Tuesday, May 31, 2016

आधुनिक ठग विद्या

//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट// 
मानव सभ्यता के इतिहास में मनुष्य की जो सबसे बड़ी उपलब्धि है वह है आधुनिक चिकित्सा विज्ञान। पश्चिमी चिकित्सा विज्ञानियों ने यदि घर के सारे काम छोड़कर शोध एवं अनुसंधान नहीं किया होता, नए-नए आधुनिक चिकित्सकीय उपकरण, पैथोलॉजिकल टेस्ट प्रणालियाँ, दवा-गोलियाँ, इन्जेक्शन ईजाद नहीं किये होते तो हज़ारों अनोखी बीमारियों से ग्रस्त हमारे देश के लाखों समर्पितमरीज़, हमारे ईश्वर तुल्य डाक्टरों, पैथॉलॉजी मालिकों और दवा कम्पनियों के सालाना टर्नओव्हर में बिना कोई आर्थिक योगदान दिए ही मर जाते।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की बदौलत आज डॉक्टरों के पास मर्ज़ और मरीज़ की जॉच और विश्लेषण के लिए लघुतम से लेकर दैत्य आकार के इतने उपकरण और मशीनें हैं कि उन्हें अब केवल मरीज़ों की फीस और दवा गोलियों पर मिले चुटकी भर कमीशन पर ही निर्भर नहीं रहना पड़ता। नाना प्रकार के पैथॉलॉजी टेस्ट, एक्सरे, सीटी स्केन, एम.आर.आई, कलर डाप्लर आदि-आदि एक से एक महँगी जाँचों के कमीशन से घर बहुत अच्छे से चल जाता है। कमाई की ज्यादा हाय-हायहोने पर डाकसाब लोग खुद अपनी निजी पैथॉलॉजी लैब, स्केन सेन्टर, दवा की दुकान इत्यादि खोलकर बैठने के लिए स्वतंत्र हैं और मरीज़ों को दुनिया भर की जाँचें, दवा-गोलियाँ लिखकर अपना वित्तीय घाटा पूरा करने के ईश्वर प्रदत्त अधिकार का सजगतापूर्वक लाभ उठाने के लिए भी बेहद प्रतिबद्ध हैं।
बड़े-बड़े प्रायवेट अस्पतालों के मालिक रोज़ सुबह उठकर दुनिया के हर कोने की और सरपट नज़र दौड़ाते हैं, ताकि यदि कहीं भी कोई नया चिकित्सकीय उपकरण विकसित हुआ हो तो तुरंत बैंक से लोन लेकर उसे अपने अस्पताल में लगवा लें और जल्दी से जल्दी जाल में आ फँसे मरीज़ों की जेब से बैंक की किश्तों की वसूली शुरू कर दें। यूँ अपने देश में तो कभी भूले से भी कोई चिकित्सा उपकरण विकसित होता नहीं, अगर हो भी जाए तो उसे कोई खरीदेगा यह कतई संभव नहीं। क्योंकि देशी उपकरणों पर न तो कोई मरीज़ भरोसा करता है और न ही उससे ज़्यादा तादात में पैसे झड़ाए जा सकते हैं। अस्पताल में नाहक जगह घेरकर रखने का क्या फायदा। उससे अच्छा एक डीलक्स दड़बा बनाकर कोई पैसे वाला मरीज़ अटकाकर रखना ज़्यादा फायदेमंद होगा! 
सीटी स्केन, एम.आर.आई अथवा कर्कट-रक्त कर्कट’, ‘एड्सइत्यादि राजसी रोगों से संबंधित महँगी जाँच एवं परीक्षणों संबंधी मशीनों की ईजाद करके तो चिकित्सा विज्ञान ने जैसे अर्थक्रांति ही ला दी है। एक ही झटके में मरीज़ को हज़ारों-लाखों रुपए का फटका लगाकर पौ-बारह हो जाती है। पीड़ित मानवता की सेवा की नौटंकी में दिन भर सौ-पचास मरीज देखकर टाइम खोटी करने की बजाए दो-चार मरीज़ों को भारी-भरकम टेस्ट लिख दो, काम खत्म। दिन भर का कोटा एक घंटे में ही पूरा हो जाएगा। बाकी समय में अपने दूसरे पार्ट टाइम धंधों पर ध्यान केन्द्रित करो, जिससे एक अस्पताल के चार अस्पताल बनाने का रास्ता खुले और अच्छे दिन आएँ।
इधर, आधुनिक चिकित्सा शास्त्र की दृष्टि से निपट अनपढ़ और गँवार मरीज़ों की जेब से पैसा उलीचने की अन्य आधुनिक विधियाँ भी हमारे चतुर डाक्टर अविष्कारकों ने ईजाद कर रखी हैं। जैसे पेट दर्द के मरीज़ को फौरन सोनाग्राफी की सलाह देना भले ही वह अफारेके कारण दर्द कर रहा हो और आयोडेक्स स्तर की मोच खाए पैर के लिए बिना बात डिजिटल एक्सरे, सीटी स्केन या एम.आर.