना लें! तुम अपने घर और मैं अपने, किसी को हवा भी नहीं लगेगी। मगर क्या भरोसा घर में बैठे संस्कृति के रक्षक ही हमारी पिटाई कर दें तो फिर अपन क्या करेंगे!