आई करवाने के लिए दौड़ाना। सर दर्द के मामले में दिमाग में  क्लॉटिंग का डर दिखाकर जबरदस्ती अस्पताल में भरती करवा लेना और फिर तेज गति से फीस का मीटर दौड़ाकर मरीज़ की जेब यूँ खाली कर देना कि शातिर से शातिर जेबकतरा भी अवाक होकर देखता रह जाए और अफसोस के मारे दीवारों पर सर मारता फिरे कि हाय कम्बख्त जेबकतरा क्यों बन गए! डॉक्टर बन जाते तो जेबकतरई के पेशे के साथ न्याय कर लेते। अगर मरीज़ कहीं ओर से टेस्ट-परीक्षण करवा कर कमीशन डुबा आया हो तो उसे बाप के हक से डाँटकर उसकी लू उतारना भी डाक्टरी पेशे का एक महत्वपूर्ण नुस्खा है जिसे अपनाकर डाकसाब मरीज़ को अंटे में ले लेते हैं ताकि फिर अपनी पसंदीदा दुकानसे दोबारा जाँचें करवा लाने का हुक्म देकर मरीज के अपने अस्पताल में घुस आने का टैक्स वसूला जा सके। हमारी चिकित्सा व्यवस्था में ऐसे और भी सैकड़ों तौर-तरीके, ‘समानान्तरचिकित्सा पद्यतियों के रूप में प्रचलित हैं जिनके निरन्तर प्रयोग से हमारा चिकित्सा विज्ञान दिनों-दिन उन्नत होता जा रहा है। हमारे डॉक्टर लोग पता नहीं किस अज्ञात यूनीवर्सिटी से इन अद्भत् चिकित्सा पद्यतियों की सघन ट्रेनिंग लेकर मरीज़ों का सांगोपांग उत्थान करने के लिए आते ही चले जा रहे हैं आते ही चले जा रहे हैं। इन युगपुरुषों के उजले सौभाग्य से देश में मरीज़ भी दिन पर दिन बढ़ते ही जा रहे हैं, बढते ही जा रहे हैं।
चिकित्सा विज्ञान ने यदि ये तमाम आधुनिक मशीनें-उपकरण, जॉच-परीक्षण और ठगने की अत्याधुनिक विधियाँ ईजाद न की होती तो बेचारे भारतीय डाक्टरों को तो बड़े संकटों का सामना करना पड़ता। केवल फीस से तो बड़ी-बड़ी कोठियाँ बनाई जाना असंभव होता और बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमने का सपना भी कम्बख्त साकार नहीं हो पाता। कौन फिर उन्हें बड़ा डाक्टर मानने को तैयार होता
समानान्तरचिकित्सा पद्यति में दवा-गोलियों का भी बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। पारखी डॉक्टर साहब मरीज़ के चेम्बर में घुसते ही मन ही मन तय कर लेते हैं कि इसे पाव भर दवा खिलाना है या आधा किलो। फिर मरीज के चेकप का नाटक करते-करते वे बड़ी सफाई से मरीज़ की जेब का भी चेकप कर लेते हैं कि उसमें कुछ है भी या यू ही छूछा चला आया! और फिर अपने इस सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण के हिसाब से उसे कभी-कभी किलो-दो किलो वज़न की महँगी दवाएँ भी लिख मारते हैं ताकि फिर उसी हिसाब से कमीशन भी तगड़ा पक सके। सस्ती दवाएँ लिखकर दस-बीस रूपए के कमीशन के लिए कोई डाक्टर अपना ईमान नहीं बिगाड़ता। दवाइयाँ महँगी हो और दो-चार पत्तों में ही ध्येय अच्छे से सध जाए डाक्टर साहब का यही सद्प्रयास होता है। दवा कम्पनियाँ भी इस मामले में किसी डाक्टर को निराश होने का कोई मौका नहीं देती। कीमतों को हमेशा ऊपर की दिशा में ही रखती हैं ताकि डाक्टरों को सम्मानपूर्ण कमीशन दिये जा सकें। कोई दवा दिन में तीन बार कोई चार बार, कोई खाने के पहले कोई खाने के बाद, कोई सोने के पहले कोई सोने के बाद, कोई दवा गरम पानी से तो कोई ठंडे पानी से कोई दूध से तो कोई जूस से, आदि-आदि चकरघिन्नी कर देने वाले दवा सेवन के गूढ़ उपक्रम को याद रखने की कोशिश में मरीज अपना मर्ज़ ही भूल जाता है। बीमारियों से त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहे मानव जीवन में चिकित्सा विज्ञान का इससे बड़ा योगदान और क्या हो सकता है।
बहरहाल, ठग विद्या हमारे देश की एक लोकप्रिय प्राचीन विद्या है, परन्तु इसका विकास लम्बे समय से अवरुद्ध पड़ा हुआ था। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की तमाम खोजें और उपलब्धियाँ, दवा-दारू इत्यादि सब कुछ इस विद्या के पुनर्जीवन एवं विकास के लिए किसी वरदान से कम नहीं। सात समुन्दर पार करके यह सब आधुनिक ज्ञान-विज्ञान यदि हम तक न पहुँचता तो हम तो पुरानी बाबा आदम के ज़माने की विधियों से ही मरीज़ों को ठगते रहते। ठगने की नई-नई आधुनिक विधियाँ तो कभी जान ही न पाते। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने हमारी प्राचीन ठग विद्या में नए प्राण फूँक दिये हैं और इस प्राचीन ठग विद्या ने भी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को नई बुलंदियों पर पहुँचा दिया है। समझ में नहीं आ रहा है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को सलाम करें या प्राचीन ठग विद्या को।   
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Monday, February 15, 2016

पार्क में फाउन्टेन पेन


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
 चैन से सोना हो तो जाग जाओ। जाग गए हो तो सुनो। पेश-ए-खिदमत है आज की सनसनी। आज दिनदहाड़े राजधानी में एक बेहद सनसनीखेज़ घटना दरपेश आई है, जिसकी वजह से समूची राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में दहशत का माहौल बना रहा। खबर है कि राजधानी की एक पॉश कॉलोनी में, एक नए-नए स्मार्ट पार्क में, एक सीमेंट कांक्रीट की बैंच पर, एक ज़िन्दा फाउन्टेन पेन पाया गया। जी हाँ, एक ज़िन्दा फाउन्टेन पेन, जिसके अन्दर नीले रंग की स्याही लबालब भरी हुई थी। हद हो गई, कमाल हो गया, लापरवाही की इन्तहाँ हो गई। राजधानी के स्मार्ट पार्क की बैंच पर ज़िन्दा फाउन्टेन पेन! सोचिए, सोचने की बात है, कि जब टाइट सिक्यूरिटी वाली राजधानी का यह हाल है तो छोटे-मोटे गाँव-कस्बों का क्या हाल होगा।

विश्वस्त सूत्र बताते है कि इस स्मार्ट पार्क में कॉलोनी के रसूखदार, पैसे वालों के बच्चें भारी तादात में मोबाइल और टेबलेटों पर गेम खेलने के लिए पहुँचते हैं। समझा जाता है कि इसी बात का फायदा उठाते हुए किसी शातिर बदमाश ने मौका देखकर छोटे-छोटे मासूम बच्चों की बीच वह जिन्दा फाउन्टेन पेन रख दिया, ताकि उन्हें धोखे से उस खतरनाक चीज़ का शिकार बनाया जा सके, परन्तु एक जागरूक नागरिक के अदम्य साहस और पराक्रम के कारण एक बड़ा हादसा होते-होते रह गया।

राजधानी के रईसों में शासन-प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के खिलाफ भारी असंतोष का वातावरण है। ज़ाहिर है, उनकी सुस्ती और मक्कारी की वजह से अगर यह जिन्दा फाउन्टेन पेन किसी मासूम बच्चे के हाथ लग जाता तो एक बहुत ही बड़ी दुर्घटना हो सकती थी। मामले का एक और सनसनीखेज पहलू यह है कि यदि खुदा ना खास्ता कुछ मासूम बच्चे इस खतरनाक फाउन्टेन पेन का शिकार बन जाते तो उनके इलाज के लिए राजधानी के किसी अस्पताल में कोई माकूल व्यवस्था नहीं है। 

बताया जाता है कि इस जिन्दा फाउन्टेन पेन के स्मार्ट पार्क की बैच पर इस तरह संदिग्ध अवस्था में लावारिस पड़े होने की खबर सर्वप्रथम स्थानीय पुलिस और प्रशासन को देने वाले उस बहादुर शख़्स को सरकार दो सौ रुपए नगद पुरुस्कार स्वरूप प्रदान कर सम्मानित करना चाहती हैं, साथ ही उसका नाम बहादुरी पुरुस्कारों के लिए प्रस्तावित करने की तैयारी भी चल रही है। समस्या यह हो गई है कि उक्त व्यक्ति पुलिस द्वारा इस प्रकरण में जबरन फँसा दिये जाने के डर से भूमिगत हो गया है।

इधर संपन्न नागरिकों की कालोनी में इस तरह खुले आम एक जिन्दा फाउन्टेन पेन पाए जाने से शहर भर के बुद्धिजीवियों, राजनैतिक हलकों, व्यापारी वर्ग एवं नौकरशाही में भी चिन्ता की एक प्रचंड लहर दौड़ गई है। समाज के सभी कोनों से घोर आश्चर्य प्रकट किया जा रहा है कि जब तमाम आला दर्जे के फाउन्टेन पेन एकाएक परिदृष्य से गायब हो चुके हैं तो आखिर एक दोयम दर्जे का घटिया सा फाउन्टेन पेन इस तरह खुलेआम पार्क की बैंच पर कैसे पाया जा सकता है! किसकी हो सकती है यह दुस्साहस पूर्ण हरकत! किस की शामत आई है जो इतिहास से करीब-करीब विदा ले रहे फाउन्टेन पेन को फिर से मुख्य धारा में लाने की नीच हरकत करने पर उतारू हो पड़ा है। कौन हो सकता है जो चाकू-छुरे और नंगी तलवार के इस ज़माने में फाउन्टेन पैन के जरिए लाल, नीली, हरी, काली रोशनाई से कागज रंगने का मंसूबा बना रहा है!

सभी सामाजिक संगठनों में इस घटना को बेहद संदेहास्पद दृष्टि से देखा जा रहा है। कुछ उत्साहीलाल तो इस घटना में पाकिस्तान का हाथ होने की संभावनाओं की ओर भी इशारा कर रहे हैं जबकि कुछ संगठनों का मानना है कि जिस मुल्क को सुई तक बनाने की तमीज़ नहीं है उसके द्वारा इतना बड़ा फाउन्टेन पेन बनाकर भारत की राजधानी के पार्क की बैंच पर रखवाया जाना बिल्कुल संभव नहीं है।

सरकार ने भी घटना की गंभीरता के मद्देनज़र एक सर्वदलीय बैठक आहूत कर अपनी चिंता सार्वजनिक की है। मामले की पुख्ता जॉच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों का आठ-दस सदस्यीय जॉच आयोग बिठाने की घोषणा की गई है एवं पुलिस महकमें को कड़ी लताड़ लगाते हुए भविष्य में ऐसी घटनाओं के प्रति चौकस रहने के निर्देश दिये गए हैं। सनसनी द्वारा मामले पर पुलिस प्रमुख की राय जानने की कोशिश की गई तो उन्होंने कहा कि संदिग्ध फाउन्टेन पेन को ज़ब्त कर सूक्ष्म जॉच के लिए गोपनीय रूप से एक अन्तर्राष्ट्रीय लैब को भेज दिया गया है। पुलिस प्रमुख ने कहा है कि षड़यंत्रकारियों द्वारा शासन-प्रशासन को मूर्ख बनाने की दृष्टि से फाउन्टेन पेन को पार्क की बैंच पर छोड़ा जाना संभावित है। इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने बताया कि हमारा मनोबल ऊँचा है और हम ऐसी दुर्घटना दोबारा नहीं होने देंगे। विदेशों से सम्पर्क कर शीघ्र ही फाउन्टेन पेन जैमर की व्यवस्था की जा रही है ताकि यदि शहर में कहीं और भी जिन्दा फाउन्टेन पेन मौजूद हों तो उनको निष्क्रिय कर संभावित खतरों को टाला जा सके। शहर भर में जगह-जगह चैक पाइन्ट लगाए जाएंगे और चौकसी बढ़ाई जाएगी। ब्लेक केट कमान्डोंज़ को सतर्क कर दिया गया है ताकि किसी भी संदिग्ध फाउन्टेन पेन धारी को देखते ही छापामार कार्यवाही कर उसे दबोच लिया जाए।

बरसों से बंद पड़ी फाउन्टेन पेन बनाने वाली कम्पनियों की एक एसोसियेशन के पूर्व अध्यक्ष ने घटना पर घोर आश्चर्य प्रकट करते हुए बताया कि हमारी एसोसियेशन के सदस्यों द्वारा पूरी तौर पर फाउन्टेन पेन बनाने का धंधा बंद कर दिया गया है और अब हम लोग चाकू-छुरे, कट्टे-तमंचे, तलवारें और देसी बम बनाने का काम कर रहे हैं। हमारे कुछ सदस्यों ने तो पान की दुकानें खोल ली है। ऐसे में कैसे और कहाँ से राजधानी में एक जिन्दा फाउन्टेन पेन आ गया यह हमारी बंद हो चुकी एसोसियेशन के लिए भी घोर आश्चर्य का विषय है। मुझे शक है कि हमारी एसोसियेशन के कुछ बागी सदस्य अब भी चोरी-छुपे फाउन्टेन पेन बनाने का अनैतिक कृत्य कर रहे हैं। सरकार को चाहिए कि ऐसे देशद्रोहियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर फाँसी पर चढ़ा दिया जाए जिन्होंने मानवता को शर्मसार करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है।

नामी पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े पत्रकारों साहित्यकार-लेखकों की एक एसोसियेशन ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा है कि-समाज की मुख्य धारा के साथ चलते हुए हम लोगों ने कब का अपना-अपना फाउन्टेन पेन सरेन्डर कर दिया है। हम में से कोई भी अब उस मनहूस वस्तु की ओर देखता भी नहीं है। सब लोग कम्प्यूटर, लैपटॉप और टेबलेट पर लेखन एवं पत्रकारिता कर्म करके अपना सामाजिक दायित्व निभा रहे हैं। सरकार ने समय-समय पर इसके लिए हमारे कुछ साथियों को पुरुस्कृत भी किया है। एसोसियेशन ने आलोचना करते हुए कहा कि कुछ फ्रीलांस वाले सिरफिरे हो सकता है अब भी अपने गिफ्ट में मिले फाउन्टेन पेनों में, एक-दूसरे का मुँह काला करने के काम आने वाली, देश की अमूल्य संपदा, ‘स्याहीका इस्तेमाल कर कागज काले कर रहे हों, जो कि घोर निंदा का विषय है। एसोसियेशन ने ऐसे ही किसी बंदे के इस घटना में शामिल होने की संभावना प्रकट की है जो पार्क में मुफ्त की हवाखोरी करते हुए लेखन जैसा असामाजिक कृत्य करने का आदी हो। एसोसिएशन ने कहा है कि यह आम जन साधारण एवं शासन-प्रशासन की सूझबूझ और सतर्कता का ही परिणाम है कि किसी विध्वंसक लेख, कविता, व्यंग्य, कहानी या रिपोर्ताज के सामने आने से पहले ही उस फाउन्टेन पेन को देख लिया गया एवं फूर्ती से उसे जिन्दा हालत में कब्जे में लिया जाकर अत्यंत प्रशंसनीय कार्य किया गया।

करीब एक माह बाद अन्तराष्ट्रीय लैब को गोपनीय रूप से भेजे गए उक्त फाउन्टेन पेन की जाँच रिपोर्ट, लीक होकर बाहर आई। रिपोर्ट में वह खतरनाक फाउन्टेन पेन, नकली चाइनीज़ फाउन्टेन पेन एवं उसमें भरे द्रव्य को नकली नील के पानी के रूप में पहचाना गया। रिपोर्ट में भारत द्वारा घटिया चाइनीज़ सामान तक का डुप्लीकेट बना लिए जाने की धृष्टता पर भारी नाराज़गी दर्शाने वाली टीप दर्ज की गई थी और उसे चाइनीज़ हाइलाइटर से रंग भी दिया गया था। दरअसल फाउन्टेन पेन को जाँच के लिए गोपनीय रूप से जिस अन्तर्राष्ट्रीय लैब को भेजा गया था इत्तेफाक से वह लैब एक चाइनीज़ लैब थी। यह कैसे हुआ इसकी भी जॉच किये जाने की संभावना है।       

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Thursday, February 11, 2016

आभार से लदे-फदे


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//

 वे हर वक्त आभारी होने को तत्पर रहते हैं। अल्ल सुबह से लेकर देर रात तक वे आभार से इस कदर लद-फद जाते हैं कि उनकी थुल-थुल काया देखकर भ्रम होता है कि वे चर्बी से लदे हुए हैं या आभार से।

रोज़ सबुह उठते ही वे ईश्वर के आभारी होते है कि उसने उन्हें नींद में ही उठा नहीं लिया। फिर नहा-धो चुकने के बाद इसबघोल, लाइफबॉय साबुन और जल देवता का आभारी होते हैं। चाय-नाश्ता करने के बाद वे अन्न देवता का एक तिहाई आभारी होते हैं, बाकी दो तिहाई लंच और डिनर के लिए शेष रखते हैं। अखबार पढ़ने के बाद वे माँ सरस्वती का आभारी होते हैं क्योंकि उन्हीं की कृपा से अखबार में उनके खिलाफ कोई खबर प्रकाशित नहीं होती, बावजूद इसके कि वे सामाजिक जीवन में खबरों के बड़े उत्पादक हैं। कल ही उन्होंने पढ़ाई-लिखाई छुड़वाकर गाँव से लाई मासूम बच्ची को ठीक से कपड़े-बरतन साफ न करने पर मार-मार कर अधमरा कर दिया था, फिर न्याय के देवता का आभारी होकर फारिग हो गए कि उन्होंने उन्हें पुलिस-कोर्ट-कचहरी-जेल के लफड़े से बचाए रखा।

घर के बाहर कदम रखते ही वे अपने दो पहिया वाहन का आभारी हो लेते हैं क्योंकि वह चोरों के साथ नहीं चला गया। बाबा आदम के ज़माने से उनके दलाली के धंधे में कंधे से कंधा मिलाकर साथ रहने के लिए उसका पुनः पुनः आभारी होना भी नहीं भूलते। फिर अपने ठीए पर पहुँचकर दुकान के सभी तालों का आभारी होते-होते वे कागज़ पर बनाकर तिजोरी पर चिपकाए गए तिलस्मी यंत्र का आभारी होते हैं कि उसने रात भर तिजोरी में रखे उनके काले धन की रक्षा की।

अब वे अपने ठीए में स्थापित छोटे से मंदिर के सामने बैठकर सर्वशक्तिमान ईश्वर के सभी अनुकम्पाओं के लिए उसका आभारी होते हैं। वे ईश्वर के आभारी होते है उस गरीबी, महँगाई-बेरोजगारी के लिए जिसकी वजह से उनका ब्याज का धंधा चलता है। वे ईश्वर का आभारी होते हैं उस भ्रष्टाचार के लिए जिसकी बहती गंगा में वे भी हाँथ-पाँव मारकर अपनी तिजोरी का भार बढ़ाते जाते हैं। वे आभारी होते हैं ईश्वर का उस अपराध जगत के निर्माण के लिए जिसके कारण वे पुलिस-प्रशासन, कोर्ट-कचहरी के बीच समाज सेवा की अपनी छोटी सी भूमिका निभाकर अपने वारे-न्यारे कर लेते हैं। वे ईश्वर का आभारी होते हैं उस सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था के सृजन के लिए जिसमें वे जहाँ भी हाँथ डालते हैं पाँचों उंगलियों में घी लिपटा हुआ चला आता है।

शाम की बत्ती जलते ही वे रोशनी के देवता का आभारी होने के साथ-साथ थोड़ा सा भावुक होकर उनके जीवन में आई नई रोशनी के लिए भी लगे हाथ उसका आभारी हो लेते हैं जिसने सही समय पर उनके अंधकार पूर्ण जीवन में प्रकट होकर उन्हें भला आदमी बनने से बचा लिया। खुदा न खास्ता अगर वे भला आदमी बन जाते तो इस तिलस्मी दुनिया में दर-दर की ठोकरे खाते फिरते और इस खूबसूरत दुनिया का लुत्फ ही नहीं उठा पाते।

अब रात हो गई है। दिन भर किए कुकर्मों के लिए उन्हें माफ कर देने के लिए सभी देवी-देवताओं का आभारी होकर वे ज्यादा नहीं चार पैग चढ़ाएंगे और खाना खाकर बचा हुआ एक तिहाई आभार अपनी आँखों में लिए निद्रा देवी को समर्पित हो जाएंगे। रात में अगर ठीक समय पर नींद खुल गई तो किसी अज्ञात देवता का आभारी होने में देर नहीं करेंगे जिसने उन्हें बिस्तर पर पेशाब करने से बचा लिया।     

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Monday, October 26, 2015

जय ग्राहक देवा



//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
मैंने बाज़ार के अन्दर कदम रखा ही था कि अचानक आठ-दस मोटे-मोटे पेट वाले तंदरुस्त मुस्टंडों ने मुझे चारों ओर से घेर लिया। मगर मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब पीटने की बजाय मुस्टंडों ने घंटा-घडियाल, शंख, झाँझ-मजीरे, फूल-मालाएँ, नारियल, अगरबत्ती निकाल ली और महादीपक प्रज्वलित कर मेरी आरती उतारना शुरू कर दी -‘‘जय ग्राहक देवा, ओ मेरे भगवन ओ खेवा, हमरे द्वार पधारो, हमरा माल निकारों, हम खावें मेवा, ओ जय ग्राहक देवा’’ आदि आदि! धूप-लोभान का धुँआ देकर, गुलाल, रोली-सिंधूर मुँह पर मारकर वे सब मुझे जबरन खींच कर अपनी-अपनी दुकानों में ले जाने की कोशिश करने लगे।
मुझे गुस्सा आ गया। मैंने एक मुस्टंडे से गरियाते हुए पूछा-‘‘क्या बदतमीजी है यह?’’
इस पर मुस्टंडा बोला-‘‘नाराज न हों प्रभु, हमारी पूजा स्वीकार करने की कृपा करो। त्योहारों का सीज़न आ गया है। हमने आपके लिए बाज़ार को सजा-संवार कर तैयार कर दिया है। आप अपने चरणों की धूल हमारी दुकान के अन्दर डालकर बोनी शुरू करवाओं ग्राहक प्रभु!’’
मैंने खीजते हुए कहा-‘‘काहे के ग्राहक प्रभु? जेब में फूटी कोड़ी नहीं है, क्या खाक बोनी करवाऊँ! दाल दो सौ रुपए किलो मिल रही है। महँगाई आसमान पर जा चढ़ी है, और तुम लोग अपना बाज़ार सजाकर लगे हो मुजरा दिखाने में! अरे ग्राहक कुछ खरीदे तो कैसे खरीदे ?’’
मुस्टंडा बोला-‘‘प्रभु उसकी चिंता आपको करने की ज़रूरत नहीं है। जिस किसी बैंक या फायनेंस कंपनी से कहोगे हम लोन दिलवा देंगे। बिल्कुल मुफ्त, ज़ीरो परसेंट ब्याज पर।’’
मैंने कहा-‘‘लेकिन भाई मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है फिलहाल। हर चीज़ घर में मौजूद है मेरे। मुझे कुछ नहीं खरीदना।’’
इस पर दूसरा मुस्टंडा बीच में कूँदकर बोला-‘‘एक्सचेंज ऑफर है ना भगवन। पुराना कबाड़ हमारी दुकान में फेंक कर आप न्यू ब्रांड माल ले जाइये। लाने-ले जाने का भाड़ा भी हम ही देंगे आपको। टीवी, फ्रिज, एसी, वाशिंग मशीन, जो मर्ज़ी ले लो देवता। हमारे भी बाल-बच्चे हैं, उनका भी ज़रा ध्यान रखो पालनहार।’’
मैंने कहा-‘‘तुम्हारे बाल-बच्चों को पालने की जिम्मेदारी क्या ग्राहक की है?’’
मेरा इतना कहना था कि मुस्टंडों की भृकुटियाँ तन गईं। वे लाल-पीले होते हुए चिल्लाने लगे-‘‘ओ फटीचर, ग्राहक देवता-ग्राहक देवता कह कर इज़्जत दे रहे हैं तो भाव नहीं मिल रहे तेरे। हम सबने मिलकर अभी घंटा भर आरती उतारी तेरी, उसका तू यह सिला दे रहा है ग्राहक के बच्चे? शराफत से कुछ खरीद ले और अपने ग्राहक देवता होने का फर्ज़ निभा। वर्ना त्योहार के सीज़न में हाथ-पैर तुडव़ा कर घर जाएगा। बीवी-बच्चे पहचानेंगे तक नहीं।’’
इससे पहले कि वे मेरी पिटाई करते, बाज़ार में एक चमचमाती लक्झरी कार आकर रुकी और उसमें से रंगीन ब्रांडेड चड्डा और टीशर्ट पहने, हाँथ में मोबाइल और कान में ब्लूटूथ ठूसे, थिरकते हुए तीन-चार बिजूके उतरे। मुस्टंडों के ढोल-नगाड़े और शंख-घडियाल फिर उसी तरह बज उठे और आरती शुरू हो गई-‘‘जय ग्राहक देवा, ओ मेरे भगवन ओ खेवा!’’
मैं मौके का फायदा उठाकर खिसक लिया। थोड़ी दूर ही निकला था कि पीछे नज़ारा बदल गया था। कार से आए ग्राहक देवताओं के धबाधब पिटने की आवाज़ के साथ-साथ मुस्टंडों के चिल्लाने की आवाज़ें भी आ रही थीं-‘‘सालों,न लाइन खरीदोगे, ऑन लाइन खरीदोगे?’’
त्योहार भी बढ़ रहे हैं, बाज़ार भी बढ़ रहे हैं। मगर जेब का साइज़ घटता जा रहा है। जल्द ही यह नज़ारा आम हो जाए तो कोई अचरज़ नहीं।  
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Saturday, September 26, 2015

टिकट कटने का गम


//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
सिलेक्शन कमेटी के चेयरमेन टेबल के नीचे छुपे हुए हैं और सदस्यगण मुँह छुपाए इधर-उधर देख रहे हैं। चुन्नू बाबू का विधवा विलाप सप्तम सुर में चल रहा है-‘‘भ्याSSSS भ्याSSSS भौंSSSS ! अरेरेरेरेरे! ठठरी बंध गई मेरी तो। मखाने फिक गए रे। अरे मैं तो जीते जी मर गया। इन बदमाशों ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा! भ्योSSSS भौंSSSS इत्यादि-इत्यादि!’’ गनीमत थी कि चूड़ियाँ नहीं थी चून्नू बाबू के हाथों में वर्ना वे उन्हें भी पत्थर पर पटक-पटक कर फोड़ देते।
एक सज्जन चुन्नू बाबू को सांत्वना बंधाने के अंदाज में बोले-‘‘हमें देखों, हमारा भी टिकट कट गया है। मुन्नू बाबू, टुन्नू बाबू, गुन्नू बाबू को भी इस चेरमेन के बच्चे ने धोका दिया है और उनकी जगह अपने सालों-सालियों को टिकट दे दिया है। मगर देखों, हम सब क्या तुम्हारी तरह रुदालीबने हुए हैं? धैर्य से काम लो चुन्नू बाबू। जिस दिन अपना दाँव लगेगा अपन इस चेरमेन को पटक-पटक कर मारेंगे। चेरमेनी भूला देंगे सुसरे की।’’
चुन्नू बाबू पर इस सांत्वना का कोई असर नहीं हुआ। वे उसी तरह दहाड़े मार-मार कर रोते रहे-‘‘मेरे बीवी-बच्चों की हाय लगेगी तुझे चेयरमेन। तूने मेरा टिकट काटकर मुझे रोजगार मिलने से पहले ही बेरोजगार कर दिया। कीड़े पडेंगे तुझमें कीड़े। तूने मेरे बच्चों के मुँह से निवाला छीना है, भूखों मरने की नौबत डाली है। तू नर्क में जाएगा चेयरमेन नर्क में।’’
फिर कोई शुभचिंतक बोला-‘‘शांत हो जाओ चुन्नू बाबू। होनी को कौन टाल सकता है। शांत हो जाओ। सब ठीक हो जाएगा।’’ लेकिन चुन्नू बाबू बिफरते ही चले गए-‘‘क्यों शांत हो जाऊँ ? इनके बाप की जायदाद है क्या टिकटजो जिसे मर्जी हो दे देगा और जिसका मर्जी हो काट देगा! इतने सालों से नेतागिरी जमाने में लगे हैं। न जाने कितनों की हड्डियाँ तोड़ी और घर उजाड़े। लाखों रुपया और घरबार सब फूँक दिया उम्मीद्वारी के लिए। इलेक्शन की पूरी तैयारी कर के रखी है। खुद मैंने और बीवी-बच्चों ने बैठकर अपने हाथों से बम-हथगोले बनाए हैं। कमजोर बूथों पर फील्डिंग लगाने का पूरा प्लान भी एडवांस में तैयार कर रखा है। मगर इस चेयरमेन की औलाद ने मेरा पत्ता ही काट दिया। हाय हाय हाय हाय! अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ! लाओ रे कोई मुझे थोड़ा सा ज़हर ही ला दो। वही खा-खिलाकर अपनी और अपने बीवी बच्चों, भाई-भतीजों, मामा-भांजों और तमाम नाते-रिश्तेदारों सबकी ईहलीला यही खत्म कर लूँ। हाय, क्या करेंगे बेचारे अब जी कर जब मेरा टिकटही काट दिया नासपीटों ने। न मैं इलेक्शन में खड़ा हो पाऊँगा न मंत्री बन पाऊँगा। सारे खानदान के सपनों पर पानी फेर दिया इस चेयरमेन ने। भ्योSSSS भ्योSSSS कर मुन्नू बाबू ने अपना रुदन सप्तम से भी ऊँचाई पर पहुँचा दिया।
प्रचंड दुःख, वेदना और संताप में अब चुन्नू बाबू ने ज़मीन पर अपना सिर पटकना चालू कर दिया, जैसे घर का कोई सरपरस्तमर गया हो। कुर्सी अगर सर पर चढ़ जाए और हाथ न आए तो ऐसा ही होता है। मगर, इससे पहले कि चुन्नू बाबू टिकट कटने के गम में अपना सिर तोड़ लेते, तमाशा देख रहे पार्टी कार्यकताओं ने दौड़कर उन्हें पकड़ लिया। वे नहीं चाहते थे कि चुन्नू बाबू जैसी प्रखर प्रतिभा लोकतंत्र के घाट पर सिर पटक-पटक कर मर जाए। आखिर भारतीय राजनैतिक रंगमंच पर प्रतिभाशाली नौटंकी बाजों की भारी माँग जो है भाई।   
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